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वक्री मंगल का प्रभाव 

astroadmin | March 19, 2018 | 0 | ज्योतिष सीखें

वक्री मंगल का प्रभाव
Effects of Retrograde Mars
मंगल साहस, पराक्रम और उत्साह शक्ति प्रदान करने वाले माने जाते हैं. अत: कुण्डली में मंगल के वक्री होने कारण जातक में असहिष्णुता का भाव, अत्यधिक क्रोध और आक्रामक होना देखा जा सकता है. जातक की कार्यक्षमता सृजनात्मक नही रहती है. वक्री मंगल की दशा या अन्तर्दशा में व्यक्ति का लोगों से अधिक मतभेद हो सकता है या वह मुकदमेबाजी और कोर्ट कचहरी के चक्करों में फंस सकता है.

वक्री मंगल यदि जन्मांग में 6,8 या 12 भाव में हो तो व्यक्ति में जिद्दीपन देखा जा सकता है. व्यक्ति के व्यवहार में अड़ियल रुख हो सकता है. उसके कार्य अधूरे भी रह सकते हैं या उनमें रूकावटें उत्पन्न हो सकती हैं.

व्यक्ति किसी से भी सहयोग करना अपना अपमान समझ सकता है. जातक को स्वार्थी बना सकता है. व्यक्ति अपनी संतुष्टि एवं स्वार्थ सिद्धि के लिए किसी भी प्रकार के अनुचित कार्य करने में भी संकोच नहीं करता और वक्री मंगल की दशा में जातक को अकसमात होने वाली घटनाओं का सामना भी करना पड़ सकता है.

वक्री मंगल के लिए उपाय | Remedies for Retrograde Mars
वक्री मंगल के बुरे प्रभावों से बचने के लिए कुछ कार्यों को किया जा सकता है जैसे वक्री मंगल की दशा या अन्तर्दशा में अस्त्र शस्त्रों को नही खरीदें और उनके उपयोग से बचें अपने निवास स्थान पर घातक वस्तुओं को नही रखें. वक्रता के समय कोई नया वाहन या नई संपत्ति को नही खरीदें.

वक्री मंगल की दशा में गृह प्रवेश नहीं करना चाहिए. किसी भी प्रकार के आपरेशन या सर्जरी को नही कराएं. इस समय नया मुकदमा आरंभ करना उचित नहीं होता, क्योंकि इससे धन का नाश और संताप ही प्राप्त होगा. मंगल की वक्रता में छल कपट धोखा देना व्यक्ति के स्वभाव में देखा जा सकता है.

मंगल की वक्रता में मंगल मंत्र का जाप करना चाहिए, श्री हनुमान चालीसा का पाठ करना चाहिए तथा हनुमान जी को सिंदूर चढा़ना चाहिए. बंदरों को गुड़-चने खिलाना चाहिये ।
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मंगल*
ज्योतिष में इसे अंगारक और जल्लादे फलक ( आसमानी हत्यारा ) भी कहते हैं.
इसे भूमि पुत्र माना गया है. इसलिये इसका एक नाम भौम भी है.
मंगल मानव मन का संयोजक है. यानि जो आज हम हैं वो मंगल के कारण हैं.

मंगल मानवीय अहम का प्रतिनिधित्व करता है.
इसीलिये कालपुरुष कुंडली के प्रथम भाव का आधिपत्य इसे प्राप्त है. जबकि ऋषियों ने कालपुरुष के प्रथम भाव का नैसर्गिक कारक सूर्य को माना है जो की आत्मा का द्योतक है.
आत्मा की सांसारिक अभिव्यक्ति मंगल है.

मंगल ग्रह अस्तित्व की नवग्रह शक्ति वितरण व्यस्वस्था में ओज , ऊर्जा , साहस , मनोबल , रक्त और निर्माण का प्रतिनिधित्व करता है. मंगल क्षत्रिय प्रवृत्ति का कारक है.

जहां भी विस्तार , निर्माण , प्रभुत्व , लालसा की कामना होगी वहां मंगल का दखल होगा.

मंगल मन का निर्माता है. मानवीय मन और अहम् को निर्मित करने में इसकी प्रबल भूमिका है.

मंगल काल पुरुष कुंडली के तीसरे और छठे भाव का नैसर्गिक कारक है. यानि की पराक्रम और स्पर्धा का स्वामित्व इसे प्राप्त है.

भगवान् कार्तिकेय मंगल शक्ति के प्रतिनिधि देवता हैं. इनका वाहन मोर है जो की मन का प्रतीक है.

मंगल भूमि और अचल संपत्ति का कारक है. अपनी सबल स्थिति में यह जातक को भूमि और अचल संपत्ति जरुर देता है. लेकिन निर्बल अवस्था में यह जातक को ऋणग्रस्त कर देता है.

ऋणग्रस्तता के साथ साथ पराक्रम और प्रतिस्पर्धा का अभाव भी जातक में दृष्टिगोचर होता है.

मंगल जिस भी भाव में बैठता है और जिन भी भावों पर दृष्टि डालता हैं उन्हें उद्दीप्त कर देता है
लगन , द्वितीय , चतुर्थ , सप्तम , अष्टम और द्वादश भावों में इसकी स्थिति मांगलिक दोष का निर्माण करती है. ऐसी स्थिति में यह सप्तम और अष्टम भावों को उद्दीप्त कर देता है जिसके फलस्वरूप व्यक्ति सामान्य से अधिक काम ऊर्जा और काम लालसा का शिकार हो जाता है. इसीलिये वैवाहिक सन्दर्भ में मांगलिक के लिए मांगलिक की अनुशंसा की जाती है.

व्यक्ति जैसे जैसे अध्यात्म की ओर बढ़ता है वैसे वैसे मंगल अपना प्रभुत्व खोता जाता है. मोक्षकारक ग्रह केतु मंगल का छाया ग्रह है. मंगल का अभाव केतु का उद्भव है.

मूंगा मंगल का रत्न है. योगकारक और शुभ लेकिन कुंडली में निर्बल अवस्था होने पर मंगल को बलवान करने के लिए हाथी दांत का प्रयोग चमत्कारिक लाभ देता है…

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