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स्कन्द पुराण में समुद्र मंथन

astroadmin | January 8, 2019 | 0 | अध्यात्म और धर्म

स्कन्द पुराण में समुद्र मंथन की प्रसिद्ध कथा है ।

महर्षि दुर्वासा के शाप से इन्द्र जब श्री हीन हो गये तो क्षीर सागर को मथने की योजना बनी ।

मंथन कार्य से सार प्राप्त होता है ।मंदराचल को मथानी बनाया गया ।
मनुष्य ही स्वभाव से देवता और असुर होता है ।

दुर् वासना अर्थात् विषय वासना इन्द्रियो को शक्ति हीन कर देता है ।मन ही इनका स्वामी होता है ।

यह मन ईश्वर की टेक रखकर चिंतन करता है ।

श्वास ही वासुकि नाग है ।

इस चिंतन क्रम में सबसे पहले कालकूट अर्थात शरीर को नष्ट करने वाला मनोविकार ही उत्पन्न होता है , जिसे परमज्ञान रुपी शिव ही आत्मसात करते हैं , वे पाचन नहीं करते क्योंकि मनोविकार दीर्घकालीन अभ्यास से ही दूर होते हैं , केवल ईश्वर कृपा से नहीं ।

द्विज का चंद्र मन की निर्मलता का प्रथम चरण है जिसे शिव माथे पर रखते हैं यानि मन दोषमुक्ति की ओर अग्रसर होते ही ज्ञान मिलना शुरु हो जाता है ।

चिंतन से ही सभी उपयोगी तथा विनाशकारी चीजों का आविष्कार होता है ।

लक्ष्मी विष्णु को मिलती है अर्थात सबकुछ ईश्वर का ही है , ध्यान देने की बात है कि श्री हीन इन्द्र हुये , लेकिन लक्ष्मी मिली विष्णु को ।

वस्तुतः यथार्थ में आत्मा ही मालिक है , वही सबका पोषण आदि करता है।
बहुत सारे चीजों के बाद अंत में आयुर्वेद के जनक धन्वंतरी अमृत कलश लेकर निकले।

शरीर को शक्तिशाली , रोगमुक्त, दीर्घायु बनाना आयुर्वेद ही है ।

मृत शरीर है , अमृत आत्मा है ।

कलश नाभि के पास वह स्थान है जहाँ प्राणापान को सम किया जाता है ।
कर्म कांड के कलश स्थापना में भी उसमें पाँचो वायु को प्रतीक आवाहन किया जाता है ।

उत्तम वस्तु तो सबको इच्छित रहती है , सो देवता असुर अमृत के लिये लड़ने लगे ।

तब ईश्वर मोहिनी रुप से मध्यस्थता किये ।सुन्दर रुप सौन्दर्य में आसक्ति सबको रहती है , परंतु भावना अलग।

मोहिनी को देवता आदर और सात्विक भाव से तथा असुर कामुक भाव से देखते थे ।

अब मोहिनी ने देवो को अमृत तथा असुरो को विष पिलाया ।

एक नजर से यह छल लगता है , और ईश्वर के कर्म फल और सर्वन्यायकत्व के सिद्धांत को गलत भी करता है
(अमृत के लिये कर्म देवो के जितना , असुरो ने भी बराबर किया , तो अमृत पर उनका भी हक बनता है ।ईश्वर सबको समान दृष्टि से देखते हैं , पक्षपात नहीं करते )।

वस्तुतः ऐसा हुआ नहीं ।देवो तथा असुरो के लिये अमृत पाने का उद्देश्य अलग था तथा अमृत की परिभाषा भी अलग थी ।

देवताओं के लिये अमृत, आत्मा की प्राप्ति , मोक्ष उद्देश्य था ।जबकि असुर सांसारिक सुखो में अमरता चाहते थे ।यह सामान्य स्वभाव होता है ।

तो मोहिनी ने देवो को अमृत तथा असुरो को विष यानि विषय वासना दिया जो उनका अभीष्ठ था ।

विषय वासना युक्त मन ही तो असुर है ।

गीता में भी दैवी संपदा को अर्जन करने के बाद ही आत्मा को पाने का विधान विस्तार से बताया गया है ।

आत्म बल को ही ऋषियों ने यथार्थ संपत्ति माना है ।गीता का श्रोता अर्जुन धनंजय भी है यानि आत्म बल को अर्जित कर चुका है ।

अमृत कोई पेय पदार्थ नहीं है , जो मरा नहीं , नष्ट नहीं हुआ , शाश्वत है , सनातन है वही अमृत है ।

अमृत का अधिकारी दैवी संपदा से युक्त मनुष्य ही है ।

छल से अपात्र व्यक्ति जब आत्म ज्ञान पा लेता है तब आत्मा और मन रुपी सूर्य चंद्र अमृत के लाभ से उसे वंचित रखते हैं और प्रतिशोध में वे आत्मा और मन को ही दूषित करने का असफल प्रयास करते रहते हैं
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देवीभागवत पुराण में मां दुर्गा द्वारा बताये गये दस ऐसे नियमों के बारे में बतायेंगे जो जीवन को सफल बनाने के लिये अत्यंत उपयोगी हैं!!!!!!!!!

मनुष्य को क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए, इसका वर्णन कई ग्रंथों और शास्त्रों में पाया जाता है। इन बातों को समझ कर, उनका पालन करने पर जीवन को सुखद बनाया जा सकता है। श्रीमद् देवी भागवत महापुराण में स्वयं देवी भगवती ने दस नियमों के बारे में बताया है। इन नियमों का पालन हर मनुष्य को अपने जीवन में करना ही चाहिए।

श्रीमद् देवी भागवत महापुराण के अनुसार, ये है वह दस नियम जिन्हें हर मनुष्य को अपने जीवन में अपनाना चाहिए-

तपः सन्तोष आस्तिक्यं दानं देवस्य पूजनम्।
सिद्धान्तश्रवणं चैव ह्रीर्मतिश्च जपो हुतम्।।

अर्थात- तप, संतोष, आस्तिकता, दान, देवपूजन, शास्त्रसिद्धांतों का श्रवण, लज्जा, सद्बुद्धि, जप और हवन- ये दस नियम मेरे द्वारा (देवी भगवती) कहे गए है।

  1. तप- तपस्या करने या ध्यान लगाने से मन को शांति मिलती है। मनुष्य को जीवन में कई बातें होती हैं, जिन्हें समझ पाना कभी-कभी मुश्किल हो जाता है। तप करने या ध्यान लगाने से हमारा सारा ध्यान एक जगह केन्द्रित हो जाता है और मन भी शांत हो जाता है। शांत मन से किसी भी समस्या का हल निकाला जा सकता है। साथ ही ध्यान लगाने से कई मानसिक और शारीरिक रोगों का भी नाश होता है।
  2. संतोष- मनुष्य के जीवन में कई इच्छाएं होती हैं। हर इच्छा को पूरा कर पाना संभव नहीं होता। ऐसे में मनुष्य को अपने मन में संतोष (संतुष्टि) रखना बहुत जरूरी होता है। असंतोष की वजह से मन में जलन, लालच जैसी भावनाएं जन्म लेने लगती हैं। जिनकी वजह से मनुष्य गलत काम तक करने को तैयार हो जाता है। सुखी जीवन के लिए इन भावनाओं से दूर रहना बहुत आवश्यक होता है। इसलिए, मनुष्य हमेशा अपने मन में संतोष रखना चाहिए।
  3. आस्तिकता- आस्तिकता का अर्थ होता है- देवी-देवता में विश्वास रखना। मनुष्य को हमेशा ही देवी-देवताओं का स्मरण करते रहना चाहिए। नास्तिक व्यक्ति पशु के समान होता है। ऐसे व्यक्ति के लिए अच्छा-बुरा कुछ नहीं होता। वह बुरे कर्मों को भी बिना किसी भय के करता जाता है। जीवन में सफलता हासिल करने के लिए आस्तिकता की भावना होना बहुत ही जरूरी होता है।
  4. दान- हिंदू धर्म में दान का बहुत ही महत्व है। दान करने से पुण्य मिलता है। दान करने पर ग्रहों के दोषों का भी नाश होता है। कई बार मनुष्य को उसकी ग्रह दशाओं की वजह से कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। दान देकर या अन्य पुण्य कर्म करके ग्रह दोषों का निवारण किया जा सकता है। मनुष्य को अपने जीवन में हमेशा ही दान कर्म करते रहना चाहिए।
  5. देव पूजन- हर मनुष्य की कई कामनाएं होती हैं। अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए कर्मों के साथ-साथ देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना भी की जाती है। मनुष्य अपने हर दुःख में, हर परेशानी में भगवान को याद अवश्य करता है। सुखी जीवन और हमेशा भगवान की कृपा अपने परिवार पर बनाए रखने के लिए पूरी श्रद्धा के साथ भगवान की पूजा करनी चाहिए।
  6. शास्त्र सिद्धांतों का श्रवण- कई पुराणों और शास्त्रों में धर्म-ज्ञान संबंधी कई बातें बताई गई हैं। जो बातें न कि सिर्फ उस समय बल्कि आज भी बहुत उपयोगी हैं। अगर उन सिद्धान्तों का जीवन में पालन किया जाए तो किसी भी कठिनाई का सामना आसानी से किया जा सकता है। शास्त्रों में दिए गए सिद्धांतों से सीख के साथ-साथ पुण्य भी प्राप्त होता है। इसलिए, शास्त्रों और पुराणों का अध्यन और श्रवण करना चाहिए।
  7. लज्जा- किसी भी मनुष्य में लज्जा (शर्म) होना बहुत जरूरी होता है। बेशर्म मनुष्य पशु के समान होता है। जिस मनुष्य के मन में लज्जा का भाव नहीं होता, वह कोई भी दुष्कर्म कर सकता है। जिसकी वजह से कई बार न की सिर्फ उसे बल्कि उसके परिवार को भी अपमान का पात्र बनना पड़ सकता है। लज्जा ही मनुष्य को सही और गलत में फर्क करना सिखाती है। मनुष्य को अपने मन में लज्जा का भाव निश्चित ही रखना चाहिए।
  8. सदबुद्धि- किसी भी मनुष्य को अच्छा या बुरा उसकी बुद्धि ही बनाती है। अच्छी सोच रखने वाला मनुष्य जीवन में हमेशा ही सफलता पाता है। बुरी सोच रखने वाला मनुष्य कभी उन्नति नहीं कर पाता। मनुष्य की बुद्धि उसके स्वभाव को दर्शाती है। सदबुद्धि वाला मनुष्य धर्म का पालन करने वाला होता है और उसकी बुद्धि कभी गलत कामों की ओर नहीं जाती। अतः हमेशा सदबुद्धि का पालन करना चाहिए।
  9. जप- पुराणों और शास्त्रों के अनुसार, जीवन में कई समस्याओं का हल केवल भगवान का नाम जपने से ही पाया जा सकता है। जो मनुष्य पूरी श्रद्धा से भगवान का नाम जपता हो, उस पर भगवान की कृपा हमेशा बनी रहती है। भगवान का भजन-कीर्तन करने से मन को शांति मिलती है और पुण्य की भी प्राप्ति होती है। शास्त्रों के अनुसार, कलियुग में देवी-देवताओं का केवल नाम ले लेने मात्र से ही पापों से मुक्ति मिल जाती है।
  10. हवन- किसी भी शुभ काम के मौके पर हवन किया जाता है। हवन करने से घर का वातावरण शुद्ध होता है। कहा जाता है, हवन करने पर हवन में दी गई आहुति का एक भाग सीधे देवी-देवताओं को प्राप्त होता है। उससे घर में देवी-देवताओं की कृपा सदा बनी रहती है। साथ ही वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा भी बढ़ती है।

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गरुड़ पुराण के अनुसार इन 10 लोगों के घर खाना नहीं
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खाना चाहिए
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एक पुरानी कहावत है, जैसा खाएंगे अन्न, वैसा बनेगा मन।

यानी हम जैसा भोजन करते हैं, ठीक वैसी ही सोच और विचार बनते हैं। हमारे समाज में एक परंपरा काफी पुराने समय से चली आ रही है कि लोग एक-दूसरे के घर पर भोजन करने जाते हैं, कई बार दूसरे लोग हमें खाने की चीजें देते हैं। वैसे तो यह एक सामान्य सी बात है, लेकिन इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि किन लोगों के यहां हमें भोजन नहीं करना चाहिए।

गरुड़ पुराण के आचार काण्ड में बताया गया है कि हमें किन 10 लोगों के यहां भोजन ग्रहण नहीं करना चाहिए। यदि हम इन लोगों के द्वारा दी गई खाने की चीज खाते हैं या इनके घर भोजन करते हैं तो इससे हमारे पापों में वृद्धि होती है।

१*कोई चोर या अपराधी
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कोई व्यक्ति चोर है, न्यायालय में उसका अपराधी सिद्ध हो गया हो तो उसके घर का भोजन नहीं करना चाहिए। गरुड़ पुराण के अनुसार चोर के यहां का भोजन करने पर उसके पापों का असर हमारे जीवन पर भी हो सकता है।

२*चरित्रहीन स्त्री
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इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि चरित्रहीन स्त्री के हाथ से बना हुआ या उसके घर पर भोजन नहीं करना चाहिए। यहां चरित्रहीन स्त्री का अर्थ यह है कि जो स्त्री स्वेच्छा से पूरी तरह अधार्मिक आचरण करती है। गरुड़ पुराण में लिखा है कि जो व्यक्ति ऐसी स्त्री के यहां भोजन करता है, वह भी उसके पापों का फल प्राप्त करता है।

३*सूदखोर
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वैसे तो आज के समय में काफी लोग ब्याज पर दूसरों को पैसा देते हैं, लेकिन जो लोग दूसरों की मजबूरी का फायदा उठाते हुए अनुचित रूप से अत्यधिक ब्याज प्राप्त करते हैं, गरुड़ पुराण के अनुसार उनके घर पर भी भोजन नहीं करना चाहिए। किसी भी परिस्थिति में दूसरों की मजबूरी का अनुचित लाभ उठाना पाप माना गया है। गलत ढंग से कमाया गया धन, अशुभ फल ही देता है।

४*रोगी व्यक्ति
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यदि कोई व्यक्ति किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित है, कोई व्यक्ति छूत के रोग का मरीज है तो उसके घर भी भोजन नहीं करना चाहिए। ऐसे व्यक्ति के यहां भोजन करने पर हम भी उस बीमारी की गिरफ्त में आ सकते हैं। लंबे समय से रोगी इंसान के घर के वातावरण में भी बीमारियों के कीटाणु हो सकते हैं जो कि हमारे स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकते हैं।

५*अत्यधिक क्रोधी व्यक्ति
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क्रोध इंसान का सबसे बड़ा शत्रु होता है। अक्सर क्रोध के आवेश में व्यक्ति अच्छे और बुरे का फर्क भूल जाता है। इसी कारण व्यक्ति को हानि भी उठानी पड़ती है। जो लोग हमेशा ही क्रोधित रहते हैं, उनके यहां भी भोजन नहीं करना चाहिए। यदि हम उनके यहां भोजन करेंगे तो उनके क्रोध के गुण हमारे अंदर भी प्रवेश कर सकते हैं।

६*नपुंसक या किन्नर
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किन्नरों को दान देने का विशेष विधान बताया गया है। ऐसा माना जाता है कि इन्हें दान देने पर हमें अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। गरुड़ पुराण में बताया गया है कि इन्हें दान देना चाहिए, लेकिन इनके यहां भोजन नहीं करना चाहिए। किन्नर कई प्रकार के लोगों से दान में धन प्राप्त करते हैं। इन्हें दान देने वालों में अच्छे-बुरे, दोनों प्रकार के लोग होते हैं।

७*निर्दयी व्यक्ति
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यदि कोई व्यक्ति निर्दयी है, दूसरों के प्रति मानवीय भाव नहीं रखता है, सभी को कष्ट देते रहता है तो उसके घर का भी भोजन नहीं खाना चाहिए। ऐसे लोगों द्वारा अर्जित किए गए धन से बना खाना हमारा स्वभाव भी वैसा ही बना सकता है। हम भी निर्दयी बन सकते हैं। जैसा खाना हम खाते हैं, हमारी सोच और विचार भी वैसे ही बनते हैं।

८*निर्दयी राजा
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यदि कोई राजा निर्दयी है और अपनी प्रजा का ध्यान न रखते हुए सभी को कष्ट देता है तो उसके यहां का भोजन नहीं करना चाहिए। राजा का कर्तव्य है कि प्रजा का ध्यान रखें और अपने अधीन रहने वाले लोगों की आवश्यकताओं को पूरी करें। जो राजा इस बात का ध्यान न रखते हुए सभी को सताता है, उसके यहां का भोजन नहीं खाना चाहिए।

९*चुगलखोर व्यक्ति
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जिन लोगों की आदत दूसरों की चुगली करने की होती है, उनके यहां या उनके द्वारा दिए गए खाने को भी ग्रहण नहीं करना चाहिए। चुगली करना बुरी आदत है। चुगली करने वाले लोग दूसरों को परेशानियों फंसा देते हैं और स्वयं आनंद उठाते हैं। इस काम को भी पाप की श्रेणी में रखा गया है। अत: ऐसे लोगों के यहां भोजन करने से बचना चाहिए।

१०*नशीली चीजें बेचने वाले
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नशा करना भी पाप की श्रेणी में ही आता है और जो लोग नशीली चीजों का व्यापार करते हैं, गरुड़ पुराण में उनका यहां भोजन करना वर्जित किया गया है। नशे के कारण कई लोगों के घर बर्बाद हो जाते हैं। इसका दोष नशा बेचने वालों को भी लगता है। ऐसे लोगों के यहां भोजन करने पर उनके पाप का असर हमारे जीवन पर भी होता है।

 

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