ज्योतिष वास्तु और किसी भी प्रकार के रत्न के लिये फोन करे – 7309053333

श्री कृष्ण जन्माष्टमी के बारे मे सम्पूर्ण जानकारी

astroadmin | September 2, 2018 | 0 | अध्यात्म और धर्म , सामान्य जानकारी

भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद मास की अष्टमी के दिन हुआ था, अत: इस दिन को जन्माष्टमी या कृष्ण अष्टमी कहा जाता है। प्रत्येक वर्ष यह तिथि श्री कृष्ण के जन्म की शुभ घड़ी की याद दिलाती है और सारे देश में श्री कृष्ण जन्मोत्सव के रूप में बड़ी धूमधाम से मनाई जाती है।

चूंकि इसी विशेष तिथि की घनघोर अंधेरी आधी रात को रोहिणी नक्षत्र में मथुरा के कारागार में वसुदेव की पत्नी देवकी के गर्भ से भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म लिया था, 
अत: इस दिन भगवान कृष्ण के जन्म की कथा भी सुनी एवं सुनाई जाती है, जो इस प्रकार है –

 

‘द्वापर युग में भोजवंशी राजा उग्रसेन मथुरा में राज्य करता था। उसके आततायी पुत्र कंस ने उसे गद्दी से उतार दिया और स्वयं मथुरा का राजा बन बैठा। कंस की एक बहन देवकी थी, जिसका विवाह वसुदेव नामक यदुवंशी सरदार से हुआ था।

 

एक समय कंस अपनी बहन देवकी को उसकी ससुराल पहुंचाने जा रहा था।

 

रास्ते में आकाशवाणी हुई- ‘हे कंस, जिस देवकी को तू बड़े प्रेम से ले जा रहा है, उसी में तेरा काल बसता है। इसी के गर्भ से उत्पन्न आठवां बालक तेरा वध करेगा।’ यह सुनकर कंस वसुदेव को मारने के लिए उद्यत हुआ।

 

तब देवकी ने उससे विनयपूर्वक कहा- ‘मेरे गर्भ से जो संतान होगी, उसे मैं तुम्हारे सामने ला दूंगी। बहनोई को मारने से क्या लाभ है?’

कंस ने देवकी की बात मान ली और मथुरा वापस चला आया। उसने वसुदेव और देवकी को कारागृह में डाल दिया।

 

वसुदेव-देवकी के एक-एक करके सात बच्चे हुए और सातों को जन्म लेते ही कंस ने मार डाला। अब आठवां बच्चा होने वाला था। कारागार में उन पर कड़े पहरे बैठा दिए गए। उसी समय नंद की पत्नी यशोदा को भी बच्चा होने वाला था।

 

उन्होंने वसुदेव-देवकी के दुखी जीवन को देख आठवें बच्चे की रक्षा का उपाय रचा। जिस समय वसुदेव-देवकी को पुत्र पैदा हुआ, उसी समय संयोग से यशोदा के गर्भ से एक कन्या का जन्म हुआ, जो और कुछ नहीं सिर्फ ‘माया’ थी।

 

जिस कोठरी में देवकी-वसुदेव कैद थे, उसमें अचानक प्रकाश हुआ और उनके सामने शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किए चतुर्भुज भगवान प्रकट हुए। दोनों भगवान के चरणों में गिर पड़े। तब भगवान ने उनसे कहा- ‘अब मैं पुनः नवजात शिशु का रूप धारण कर लेता हूं।

 

तुम मुझे इसी समय अपने मित्र नंदजी के घर वृंदावन में भेज आओ और उनके यहां जो कन्या जन्मी है, उसे लाकर कंस के हवाले कर दो। इस समय वातावरण अनुकूल नहीं है। फिर भी तुम चिंता न करो। जागते हुए पहरेदार सो जाएंगे, कारागृह के फाटक अपने आप खुल जाएंगे और उफनती अथाह यमुना तुमको पार जाने का मार्ग दे देगी।’

उसी समय वसुदेव नवजात शिशु-रूप श्रीकृष्ण को सूप में रखकर कारागृह से निकल पड़े और अथाह यमुना को पार कर नंदजी के घर पहुंचे। वहां उन्होंने नवजात शिशु को यशोदा के साथ सुला दिया और कन्या को लेकर मथुरा आ गए। कारागृह के फाटक पूर्ववत बंद हो गए।

 

अब कंस को सूचना मिली कि वसुदेव-देवकी को बच्चा पैदा हुआ है।

 

उसने बंदीगृह में जाकर देवकी के हाथ से नवजात कन्या को छीनकर पृथ्वी पर पटक देना चाहा, परंतु वह कन्या आकाश में उड़ गई और वहां से कहा- ‘अरे मूर्ख, मुझे मारने से क्या होगा? तुझे मारनेवाला तो वृंदावन में जा पहुंचा है। वह जल्द ही तुझे तेरे पापों का दंड देगा।’ यह है कृष्ण जन्म की पवित्र कथा।

 

अधिकतर लोगों का मानना है कि भगवान कृष्ण का रंग सावंला या श्यामवर्णी था। श्याम रंग अर्थात कुछ कुछ नीला। मतलब काले जैसा नीला। जैसा सूर्यास्त के बाद जब दिन अस्त होने वाला रहता है तो आसमान का रंग काले जैसा नीला हो जाता है।श्यामवर्ण का सही अर्थ होता है काला और नीला का मिश्रित रंग। परंतु कृष्ण की त्वचा का रंग मेघ श्यामल था अर्थात काले, नीले और सफेद रंग का मिला-जुला।

संसार परमात्मा की अनूठी कृति है। वन, पर्वत, नदी, सागर, हिमालय, वनस्पति, जीव-जंतु एवं मानव यह इसकी शोभा हैं। यदि इनमें किसी भी प्रकार का विकार पैदा होता है तो परमात्मा की यह अनूठी रचना विनाश के कगार पर आ जाती है। इसी विकार को, जो वृहद् रूप ले चुका होता है, संतुलन में लाने के लिए कोई ऐसी शक्ति इस धरा में उतर आती है जिसे हम भगवान का अवतार कहते हैं, उसे पूजते हैं। उसे अपना आदर्श मानते हैं।

द्वापर में एक ऐसी ही विभूति भाद्रपद कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि को मध्यरात्रि में अवतरित होती है जिसे ‘कृष्ण’ कहा जाता है। भगवान कृष्ण ने अवतार से लीला संवरण तक एक भी ऐसा कर्म नहीं किया जो मानवता के उद्धार के लिए न हो। श्रीकृष्ण जन्म का घटना क्रम भी बड़ा विचित्र था। कंस की मथुरा जेल में जहां चारों ओर कड़ा पहरा था, वहां हुआ श्रीकृष्ण का जन्म अर्थात्‌ जन्म लेने से पहले ही उन्हें मारने की सारी तैयारियां हो चुकी थीं। लेकिन महान कार्य के लिए संसार में आने वाले हर संकट को नष्ट कर अपने उद्देश्य की ओर बढ़ते रहते हैं। श्रीकृष्ण जन्म का घटनाक्रम यही संदेश देता है। जेल से वह किस प्रकार नंदभवन गोकुल पहुंचते हैं और वहां वह नंद बाबा और यशोदा के दुलार में किलकारियां भरने लगते हैं परंतु यहां भी षड्यंत्र पीछा नहीं छोड़ते।

अपने वक्षस्थल पर विष लगा कर पूतना पहुंचती है परंतु वह भी समाप्त हो जाती है। ज्यों-ज्यों कृष्ण बड़े हुए आपदाएं भी बढ़ती जाती हैं। अघासुर, बकासुर, त्रणावर्त, धेनुकासुर न जाने कितने असुर उन्हें मारने आते हैं पर सभी एक-एक कर समाप्त होते गए। कंस ने नया तरीका सोचा, धनुष यज्ञ का आयोजन रचा, अक्रूर जी को भेजा और श्रीकृष्ण को मथुरा बुला लिया वहीं यज्ञ शाला में मदमस्त कुबलियापीड़ हाथी तथा मुष्टिक एवं चाणूर पहवान उन पर टूट पड़े परंतु श्रीकृष्ण ने उन्हें भी धराशायी कर दिया और कंस की छाती पर चढ़कर उसे भरी सभा में समाप्त कर अपने नाना यानी कंस के पिता उग्रसेन के हाथों मथुरा की सत्ता सौंप कर भय और भ्रष्टाचार मुक्त शासन का मार्ग प्रशस्त कर दिया।यहां सबसे महत्वपूर्ण एक बात यह है कि उन्होंने इस बीच केवल क्रांति और मारधाड़ ही नहीं की बल्कि प्रजा के मध्य अपनी लालित्य और माधुर्यपूर्ण लीलाओं के माध्यम से स्त्री-पुरुष, बालक, वृद्ध सभी को अपनी ओर आकृष्ट भी किया जिसमें बाल लीलाओं के माध्यम से उन्होंने युवापीढ़ी को सुसंगठित कर अत्याचार और भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ा कर दिया जिसमें गोप और गोपिकाएं दोनों ही उनके नेतृत्व में पूरे समर्पण के साथ समर्पित थे, तभी तो उन्होंने इंद्र की पूजा का मार्ग बदलकर गोवर्धन पूजन के माध्यम से प्रकृति पूजन का प्राचीन वैदिक सूत्र स्थापित किया।

 

यह घटना इतनी आश्चर्यजनक है जिसमें सात दिन तक इंद्र के वज्रपात का सामना किया जिसमें सारा व्रज मंडल धैर्यपूर्वक उनके साथ अविचल खड़ा दिखाई दिया। वस्तुतः निरंकुश, उद्धत एवं अहंकारी सत्ता को ललकारने का क्रम भारतवर्ष में अनेक युगों से होता आ रहा है।

 

श्रीकृष्ण जैसा नायक मिल जाने पर द्वापर का इतिहास ही बदल गया। मथुरा से अत्याचारी कंस का साम्राज्य समाप्त हुआ, हस्तिनापुर से दुर्योधन सहित समस्त कौरवों का संहार हुआ, मगध से जरासंध का नामोनिशान मिटा दिया, चेदि नरेश, शिशुपाल पापों और अत्याचारों के साथ समूल नष्ट हुआ, पूर्वोत्तर से नरकासुर का अंत हुआ इस प्रकार अनेक अत्याचारी सत्ताधारियों का विनाश कर स्वस्थ समाज की स्थापना हुई।

गीता उपदेश के माध्यम से उन्होंने यह विश्वास दिलाया है कि जब-जब धर्म की हानि और अधर्म, अत्याचार और भ्रष्टाचार बढ़ता है तब तब मैं इस धराधाम में आकर इन समस्त सामाजिक विकृतियों से समाज को बचाता हूं – “यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत, अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्‌।”

कहते हैं कि कृष्ण अपनी देह को अपने हिसाब से ढ़ाल लेते थे। कभी उनका शरीर स्त्रियों जैसा सुकोमल हो जाता था तो कभी अत्यंत कठोर। युद्ध के समय उनका शरीर वज्र की तरह कठोर हो जाता था। ऐसा इसलिए हो जाता था क्योंकि वे योग और कलारिपट्टू विद्या में पारंगत थे।

 

श्रीकृष्ण थे चिरयुवा : भगवान श्रीकृष्ण ने जब 
119 वर्ष की उम्र में देहत्याग किया तब उनकी देह के केश न तो श्वेत थे और ना ही उनके शरीर पर किसी प्रकार से झुर्रियां पड़ी थी। अर्थात वे 119 वर्ष की उम्र में भी युवा जैसे ही थे।

सुंगध, सौंदर्य और सात्विकता का त्रिवेणी संगम थे भगवान श्री कृष्ण। आइए जानते हैं पुराणों में उनकी विशिष्ट देह के बारे में क्या वर्णन मिलता है।

 

कैसी थी श्रीकृष्ण की गंध : श्रीकृष्ण के शरीर से मादक गंध आती थी। इस वजह से कई बार वेष बदलने के बाद भी कृष्ण पहचाने जाते थे। कई ग्रंथों के अनुसार कृष्ण के शरीर से गोपिकाचंदन और और रातरानी की मिलीजुली खुशबू आती थी। कुछ लोग इसे अष्टगंध भी कहते है |

द्वारिका में कब तक रहे कृष्ण : गुजरात के समुद्र तट पर बनी अपनी प्रिय नगरी द्वारिका के एक एक भवन का निर्माण श्रीकृष्ण की इच्छानुसार किया गया था। परंतु श्रीकृष्ण इस नगरी में कभी भी 6 माह से अधिक नहीं रह पाए।

 

किसने बनाई थी श्रीकृष्ण की द्वारिका : भगवान श्रीकृष्ण की प्रिय नगरी द्वारिका का निर्माण विश्वकर्मा और मयदानव ने मिलकर किया था। कहा जाता है कि विश्वकर्मा देवताओं के तो मयदानव असुरों के शिल्पी थे।

 

कैसे नष्ट हुई द्वारिका : पुराणों के अनुसार माना जाता है कि द्वारिका का विनाश समुद्र में डुबने से हुआ था लेकिन यह भी माना जाता है कि डूबने से पहले इस नगर को नष्ट कर दिया गया था।

 

भारतीय परंपरा और जनश्रुति अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने ही मार्शल आर्ट का अविष्कार किया था। दरअसल पहले इसे कालारिपयट्टू (kalaripayattu) कहा जाता था। इस विद्या के माध्यम से ही उन्होंने चाणूर और मुष्टिक जैसे मल्लों का वध किया था तब उनकी उम्र 16 वर्ष की थी। मथुरा में दुष्ट रजक के सिर को हथेली के प्रहार से काट दिया था।

जनश्रुतियों के अनुसार श्रीकृष्ण ने मार्शल आर्ट का विकास ब्रज क्षेत्र के वनों में किया था। डांडिया रास उसी का एक नृत्य रूप है। कालारिपयट्टू विद्या के प्रथम आचार्य श्रीकृष्ण को ही माना जाता है। हालांकि इसके बाद इस विद्या को अगस्त्य मुनि ने प्रचारित किया था। इस विद्या के कारण ही ‘नारायणी सेना’ भारत की सबसे भयंकर प्रहारक सेना बन गई थी।

 

श्रीकृष्ण ने ही कलारिपट्टू की नींव रखी, जो बाद में बोधिधर्मन से होते हुए आधुनिक मार्शल आर्ट में विकसित हुई। बोधिधर्मन के कारण ही यह विद्या चीन, जापान आदि बौद्ध राष्ट्रों में खूब फली-फूली। आज भी यह विद्या केरल और कर्नाटक में प्रचलित है।

लोक में कृष्ण की छवि ‘कर्मयोगी’ के रूप में कम और ‘रास-रचैय्या’ के रूप में अधिक है। उन्हें विलासी समझा जाता है और उनकी सोलह हजार एक सौ आठ रानियां बताकर उनकी विलासिता प्रमाणित की जाती है। चीर-हरण जैसी लीलाओं की परिकल्पना द्वारा उनके पवित्र-चरित्र को लांछित किया जाता है। राधा को ब्रज में तड़पने के लिए अकेला छोड़कर स्वयं विलासरत रहने का आरोप तो उन पर है ही, उनकी वीरता पर भी आक्षेप है कि वे मगधराज जरासन्ध से डरकर मथुरा से पलायन कर गए। महाभारत के युद्ध का दायित्व भी उन्हीं पर डाला गया है।

 

अनुश्रुति है कि महाभारत का युद्ध समाप्त होने पर जब राजा युधिष्ठिर ने युद्ध में मारे गए अपने सभी परिजनों (कौरवों का भी) की आत्मिक शांति के लिए उनके ऊर्द्ध दैहिक संस्कार (अन्त्येष्टि-श्राद्ध) किए, तो कौरव कुलवधुओं के साथ माता गांधारी भी अपने सौ पुत्रों को तिलांजलि देने के लिए वहां पधारीं। तर्पण से पूर्व उन्होंने आंखों पर बंधी पट्टी खोली और अपने कुल का विनाश देखकर रोष में भर उठीं। उनकी क्रुद्ध दृष्टि कृष्ण पर पड़ी और उन्होंने युद्ध पूर्व के उनके गीता-उपदेश को युद्ध का हेतु मानते हुए उन्हें उत्तरदायी ठहराया तथा शाप दिया कि उनकी मृत्यु भी नितांत एकाकी स्थिति में हो। वे भी अपने वंश का विनाश देखें। इस अनुश्रुति के आधार पर बहुत से लोग कृष्ण को इस युद्ध का उत्तरदायी ठहराते हैं, जबकि वास्तविकता इससे नितांत भिन्न है।

 

कृष्ण ने ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ में निष्काम कर्मयोग के जिस सिद्धांत का प्रतिपादन किया, उसे व्यवहार के आधार पर वे आजीवन परखते रहे थे। उन्होंने उसे आचरण में उतारा था और सच्चे अर्थों में आत्मसात किया था। उनका जीवन लोकसंग्रह के लिए समर्पित रहा। उनके राग में परम विराग और आसक्ति में चरम विरक्ति थी। सभी प्रकार की एषणाएं उनके नियंत्रण में थीं। वे जितेन्द्रिय योगी, दूरदृष्टा राजनीतिज्ञ, परमवीर, अद्भुत तार्किक और प्रत्युत्पन्नमति संपन्न महामानव थे।

 

कृष्ण पृथ्वी-पुत्र थे। वे मिट्टी से जुड़े थे। राजभवन और तृण-कुटीर दोनों के व्यापक अनुभव से वे अति समृद्ध थे। वे भारत में पलने वाले उन कोटि-कोटि भारतीयों के प्रतिनिधि हैं जो देह से पुष्ट और मन से सशक्त हैं, जिनमें शोषण और अत्याचार के विरूद्ध संघर्ष करने की अपार ऊर्जा है, जिनकी बलवती जिजीविषा और दुर्धर्ष शक्ति असंशभव को भी संभव कर दिखाती है। इसलिए वे वन्द्य और अनुकरणीय हैं।

 

कृष्ण का जन्म राजकुल में हुआ, किन्तु पले वे साधारण प्रजाजनों की भांति। गेंद खेली उन्होंने सामान्य ग्वाल-वालों के बीच तो शिक्षा पाई अकिंचन सुदामा के साथ। बचपन से ही उन्होंने जनतांत्रि‍क मूल्यों को आत्मसात् किया। प्रकृति के खुले प्रांगण ने उन्हें उत्तम स्वास्थ्य तो प्रदान किया ही, साथ ही उनके हृदय को कोमल और संवेदनशील भी बना दिया। गोकुल और वृन्दावन में रहते हुए उन्होंने क्रूर राजसत्ता के अत्याचारों की विभीषिका देखी, नगरों द्वारा गांवों का शोषण देखा और तज्जनित आक्रोश से अन्याय के विरूद्ध संघर्ष की ऊर्जा अर्जित की। जीवन संघर्ष के कठोर यथार्थ ने उन्हें व्यावहारिक बनाया। वे खोखले आदर्शों के मिथ्या मोह में नहीं फंसे। रूढ़ियां उन्हें बांध न सकीं और जड़ता भरे विश्वास उन्हें रोक नहीं पाए। युधिष्ठिर की तरह सत्य की रूढ़ि में वे नहीं उलझे। सत्य के वास्तविक स्वरूप को समझने की अद्भुत शक्ति उनका संबल बनी। यही उनकी सफलताओं का आधार भी रही।

 

वे सच्चे कर्मयोगी थे। राजर्षियों की परंपरा का पालन उन्होंने सदा किया। स्वयं सर्वाधिक शक्तिमान होते हुए भी वे राज-सिंहासन पर नहीं बैठे। केवल ‘किंग-मेकर’ बनकर ही जिए। राज्य का मोह संवरण कर पाना, वह भी उस काल में जब राज्य के लिए राजकुलों में मारकाट मची थी, बड़ी बात थी। ऐसा त्याग कृष्ण जैसा वीतराग महात्मा ही कर सकता है। कर्म की वेदी पर उन्होंने माया-मोह की आहुति दी। सम्बंधों का सुख त्यागा। लोकमंगल कृष्ण-चरित्र का मेरूदण्ड है। वृन्दावन में कंस-प्रेरित राक्षसों के वध से लेकर महाभारत में दुर्योधन की जांघ तुड़वाने तक की सारी संहार-लीला उन्होंने लोकमंगल के लिए ही रची। सुंदर उपवन के सृजन के लिए बबूलों और कंटीली झाड़ियों को जड़ से उखाड़ फेंकना माली की विवशता है। ऐसी ही विवशता कृष्ण के समक्ष भी थी। मानवीय-मूल्यों पर कुठाराघात कर पाशविक वृत्तियों का प्रसार करने वालों का संहार ही उस युग में एकमात्र कारगर उपाय बचा था। कृष्ण ने वही स्वयं किया और अपने अनुयायियों से भी कराया। इसीलिए द्वापर युग का अन्तिम चरण सुख-शांति से बीत सका।

आज समानता और दलितोत्थान के जो नारे हमारे जनतंत्र में दिए जा रहे हैं उनका सच्चा जनतांत्रि‍क स्वरूप कृष्ण के आचरण में मिलता है। उनके लिए मानवीय धरातल पर सुदामा और किसी किरीटधारी में कोई भेद नहीं। आतिथ्य मूल्य के निर्वाह में वे दोनों के प्रति समान हैं। उनकी दृष्टि में मूल्य मनुष्य की सज्जनता का है, उसके सद्गुणों, सद्भावों और कर्मों का है, उसके जातिगत या आर्थिक आधार का नहीं। द्वारिकाधीश होकर भी वे सुदामा के परम मित्र हैं। निर्वासित पाण्डवों के हितैषी हैं, शासक सुयोधन के नहीं, जो उनका सगा समधी है। धर्म और न्याय के पथ पर यही सच्चा समानता बोध है। परिवारवाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद आदि की संकीर्णताओं से मुक्त होकर ही व्यक्ति सामाजिक-न्याय का निर्वाह कर सकता है। यदि हमारे आज के तथाकथित द्वारिकाधीश वोट के लिए जाति की तुच्छ राजनीति से ऊपर उठकर कृष्ण के अनुकरण पर व्यक्ति के गुणों, उसकी क्षमताओं और प्रतिभा को महत्त्व दें तो सामाजिक समानता, न्याय और दलितोत्थान के स्वर्णिम स्वप्न शीघ्र ही साकार हो सकते हैं।

 

नारी की अस्मिता, स्वायत्तता, स्वाधीनता और गौरव की रक्षा के लिए भी कृष्ण का कृतित्व अनुकरणीय है। उनमें अपहृताओं को अपनाने का साहस है तो सरेआम भरे दरबार में अपमानित होती नारी की अस्मिता बचाने की अद्भुत सामर्थ्य भी है। नारी को अपना पति चुनने की छूट देने के सम्बंध में वे दोहरे मानदण्ड नहीं रखते। जिस प्रकार रूक्मिणी की इच्छा का सम्मान करते हूए उसके भाई की इच्छा के विरूद्ध उसका बलपूर्वक हरण कर लाते हैं, उसी प्रकार अपनी बहिन सुभद्रा को अर्जुन पर आसक्त देखकर बलराम की इच्छा के विरूद्ध सुभद्रा का हरण अर्जुन से करा देते हैं। ऐसा पुरूष चरित्र अन्यत्र दुर्लभ है। पुरूष की मानसिकता अपनी बहिन और दूसरों की बहिन में स्वतंत्रता के प्रश्न पर प्रायः अंतर करती है। वह स्वयं अपहरण करना तो पसन्द करता है किन्तु अपने कुल की नारी का अपहरण किया जाना कदापि पसन्द नहीं करता। कृष्ण इस मानसिकता से मुक्त हैं। इसीलिए नारी उद्धार के अनुकरणीय उदाहरण हैं।

 

आजकल नारी-विमर्श की बड़ी चर्चा है। नारी को पुरूष से अलग करके देखा जा रहा है। विभिन्न आन्दोलन और चर्चाएं जारी हैं। आश्चर्य यह है कि इन सबके बावजूद आज नारी-शोषण चरम-सीमा पर है। नारी-भ्रूण की हत्याएं हो रही हैं। सरेआम उसे निर्वस्त्र किया जा रहा है। उस पर बलात्कार हो रहे हैं। कहीं उसे बरगला कर घर से भगाकर लाया जा रहा है तो कभी देह व्यापार के लिए विवश किया जा रहा है। वह दहेज की बलि चढ़ रही है। विष पी रही है। परित्यक्ता बनकर अपमानित जीवन जी रही है। कितनी ही द्रुपदाओं के चीरहरण रोज हो रहे हैं किन्तु उनके रक्षक कौरव सभासदों की भांति या तो बिके हुए हैं या फिर पाण्डवों की तरह रूढ़ सत्य की बेड़ियों में जकड़े हैं। दुर्योधन, कर्ण, भीष्म, द्रोण, शकुनी, युधिष्ठिर आदि सब हैं किन्तु कृष्ण नहीं हैं, जो चीर बढ़ाकर नारी की लाज बचा सकें, भीम को उनकी प्रतिज्ञा याद दिलाकर निर्लज्ज कामुकों की जंघाएं तुड़वा सकें। अकेले कृष्ण के अभाव में पाण्डवी शक्ति मूर्छि‍त है। आज सारा परिदृश्य महाभारत कालीन मूल्यों के अवमूल्यन-संकट से गुजर रहा है। महाभारत के खल पात्र पग-पग पर सक्रिय हैं। सत्पात्रों में भीष्म-द्रोण जैसों के दर्शन भी यदाकदा हो जाते हैं, किन्तु समूचे परिदृश्य से कृष्ण अनुपस्थित हैं क्योंकि उन्हें हमने मन्दिरों में जड़ मूर्ति बनाकर रख दिया है। उनकी समाज-प्रेरक की भूमिका विस्मृत कर दी है। जब तक उसे पुनः स्मरण नहीं किया जाएगा तब तक नारी-उत्थान दिवास्वप्न ही रहेगा।

 

कर्तव्य-पालन के कंटकाकीर्ण पथ पर वे अभय थे। न किसी शक्ति का भय, न किसी प्रलोभन का मोह और न ही मान-अपमान की परवाह। ऐसा पवित्र चरित्र विश्व-साहित्य में दुर्लभ है। न्याय और सत्य की पुष्टि के लिए संघर्ष करने वालों को उनका चरित्र सदा ऊर्जा और प्रेरणा देता रहेगा संघर्ष-पथ के पथिको के लिए वे आकाश-दीप हैं, ध्रुव-नक्षत्र हैं। 

 

जन्माष्टमी के दिन अपने पापों के शमन व अभीष्ट कामना सिद्धि का संकल्प लेकर व्रत धारण करना चाहिए।

 

*
इस दिन प्रातःकाल तिल को जल में मिला कर स्नान करने का शास्त्रों में उल्लेख किया गया है।

 


स्नान के बाद शुभ्र वस्त्र धारण कर भगवान कृष्ण का ध्यान कर षोडशोपचार अर्थात शास्त्रों में उल्लेखित 16 विधियों से भगवान का पूजन-अर्चन करना श्रेयस्कर होता है।

इस दिन निराहार व्रत कर कृष्ण के नाम का जप करना चाहिए।

 

रात्रि में भगवान के जन्म के समय शंख, घंटा, मृदंग व अन्य वाद्य बजाकर भगवान का जन्मोत्सव मनाना चाहिए।

 


जन्म के बाद उन्हें धनिया-शकर की पंजीरी, मक्खन व खीर का भोग लगाना चाहिए।

 

*
व्रत के दूसरे दिन व्रत का पारण कर मंदिरों में असहायो को अन्न, वस्त्र, रजत, स्वर्ण व मुद्रा दान करना चाहिए।

जब-जब भी असुरों के अत्याचार बढ़े हैं और धर्म का पतन हुआ है, तब-तब भगवान ने पृथ्वी पर अवतार लेकर सत्य और धर्म की स्थापना की है। इसी कड़ी में भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि को अत्याचारी कंस का विनाश करने के लिए मथुरा में भगवान कृष्ण ने अवतार लिया।

चूंकि भगवान स्वयं इस दिन पृथ्वी पर अवतरित हुए थे, अतः इस दिन को कृष्ण जन्माष्टमी अथवा जन्माष्टमी के रूप में मनाते हैं। इस दिन स्त्री-पुरुष रात्रि बारह बजे तक व्रत रखते हैं। मंदिरों में खास तौर से झांकियां सजाई जाती हैं और भगवान कृष्ण को झूला झुलाया जाता है। जन्माष्टमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण की विशेष पूजा की जाती है। 
आप भी जानिए व्रत और पूजन की विधि –

उपवास की पूर्व रात्रि को हल्का भोजन करें और ब्रह्मचर्य का पालन करें।

उपवास के दिन प्रातःकाल स्नानादि नित्यकर्मों से निवृत्त हो जाएं।

 

पश्चात सूर्य, सोम, यम, काल, संधि, भूत, पवन, दिक्‌पति, भूमि, आकाश, खेचर, अमर और ब्रह्मादि को नमस्कार कर पूर्व या उत्तर मुख बैठें।

 

इसके बाद जल, फल, कुश और गंध लेकर संकल्प करें-

 

ममखिलपापप्रशमनपूर्वक सर्वाभीष्ट सिद्धये

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रतमहं करिष्ये॥

अब मध्याह्न के समय काले तिलों के जल से स्नान कर देवकीजी के लिए ‘सूतिकागृह’ नियत करें।

 

तत्पश्चात भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।

 

मूर्ति में बालक श्रीकृष्ण को स्तनपान कराती हुई देवकी हों और लक्ष्मीजी उनके चरण स्पर्श किए हों अथवा ऐसे भाव हो।

 

इसके बाद विधि-विधान से पूजन करें।

 

पूजन में देवकी, वसुदेव, बलदेव, नंद, यशोदा और लक्ष्मी इन सबका नाम क्रमशः लेना चाहिए।

फिर निम्न मंत्र से पुष्पांजलि अर्पण करें-

 

प्रणमे देव जननी त्वया जातस्तु वामनः।

वसुदेवात तथा कृष्णो नमस्तुभ्यं नमो नमः।

सुपुत्रार्घ्यं प्रदत्तं में गृहाणेमं नमोऽस्तुते।

 

अंत में प्रसाद वितरण कर भजन-कीर्तन करते हुए रतजगा करें।

श्रीकृष्ण पूजन का हर शास्त्र में विशेष महत्व बताया गया है। आइए 6 विशेष मंत्रों के माध्यम से जानें कि क्या लाभ मिलता है श्रीकृष्ण का ध्यान लगाने से, उनके पूजन से, उनकी आराधना से…

 

श्री शुकदेवजी राजा परीक्षित्‌ से कहते हैं-

 

सकृन्मनः कृष्णापदारविन्दयोर्निवेशितं तद्गुणरागि यैरिह।

न ते यमं पाशभृतश्च तद्भटान्‌ स्वप्नेऽपि पश्यन्ति हि चीर्णनिष्कृताः॥

 

जो मनुष्य केवल एक बार श्रीकृष्ण के गुणों में प्रेम करने वाले अपने चित्त को श्रीकृष्ण के चरण कमलों में लगा देते हैं, वे पापों से छूट जाते हैं, फिर उन्हें पाश हाथ में लिए हुए यमदूतों के दर्शन स्वप्न में भी नहीं होते।

अविस्मृतिः कृष्णपदारविन्दयोः

क्षिणोत्यभद्रणि शमं तनोति च।

सत्वस्य शुद्धिं परमात्मभक्तिं

ज्ञानं च विज्ञानविरागयुक्तम्‌॥

 

श्रीकृष्ण के चरण कमलों का स्मरण सदा बना रहे तो उसी से पापों का नाश, कल्याण की प्राप्ति, अन्तः करण की शुद्धि, परमात्मा की भक्ति और वैराग्ययुक्त ज्ञान-विज्ञान की प्राप्ति आप ही हो जाती है।

 

पुंसां कलिकृतान्दोषान्द्रव्यदेशात्मसंभवान्‌।

सर्वान्हरित चित्तस्थो भगवान्पुरुषोत्तमः॥

भगवान पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण जब चित्त में विराजते हैं, तब उनके प्रभाव से कलियुग के सारे पाप और द्रव्य, देश तथा आत्मा के दोष नष्ट हो जाते हैं।

 

शय्यासनाटनालाप्रीडास्नानादिकर्मसु।

न विदुः सन्तमात्मानं वृष्णयः कृष्णचेतसः॥

 

श्रीकृष्ण को अपना सर्वस्व समझने वाले भक्त श्रीकृष्ण में इतने तन्मय रहते थे कि सोते, बैठते, घूमते, फिरते, बातचीत करते, खेलते, स्नान करते और भोजन आदि करते समय उन्हें अपनी सुधि ही नहीं रहती थी।

वैरेण यं नृपतयः शिशुपालपौण्ड्र-

शाल्वादयो गतिविलासविलोकनाद्यैः।

ध्यायन्त आकृतधियः शयनासनादौ

तत्साम्यमापुरनुरक्तधियां पुनः किम्‌॥

 

जब शिशुपाल, शाल्व और पौण्ड्रक आदि राजा बैरभाव से ही खाते, पीते, सोते, उठते, बैठते हर वक्त श्री हरि की चाल, उनकी चितवन आदि का चिन्तन करने के कारण मुक्त हो गए, तो फिर जिनका चित्त श्री कृष्ण में अनन्य भाव से लग रहा है, उन विरक्त भक्तों के मुक्त होने में तो संदेह ही क्या है?

एनः पूर्वकृतं यत्तद्राजानः कृष्णवैरिणः।

जहुस्त्वन्ते तदात्मानः कीटः पेशस्कृतो यथा॥

 

श्रीकृष्ण से द्वेष करने वाले समस्त नरपतिगण अंत में श्री भगवान के स्मरण के प्रभाव से पूर्व संचित पापों को नष्ट कर वैसे ही भगवद्रूप हो जाते हैं, जैसे पेशस्कृत के ध्यान से कीड़ा तद्रूप हो जाता है, अतएव श्रीकृष्ण का स्मरण सदा करते रहना चाहिए।

योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्योत्सव, जिसे श्रीकृष्ण जन्माष्टमी कहते हैं। प्रतिवर्षानुसार इस वर्ष भी भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाएगा। लेकिन इस बार जन्माष्टमी को लेकर जनमानस में कुछ संशय है। संशय के पीछे मूल कारण है अष्टमी तिथि का दो दिन रहना। इस बार अष्टमी तिथि 2 और 3  को रहेगी, जिसके चलते श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के मनाए जाने को लेकर विद्वानों में मतभेद है।

कुछ विद्वान रात्रिकालीन अष्टमी तिथि व रोहिणी नक्षत्र को मान्यता दे रहे हैं, वहीं कुछ विद्वान सूर्योदयकालीन अष्टमी तिथि को मान्यता दे रहे हैं। इस मतान्तर के कारण आम श्रद्धालुगण असमंजस में हैं कि आखिर वे श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का उत्सव किस दिन मनाएं? हम अपने पाठकों के लिए इस संशय के समाधान हेतु कुछ तथ्य रख रहे हैं, जिसके आधार पर वे स्वयं इस निर्णय पर आसानी से पहुंच सकेंगे कि श्रीकृष्ण जन्माष्टमी कब मनाई जाए।

शास्त्रोक्त व्यवस्था :

शास्त्रानुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को बुधवार के दिन रोहिणी नक्षत्र में रात्रि के 12 बजे हुआ था। प्रतिवर्ष भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्योत्सव मनाया जाता है। अत: भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्योत्सव के दिन रात्रि में अष्टमी तिथि व रोहिणी नक्षत्र का होना अनिवार्य है।

अष्टमी तिथि दो दिन :

इस वर्ष भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष में अष्टमी तिथि 2 एवं 3 सितंबर दोनों ही दिन रहेगी। इस वर्ष 2 सितंबर को रात्रि 8 बजकर 46 मिनट से अष्टमी तिथि का प्रारंभ हो जाएगा एवं 3 सितंबर को अष्टमी तिथि 7 बजकर 19 मिनट पर समाप्त होगी। वहीं रोहिणी नक्षत्र का प्रारंभ 2 सितंबर को रात्रि 8 बजकर 48 मिनट से होगा एवं 3 सितंबर को रात्रि 8 बजकर 8 मिनट पर रोहिणी नक्षत्र समाप्त होगा। अत: रात्रि के 12 बजे केवल 2 सितंबर को ही अष्टमी तिथि व रोहिणी नक्षत्र रहेगा। 
पंचांगों में भी स्मार्त (गृहस्थ) के लिए कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत 2 सितंबर को एवं वैष्णवों के लिए 3 सितंबर को निर्धारित किया गया है। इस प्रकार शास्त्रोक्त तथ्य यह है कि जन्माष्टमी का पर्व चूंकि वैष्णव परंपरा के अनुसार ही मनाया जाता है, इसलिए देश में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 3 सितंबर को ही मनाई जाएगी।

 

भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के दिन प्रात:काल स्नान करके घर को स्वच्छ करें। नाना प्रकार के सुगंधित पुष्पों से घर की सजावट करें व
गोपालजी का पालना सजाएं। तत्पश्चात भगवान को शुद्ध जल से स्नान कराएं फिर दूध, दही, घी, शहद, शकर व पंचामृत से स्नान
कराएं। सभी स्नान के बाद शुद्ध जल से स्नान कराके दूध से अभिषेक करें व भगवान को वस्त्र पहनाएं। आभूषण से सुशोभित कर केशर
या चंदन का टीका लगाएं तथा फिर भगवान को पालने में सुला दें। यदुनंदन की इस प्रकार से पूजा करने से आपको वे आनंददायक
पालने का सुख देंगे।

 

रात्रि 12 बजे तक भगवान के कीर्तन, भजन व जप करते रहें। रात्रि 12 बजे भगवान की जन्म आरती कर जन्मोत्सव मनाएं। राशि के अनुसार भगवान का पूजन करें तो अनन्य फल प्राप्त होता है।

 

मेष : लाल वस्त्र पहनाएं व कुंकुं का तिलक करें।

 

वृषभ : चांदी के वर्क से श्रृंगार करें व सफेद चंदन का तिलक करें।

 

मिथुन : लहरिया वाले वस्त्र पहनाएं व चंदन का तिलक करें।

 

कर्क : सफेद वस्त्र पहनाएं व दूध का भोग लगाएं।

 

सिंह : गुलाबी वस्त्र पहनाएं व अष्टगंध का तिलक लगाएं।

 

कन्या : हरे वस्त्र पहनाएं व मावे का भोग लगाएं।

 

तुला : केसरिया वस्त्र पहनाएं व माखन-मिश्री का भोग लगाएं।

 

वृश्चिक : लाल वस्त्र पहनाएं व मिल्क केक का भोग लगाएं।

 

धनु : पीला वस्त्र पहनाएं व पीली मिठाई का भोग लगाएं।

 

मकर : लाल-पीला मिश्रित रंग का वस्त्र पहनाएं व मिश्री का भोग लगाएं।

 

कुंभ : नीले वस्त्र पहनाएं व बालूशाही का भोग लगाएं।

 

मीन : पीताम्बरी पहनाएं व केशर-बर्फी का भोग लगाएं।

 

Related Posts

करण क्या है?

astroadmin | November 26, 2018 | 0

  हिंदू पंचांग के पंचांग अंग है:- तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण। उचित तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण को देखकर ही कोई शुभ या मंगल कार्य किया जाता है। इसके…

वर्षकुंडली के प्रमुख योग कौन से…

astroadmin | November 26, 2018 | 0

इक्कबाल योग-(शुभ)-यह एक शुभ योग है। जब जातक की वर्षकुंडली के स्त्री ग्रह केंद्र या पणफर स्थान में स्थित हो और वे राहु-केतु युत या दृष्ट हों तो 'इक्कबाल' नामक…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

दैनिक पन्चांग

तत्काल लिखे गये

फेसबुक

सबसे ज्यादा देखे जाने वाले

दिन के अनुसार देखे

December 2018
S M T W T F S
« Nov    
 1
2345678
9101112131415
16171819202122
23242526272829
3031  

स्तोत्रम

अब तक देखा गया

  • 40,886
ज्योतिष वास्तु और किसी भी प्रकार के रत्न के लिये फोन करे – 7309053333
%d bloggers like this: