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हिंदू पंचांग देखना जाने 2

astroadmin | March 19, 2018 | 0 | ज्योतिष सीखें

, हिंदू पंचांग मूलतः पांच अंगों से मिलकर बना है जो क्रमशः तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण है जिनकी मुलभुत जानकारी मै पिछली पोस्ट में दे चुका हूँ। आज हम हिंदू पंचांग के प्रथम अंग “तिथि” की विस्तृत चर्चा करेंगे।

तिथियां संख्या में १६ होती है जो इस प्रकार है:- प्रतिपदा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पंचमी, षष्टी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी, अमावस्या और पूर्णिमा।

सबसे पहले तो यह जानिए की “तिथि” होती क्या है।

चंद्रमा की एक कला को “तिथि” कहा जाता है। चंद्रवर्ष के अनुसार एक महीने में १५-१५ दिनों के दो पक्ष:-  कृष्ण तथा शुक्ल पक्ष होते है, शुक्ल पक्ष को ही सुदी कहते है, और कृष्ण पक्ष को बदी। दोनों पक्षो को मिलाकर एक चंद्रमाह में ३० तिथियां होती है। यहाँ थोड़ी सी जानकारी भ चक्र या राशि चक्र के बारे में भी ले लेते है। राशि चक्र तारामंडलों का वह समूह है जो उस मार्ग पर आते है जिस मार्ग से सूर्य एक वर्ष में खगोलीय गोले का एक चक्कर लेता है, इस चक्र को १२ बराबर भागों में बांटा गया है, जो १२ राशियां है। प्रत्येक राशि का मान ३० अंश होता है। इस प्रकार राशि चक्र में ३६० अंश होते है, और एक महीने में तिथियों की संख्या ३०, अतः ३६०/३०= १२ अंश की एक तिथि होती है। तिथि का मान चंद्रमा और सूर्य के अंशों में अंतर करने पर आता है। चंद्रमा अपने परिक्रमण पथ पर एक दिन में १३ अंश आगे बढ़ता है वहीँ सूर्य एक दिन में एक अंश आगे बढ़ता है, जिससे सूर्य से चंद्रमा की दूरी १३-१ = १२ अंश की होती है। यह सूर्य और चंद्रमा की गति का अंतर है और यही “तिथि” है। चंद्रमा की अनियमित गति के कारण कभी कभी यह अंतर इतना हो जाता है कि एक ही वार में दो या तीन तिथियों का स्पर्श हो जाता है, तब बीच वाली तिथि का लोप माना जाता है और उसे “क्षय तिथि” कहा जाता है। इसी प्रकार असंतुलित गति के कारण ही कभी कभी एक ही तिथि में दो या तीन वारों का स्पर्श भी हो जाता है, तब उसे “वृद्धि तिथि” कहते है।

तिथियां सूर्योदय से सूर्योदय तक नही होती, बल्कि एक निश्चित समय से दूसरे दिन एक निश्चित समय तक रहती है। प्रत्येक तिथि की अवधि समान नही होती। तारीख़ तथा वार २४ घण्टे के होते है, लेकिन तिथि सदा २४ घण्टे की नही होती, तिथि में वृद्धि-क्षय होते है। कभी कभी एक ही तिथि दो दिन हो जाती है, तो कभी एक दिन में ही दो तिथि भी हो जाती है। इसका कारण यह है कि तारीख़ तथा वार, सौरमान से होते है  किन्तु तिथि, नक्षत्र और योग चंद्रमान से होते है। सौरमान से जहाँ एक सौरदिन २४ घण्टे का होता है वहीँ एक चंद्रदिन लगभग २४ घंटे ५४ मिनट का होता है। सौरमान और चंद्रमान में लगभग ५४ मिनट का अंतर होता है, इसीलिए तिथि में वृद्धि या क्षय होना स्थान विशेष के सूर्योदय पर निर्भर करता है। वृद्धि और क्षय, दोनों ही प्रकार की तिथियां अतिनिन्दित मानी गई है, इनमें मंगल कार्य वर्जित कहे गए है।

#तिथिनिर्णय
जिस कर्म का जो काल हो, उस काल में व्याप्त तिथि जब हो तब उस कर्म को करना चाहिए। तिथि की वृद्धि-क्षय से ज्यादा फ़र्क नही पड़ता। सूर्योदय से मध्यान्ह तक जो तिथि न हो, वह खंडित माननी चाहिए, उसमे व्रतों का आरंभ अथवा समाप्ति नही करनी चाहिए। एकादशी व्रत के लिए सूर्योदयव्याप्त तिथि लेनी चाहिए। यदि दो दिन एकादशी में ही सूर्योदय हो रहा हो तो व्रत दूसरे दिन करना चाहिए। जिस तिथि में सूर्योदय हो, उसे पूर्ण तिथि मानते है। दैवकर्म में पूर्णाहव्यापिनी, श्राद्धकर्म में कुतुपकाल (८ वाँ मुहूर्त) व्यापिनी तथा रात्रि(नक्त) व्रतों में प्रदोषकालव्यापिनी तिथि लेनी चाहिए।

#तिथियों की संज्ञा
तिथियों की पांच संज्ञाएं मानी गई है जो इस प्रकार है- नंदा, भद्रा, जया, रिक्ता और पूर्णा।
प्रतिपदा, षष्टी और एकादशी, ये “नंदा” तिथि है।
द्वितीया, सप्तमी और द्वादशी, ये ” भद्रा” तिथि है।
तृतीया, अष्टमी और त्रयोदशी, ये “जया” तिथि है।
चतुर्थी, नवमी और चतुर्दशी, ये “रिक्ता” तिथि है।
पंचमी, दशमी, अमावस और पूर्णिमा, ये “पूर्णा” तिथि है।

#सिद्धा तिथि
सिद्धातिथि सब दोषों का नाश करती है, और भक्तिभाव से किए गए सभी कार्य सिद्ध करती है।

प्रतिपदा, षष्टी और एकादशी, अगर “शुक्रवार” को हो,
द्वितीया, सप्तमी और द्वादशी, “बुधवार” को हो,
तृतीया, अष्टमी और त्रयोदशी, “मंगलवार” को हो,
चतुर्थी, नवमी और चतुर्दशी, “शनिवार” को हो
पंचमी, दशमी, अमावस और पूर्णिमा, “गुरुवार” को हो तो ऐसी तिथियों को “सिद्धा तिथि” माना जाता है।

#तिथियों के फलाफल
प्रतिपदा सिद्धि देने वाली है, द्वितीया कार्यसाधन करने वाली है, तृतीया आरोग्य देने वाली है, चतुर्थी हानिकारक है,पञ्चमी शुभ देने वाली है, षष्ठी अशुभ है, सप्तमी शुभ है,अष्टमी व्याधि नाश करती है, नवमी मृत्यु देने वाली है, दशमी द्रव्य देने वाली है, एकादशी शुभ है, द्वादशी-त्रयोदशी सब प्रकार की सिद्धि देने वाली है, चतुर्दशी उग्र है, पूर्णिमा पुष्टि देने वाली है तथा अमावास्या अशुभ है।

#ग्रहों की जन्मतिथि
सप्तमी- सूर्य की, चतुर्दशी- चन्द्रमा की, दशमी- मंगल की,द्वादशी- बुध की, एकादशी- बृहस्पति की, नवमी- शुक्र की,अष्टमी- शनि की, पूर्णिमा- राहु की तथा अमावास्या केतु की जन्मतिथियाँ हैं, इन्हें शुभ कार्य में वर्जित करनी चाहिये।

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