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14 वर्ष के वनवास में राम कहां-कहां रहे?

astroadmin | October 24, 2018 | 0 | सामान्य जानकारी

14 वर्ष के वनवास में राम कहां-कहां रहे?…

प्रभु श्रीराम को 14 वर्षका वनवास हुआ। इस वनवास काल में श्रीराम ने कई ऋषि-मुनियों से शिक्षा औरविद्या ग्रहण की, तपस्या की और भारत के आदिवासी, वनवासी और तमाम तरह केभारतीय समाज को संगठित कर उन्हें धर्म के मार्ग पर चलाया।
संपूर्ण भारत कोउन्होंने एक ही विचारधारा के सूत्र में बांधा, लेकिन इस दौरान उनके साथ कुछऐसा भी घटा जिसने उनके जीवन को बदल कर रख दिया।

रामायणमें उल्लेखित और अनेक अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार जब भगवान राम को वनवासहुआ तब उन्होंने अपनी यात्राअयोध्या से प्रारंभ करते हुए रामेश्वरम औरउसके बाद श्रीलंका में समाप्त की। इस दौरान उनके साथ जहां भी जो घटा उनमेंसे 200 से अधिक घटना स्थलों की पहचान की गई है।

वहां के स्मारकों, भित्तिचित्रों, गुफाओं आदिस्थानों के समय-काल की जांच-पड़ताल वैज्ञानिक तरीकों से की। आओ जानते हैंकुछ प्रमुख स्थानों के बारे में…

केवट प्रसंग :रामको जब वनवास हुआ तो वाल्मीकि रामायण और शोधकर्ताओं के अनुसार वे सबसे पहले तमसा नदी पहुंचे, जो अयोध्या से 20 किमी दूर है। इसके बाद उन्होंने गोमतीनदी पार की और प्रयागराज (इलाहाबाद) से 20-22 किलोमीटर दूर वेश्रृंगवेरपुर पहुंचे, जो निषादराज गुह का राज्य था। यहीं पर गंगा के तट परउन्होंने केवट सेगंगा पार करने को कहा था।

‘सिंगरौर‘ :इलाहाबाद से 22 मील (लगभग 35.2 किमी) उत्तर-पश्चिम की ओर स्थित ‘सिंगरौर’ नामकस्थान ही प्राचीन समय में श्रृंगवेरपुर नाम से परिज्ञातथा। रामायण में इस नगर का उल्लेख आता है। यह नगर गंगा घाटीके तट पर स्थितथा। महाभारत में इसे ‘तीर्थस्थल’ कहा गया है।

‘कुरई‘ : इलाहाबादजिले में ही कुरई नामक एक स्थान है, जो सिंगरौर के निकट गंगा नदी के तट परस्थित है।गंगा के उस पार सिंगरौर तो इस पार कुरई। सिंगरौर में गंगा पारकरने के पश्चात श्रीराम इसी स्थान पर उतरे थे।इसग्राम में एक छोटा-सा मंदिर है, जो स्थानीय लोकश्रुति के अनुसार उसी स्थानपर है, जहां गंगा को पार करने केपश्चात राम, लक्ष्मण और सीताजी ने कुछदेर विश्राम किया था।

चित्रकूट के घाट पर :कुरईसे आगे चलकर श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण और पत्नी सहित प्रयाग पहुंचे थे।प्रयाग को वर्तमान में इलाहाबाद कहा जाता है। यहां गंगा-जमुना का संगम स्थलहै। हिन्दुओं का यह सबसे बड़ा तीर्थस्थान है। प्रभु श्रीराम ने संगम केसमीप यमुना नदी को पार किया और फिर पहुंच गए चित्रकूट।

यहां स्थित स्मारकोंमें शामिल हैं, वाल्मीकि आश्रम, मांडव्य आश्रम, भरतकूप इत्यादि।चित्रकूटवह स्थान है, जहां राम को मनाने के लिए भरत अपनी सेना के साथ पहुंचते हैं।तब जब दशरथ का देहांत होजाता है। भारत यहां से राम की चरण पादुका लेजाकर उनकी चरण पादुका रखकर राज्य करते हैं।

अत्रि ऋषि का आश्रम :चित्रकूटके पास ही सतना (मध्यप्रदेश) स्थित अत्रि ऋषि का आश्रम था। महर्षि अत्रिचित्रकूट के तपोवन में रहा करते थे। वहां श्रीराम ने कुछ वक्त बिताया।अत्रि ऋषि ऋग्वेद के पंचम मंडल के द्रष्टा हैं। अत्रिऋषि की पत्नी का नामहै अनुसूइया, जो दक्ष प्रजापति की चौबीस कन्याओं में से एक थी।

अत्रिपत्नी अनुसूइया के तपोबल से ही भगीरथी गंगा की एक पवित्र धारा चित्रकूटमें प्रविष्ट हुई और ‘मंदाकिनी’ नाम सेप्रसिद्ध हुई। ब्रह्मा, विष्णु वमहेश ने अनसूइया के सतीत्व की परीक्षा ली थी, लेकिन तीनों को उन्होंने अपनेतपोबल सेबालक बना दिया था।

तब तीनों देवियों की प्रार्थना के बाद हीतीनों देवता बाल रूप से मुक्त हो पाए थे। फिर तीनों देवताओंके वरदान सेउन्हें एक पुत्र मिला, जो थे महायोगी ‘दत्तात्रेय’। अत्रि ऋषि के दूसरेपुत्र का नाम था ‘दुर्वासा’। दुर्वासाऋषि को कौन नहीं जानता?

अत्रिके आश्रम के आस-पास राक्षसों का समूह रहता था। अत्रि, उनके भक्तगण व माताअनुसूइया उन राक्षसों से भयभीतरहते थे। भगवान श्रीराम ने उन राक्षसों कावध किया। वाल्मीकि रामायण के अयोध्या कांड में इसका वर्णन मिलता है।

प्रातःकालजब राम आश्रम से विदा होने लगे तो अत्रि ऋषि उन्हें विदा करते हुए बोले, ‘हे राघव! इन वनों में भयंकरराक्षस तथा सर्प निवास करते हैं, जो मनुष्योंको नाना प्रकार के कष्ट देते हैं। इनके कारण अनेक तपस्वियों को असमयहीकाल का ग्रास बनना पड़ा है।
मैं चाहता हूं, तुम इनका विनाश करके तपस्वियोंकी रक्षा करो।’

रामने महर्षि की आज्ञा को शिरोधार्य कर उपद्रवी राक्षसों तथा मनुष्य काप्राणांत करने वाले भयानक सर्पों को नष्ट करनेका वचन देखर सीता तथालक्ष्मण के साथ आगे के लिए प्रस्थान किया।चित्रकूट की मंदाकिनी, गुप्त गोदावरी, छोटी पहाड़ियां, कंदराओं आदि से निकलकर भगवान राम पहुंच गए घने जंगलोंमें…

  1. दंडकारण्य :अत्रिऋषि के आश्रम में कुछ दिन रुकने के बाद श्रीराम ने मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़के घने जंगलोंको अपना आश्रय स्थल बनाया। यह जंगल क्षेत्र था दंडकारण्य। ‘अत्रि-आश्रम’ से ‘दंडकारण्य’ आरंभ हो जाता है।छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्सोंपर राम के नाना और कुछ पर बाणासुर का राज्य था। यहां के नदियों, पहाड़ों, सरोवरों एवंगुफाओं में राम के रहने के सबूतों की भरमार है। यहीं पर रामने अपना वनवास काटा था। यहां वे लगभग 10 वर्षों सेभी अधिक समय तक रहे थे।

‘अत्रि-आश्रम’ से भगवान राम मध्यप्रदेश के सतना पहुंचे, जहां ‘रामवन’ हैं। मध्यप्रदेशएवं छत्तीसगढ़ क्षेत्रों मेंनर्मदा व महानदी नदियों के किनारे 10 वर्षोंतक उन्होंने कई ऋषि आश्रमों का भ्रमण किया। दंडकारण्य क्षेत्र तथा सतनाकेआगे वे विराध सरभंग एवं सुतीक्ष्ण मुनि आश्रमों में गए। बाद में सतीक्ष्णआश्रम वापस आए।

पन्ना, रायपुर, बस्तरऔर जगदलपुर में कई स्मारक विद्यमानहैं। उदाहरणत: मांडव्य आश्रम, श्रृंगी आश्रम, राम-लक्ष्मण मंदिर आदि।
रामवहां से आधुनिक जबलपुर, शहडोल (अमरकंटक) गए होंगे। शहडोल से पूर्वोत्तर कीओर सरगुजा क्षेत्र है। यहां एकपर्वत का नाम ‘रामगढ़’ है। 30 फीट कीऊंचाई से एक झरना जिस कुंड में गिरता है, उसे ‘सीता कुंड’ कहा जाताहै।यहां वशिष्ठ गुफा है। दो गुफाओं के नाम ‘लक्ष्मण बोंगरा’ और ‘सीता बोंगरा’ हैं।

शहडोल से दक्षिण-पूर्व की ओरबिलासपुर के आसपास छत्तीसगढ़ है।
वर्तमानमें करीब 92,300 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले इस इलाके के पश्चिम मेंअबूझमाड़ पहाड़ियां तथा पूर्व मेंइसकी सीमा पर पूर्वी घाट शामिल हैं।दंडकारण्य में छत्तीसगढ़, ओडिशा एवं आंध्रप्रदेश राज्यों के हिस्से शामिलहैं।

इसकाविस्तार उत्तर से दक्षिण तक करीब 320 किमी तथा पूर्व से पश्चिमतक लगभग 480 किलोमीटर है।
दंडकराक्षस के कारण इसका नाम दंडकारण्य पड़ा। यहां रामायण काल में रावण केसहयोगी बाणासुर का राज्य था।

उसकाइन्द्रावती, महानदी और पूर्व समुद्र तट, गोइंदारी (गोदावरी) तट तक तथा अलीपुर, पारंदुली, किरंदुली, राजमहेन्द्री, कोयापुर, कोयानार, छिन्दक कोया तक राज्य था। वर्तमान बस्तर की ‘बारसूर’ नामक समृद्ध नगर कीनींव बाणासुर ने डाली, जो इन्द्रावती नदी के तट पर था।यहीं पर उसने ग्राम देवी कोयतर मां की बेटी माता माय (खेरमाय) की स्थापनाकी। बाणासुर द्वारा स्थापित देवी दांत तोना (दंतेवाड़िन) है। यह क्षेत्रआजकल दंतेवाड़ा के नामसे जाना जाता है।

यहां वर्तमान में गोंड जाति निवासकरती है तथा समूचा दंडकारण्य अब नक्सलवाद की चपेट में है।
इसीदंडकारण्य का ही हिस्सा है आंध्रप्रदेश का एक शहर भद्राचलम। गोदावरी नदीके तट पर बसा यह शहर सीता-रामचंद्रमंदिर के लिए प्रसिद्ध है। यह मंदिरभद्रगिरि पर्वत पर है। कहा जाता है कि श्रीराम ने अपने वनवास के दौरान कुछदिनइस भद्रगिरि पर्वत पर ही बिताए थे।
स्थानीयमान्यता के मुताबिक दंडकारण्य के आकाश में ही रावण और जटायु का युद्ध हुआथा और जटायु के कुछ अंगदंडकारण्य में आ गिरे थे। ऐसा माना जाता है किदुनियाभर में सिर्फ यहीं पर जटायु का एकमात्र मंदिर है।

दंडकारण्यक्षे‍त्र की चर्चा पुराणों में विस्तार से मिलती है। इस क्षेत्र कीउत्पत्ति कथा महर्षि अगस्त्य मुनि से जुड़ी हुई है।यहीं पर उनकामहाराष्ट्र के नासिक के अलावा एक आश्रम था।

  1. पंचवटी में राम :दण्डकारण्यमें मुनियों के आश्रमों में रहने के बाद श्रीराम कई नदियों, तालाबों, पर्वतों और वनों को पार करने के पश्चात नासिक में अगस्त्य मुनि के आश्रमगए। मुनि का आश्रम नासिक के पंचवटी क्षेत्र में था। त्रेतायुग में लक्ष्मण वसीता सहित श्रीरामजी ने वनवास का कुछ समय यहां बिताया।
    उसकाल में पंचवटी जनस्थान या दंडक वन के अंतर्गत आता था। पंचवटी या नासिक सेगोदावरी का उद्गम स्थानत्र्यंम्बकेश्वर लगभग 20 मील (लगभग 32 किमी) दूरहै। वर्तमान में पंचवटी भारत के महाराष्ट्र के नासिक मेंगोदावरी नदी केकिनारे स्थित विख्यात धार्मिक तीर्थस्थान है।

अगस्त्यमुनि ने श्रीराम को अग्निशाला में बनाए गए शस्त्र भेंट किए। नासिक मेंश्रीराम पंचवटी में रहे और गोदावरी केतट पर स्नान-ध्यान किया। नासिक मेंगोदावरी के तट पर पांच वृक्षों का स्थान पंचवटी कहा जाता है। ये पांच वृक्षथे-पीपल, बरगद, आंवला, बेल तथा अशोक वट। यहीं पर सीता माता की गुफा केपास पांच प्राचीन वृक्ष हैं जिन्हें पंचवटके नाम से जाना जाता है। मानाजाता है कि इन वृक्षों को राम-सीमा और लक्ष्मण ने अपने हाथों से लगाया था।

यहींपर लक्ष्मण ने शूर्पणखा की नाक काटी थी। राम-लक्ष्मण ने खर व दूषण के साथयुद्ध किया था। यहां पर मारीच वधस्थल का स्मारक भी अस्तित्व में है।नासिक क्षेत्र स्मारकों से भरा पड़ा है, जैसे कि सीता सरोवर, राम कुंड, त्र्यम्बकेश्वर आदि। यहां श्रीराम का बनाया हुआ एक मंदिर खंडहर रूप मेंविद्यमान है।

मरीचका वध पंचवटी के निकट ही मृगव्याधेश्वर में हुआ था। गिद्धराज जटायु सेश्रीराम की मैत्री भी यहीं हुई थी। वाल्मीकि रामायण, अरण्यकांड में पंचवटीका मनोहर वर्णन मिलता है।
सीताहरण का स्थान ‘सर्वतीर्थ‘ : नासिकक्षेत्र में शूर्पणखा, मारीच और खर व दूषण के वध के बाद ही रावण नेसीताका हरण किया और जटायु का भी वध किया जिसकी स्मृति नासिक से 56 किमी दूरताकेड गांव में ‘सर्वतीर्थ’ नामक स्थान पर आज भी संरक्षित है।

जटायुकी मृत्यु सर्वतीर्थ नाम के स्थान पर हुई, जो नासिक जिले के इगतपुरी तहसीलके ताकेड गांव में मौजूद है। इसस्थान को सर्वतीर्थ इसलिए कहा गया, क्योंकि यहीं पर मरणासन्न जटायु ने सीता माता के बारे में बताया। रामजी नेयहां जटायु का अंतिम संस्कार करके पिता और जटायु का श्राद्ध-तर्पण कियाथा। इसी तीर्थ पर लक्ष्मणरेखाथी।

पर्णशाला : पर्णशाला आंध्रप्रदेश में खम्माम जिले के भद्राचलम में स्थित है। रामालयसे लगभग 1 घंटे की दूरी परस्थित पर्णशाला को ‘पनशाला’ या ‘पनसाला’ भीकहते हैं। हिन्दुओं के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से यह एक है।पर्णशालागोदावरी नदी के तट पर स्थित है। मान्यता है कि यही वह स्थान है, जहां सेसीताजी का हरण हुआ था।हालांकि कुछ मानते हैं कि इस स्थान पर रावण ने अपनाविमान उतारा था।

इसस्थल से ही रावण ने सीता को पुष्पक विमान में बिठाया था यानी सीताजी नेधरती यहां छोड़ी थी। इसी से वास्तविकहरण का स्थल यह माना जाता है। यहांपर राम-सीता का प्राचीन मंदिर है।
सीता की खोज : सर्वतीर्थजहां जटायु का वध हुआ था, वह स्थान सीता की खोज का प्रथम स्थान था। उसकेबादश्रीराम-लक्ष्मण तुंगभद्रा तथा कावेरी नदियों के क्षेत्र में पहुंचगए।

तुंगभद्रा एवं कावेरी नदी क्षेत्रों के अनेक स्थलों पर वेसीता की खोजमें गए।
शबरी का आश्रम :तुंगभद्राऔर कावेरी नदी को पार करते हुए राम और लक्ष्‍मण चले सीता की खोज में।जटायु औरकबंध से मिलने के पश्‍चात वे ऋष्यमूक पर्वत पहुंचे। रास्ते मेंवे पम्पा नदी के पास शबरी आश्रम भी गए, जो आजकलकेरल में स्थित है।

शबरी जाति से भीलनी थीं और उनका नाम था श्रमणा।
पम्पानदी भारत के केरल राज्य की तीसरी सबसे बड़ी नदी है। इसे ‘पम्बा’ नाम से भीजाना जाता है। ‘पम्पा’ तुंगभद्रा नदी का पुराना नाम है। श्रावणकौररजवाड़े की सबसे लंबी नदी है। इसी नदी के किनारे पर हम्पी बसा हुआ है। यहस्थान बेर के वृक्षों के लिए आज भी प्रसिद्ध है। पौराणिक ग्रंथ ‘रामायण’ में भी हम्पी का उल्लेख वानर राज्य किष्किंधाकी राजधानी के तौर पर कियागया है।केरल का प्रसिद्ध ‘सबरिमलय मंदिर’ तीर्थ इसी नदी के तट पर स्थित है।

हनुमान से भेंट :मलयपर्वत और चंदन वनों को पार करते हुए वे ऋष्यमूक पर्वत की ओर बढ़े। यहांउन्होंने हनुमानऔर सुग्रीव से भेंट की, सीता के आभूषणों को देखा औरश्रीराम ने बाली का वध किया।

ऋष्यमूकपर्वत वाल्मीकि रामायण में वर्णित वानरों की राजधानी किष्किंधा के निकटस्थित था। इसी पर्वत पर श्रीराम कीहनुमान से भेंट हुई थी। बाद में हनुमानने राम और सुग्रीव की भेंट करवाई, जो एक अटूट मित्रता बन गई। जब महाबलीबाली अपने भाई सुग्रीव को मारकर किष्किंधा से भागा तो वह ऋष्यमूक पर्वत परही आकर छिपकर रहने लगा था।

ऋष्यमूकपर्वत तथा किष्किंधा नगर कर्नाटक के हम्पी, जिला बेल्लारी में स्थित है।विरुपाक्ष मंदिर के पास से ऋष्यमूकपर्वत तक के लिए मार्ग जाता है। यहांतुंगभद्रा नदी (पम्पा) धनुष के आकार में बहती है। तुंगभद्रा नदी मेंपौराणिकचक्रतीर्थ माना गया है। पास ही पहाड़ी के नीचे श्रीराम मंदिर है।पास की पहाड़ी को ‘मतंग पर्वत’ माना जाता है। इसीपर्वत पर मतंग ऋषि काआश्रम था।

कोडीकरई :हनुमानऔर सुग्रीव से मिलने के बाद श्रीराम ने अपनी सेना का गठन किया और लंका कीओर चल पड़े। मलय पर्वत, चंदन वन, अनेक नदियों, झरनों तथा वन-वाटिकाओं कोपार करके राम और उनकी सेना ने समुद्र की ओर प्रस्थान किया। श्रीराम ने पहलेअपनी सेना को कोडीकरई में एकत्रित किया।तमिलनाडुकी एक लंबी तटरेखा है, जो लगभग 1,000 किमी तक विस्‍तारित है। कोडीकरईसमुद्र तट वेलांकनी केदक्षिण में स्थित है, जो पूर्व में बंगाल की खाड़ीऔर दक्षिण में पाल्‍क स्‍ट्रेट से घिरा हुआ है।

लेकिनराम की सेना ने उस स्थान के सर्वेक्षण के बाद जाना कि यहां से समुद्र कोपार नहीं किया जा सकता और यहस्थान पुल बनाने के लिए उचित भी नहीं है, तबश्रीराम की सेना ने रामेश्वरम की ओर कूच किया।

रामेश्‍वरम : रामेश्‍वरमसमुद्र तट एक शांत समुद्र तट है और यहां का छिछला पानी तैरने और सन बेदिंगके लिए आदर्श है। रामेश्‍वरम प्रसिद्ध हिन्दू तीर्थ केंद्र है। महाकाव्‍यरामायण के अनुसार भगवान श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई करने के पहले यहां भगवानशिव की पूजा की थी। रामेश्वरम का शिवलिंग श्रीराम द्वारा स्थापित शिवलिंगहै।

धनुषकोडी :वाल्मीकिके अनुसार तीन दिन की खोजबीन के बाद श्रीराम ने रामेश्वरम के आगे समुद्रमें वह स्थान ढूंढ़ निकाला, जहां से आसानी से श्रीलंका पहुंचा जा सकता हो।उन्होंने नल और नील की मदद से उक्त स्थान से लंका तक का पुनर्निर्माण करनेका फैसला लिया।

छेदुकराईतथा रामेश्वरम के इर्द-गिर्द इस घटना से संबंधित अनेक स्मृतिचिह्न अभी भीमौजूद हैं। नाविक रामेश्वरम मेंधनुषकोडी नामक स्थान से यात्रियों कोरामसेतु के अवशेषों को दिखाने ले जाते हैं।

धनुषकोडीभारत के तमिलनाडु राज्‍य के पूर्वी तट पर रामेश्वरम द्वीप के दक्षिणीकिनारे पर स्थित एक गांव है। धनुषकोडीपंबन के दक्षिण-पूर्व में स्थित है।धनुषकोडी श्रीलंका में तलैमन्‍नार से करीब 18 मील पश्‍चिम में है।
इसकानाम धनुषकोडी इसलिए है कि यहां से श्रीलंका तक वानर सेना के माध्यम से नलऔर नील ने जो पुल (रामसेतु)बनाया था उसका आकार मार्ग धनुष के समान ही है।

इन पूरे इलाकों को मन्नार समुद्री क्षेत्र के अंतर्गत माना जाता है।धनुषकोडी ही भारत और श्रीलंका के बीच एकमात्र स्‍थलीय सीमा है, जहां समुद्रनदी की गहराई जितना है जिसमेंकहीं-कहीं भूमि नजर आती है।
दरअसल, यहां एक पुल डूबा पड़ा है। 1860 में इसकी स्पष्ट पहचान हुई और इसे हटानेके कई प्रयास किए गए।अंग्रेज इसे एडम ब्रिज कहने लगे तो स्थानीय लोगोंमें भी यह नाम प्रचलित हो गया। अंग्रेजों ने कभी इस पुल कोक्षतिग्रस्तनहीं किया लेकिन आजाद भारत में पहले रेल ट्रैक निर्माण के चक्कर में बादमें बंदरगाह बनाने के चलते इसपुल को क्षतिग्रस्त किया गया।

30 मीललंबा और सवा मील चौड़ा यह रामसेतु 5 से 30 फुट तक पानी में डूबा है।श्रीलंका सरकार इस डूबे हुए पुल (पम्बन से मन्नार) के ऊपर भू-मार्ग कानिर्माण कराना चाहती है जबकि भारत सरकार नौवहन हेतु उसे तोड़ना चाहतीहै।इस कार्य को भारत सरकार ने सेतुसमुद्रम प्रोजेक्ट का नाम दिया है।

श्रीलंकाके ऊर्जा मंत्री श्रीजयसूर्या ने इस डूबे हुएरामसेतु पर भारत औरश्रीलंका के बीच भू-मार्ग का निर्माण कराने का प्रस्ताव रखा था।
13.’नुवारा एलिया‘ पर्वत श्रृंखला :वाल्मीकिय-रामायणअनुसार श्रीलंका के मध्य में रावण का महल था। ‘नुवाराएलिया’ पहाड़ियोंसे लगभग 90 किलोमीटर दूर बांद्रवेला की तरफ मध्य लंका की ऊंची पहाड़ियों केबीचोबीच सुरंगोंतथा गुफाओं के भंवरजाल मिलते हैं। यहां ऐसे कईपुरातात्विक अवशेष मिलते हैं जिनकी कार्बन डेटिंग से इनका कालनिकाला गयाहै।

श्रीलंकामें नुआरा एलिया पहाड़ियों के आसपास स्थित रावण फॉल, रावण गुफाएं, अशोकवाटिका, खंडहर हो चुकेविभीषण के महल आदि की पुरातात्विक जांच से इनकेरामायण काल के होने की पुष्टि होती है। आजकल भी इन स्थानोंकी भौगोलिकविशेषताएं, जीव, वनस्पति तथा स्मारक आदि बिलकुल वैसे ही हैं जैसे कि रामायणमें वर्णित किए गएहैं।

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