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रुद्राष्टाध्यायी

astroadmin | March 19, 2018 | 0 | अध्यात्म और धर्म , सामान्य जानकारी

धर्मशास्त्र के विद्वानोँ ने रुद्राष्टाध्यायी के छः अंग निश्चित किए है – प्रथमाध्याय का शिवसंकल्प सूक्त हृदय है । द्वितीयाध्याय का पुरुषसूक्त सिर , उत्तरनारायण सूक्त शिखा है । तृतीध्याय का अप्रतिरथसूक्त कवच है । चतुर्थाध्याय का मैत्रसूक्त नेत्र है एवं पञ्चमाध्याय का शतरुद्रियसूक्त अस्त्र कहलाता है ।
रुद्राष्टाध्यायी के प्रत्येक अध्याय मेँ – प्रथमाध्याय का प्रथम मन्त्र “गणानां त्वा गणपति हवामहे ” बहुत ही प्रसिद्ध है । यह मन्त्र ब्रह्मणस्पति के लिए भी प्रयुक्त होता है ।
द्वितीय एवं तृतीय मन्त्र मेँ गायत्री आदि वैदिक छन्दोँ तथा छन्दोँ मेँ प्रयुक्त चरणो का उल्लेख है । पाँचवे मन्त्र “यज्जाग्रतो से सुषारथि” पर्यन्त का मन्त्रसमूह शिवसंकल्पसूक्त कहलाता है । इन मन्त्रोँ का देवता “मन”है इन मन्त्रोँ मेँ मन की विशेषताएँ वर्णित हैँ । परम्परानुसार यह अध्याय गणेश जी का है ।
द्वितीयाध्याय मे सहस्रशीर्षा पुरुषः से यज्ञेन यज्ञम तक 16 मन्त्र पुरुषसूक्त से हैँ ,इनके नारायण ऋषि एवं विराट पुरुष देवता हैँ । 17वे मन्त्र अद्भ्यः सम्भृतः से श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च ये छः मन्त्र उत्तरनारायणसूक्त रुप मे प्रसिद्ध हैँ । द्वितीयाध्याय भगवान विष्णु का माना गया है ।
तृतीयाध्याय के देवता देवराज इन्द्र हैँ तथा अप्रतिरथ सूक्त के रुप मेँ प्रसिद्ध है ।कुछ विद्वान आशुः शिशानः से अमीषाज्चित्तम् पर्यन्त द्वादश मन्त्रो को स्वीकारते हैं तो कुछ विद्वान अवसृष्टा से मर्माणि ते पर्यन्त 5मन्त्रोँ का भी समावेश करते हैँ ।इन मन्त्रोँ के ऋषि अप्रतिरथ हैँ ।इन मन्त्रोँ द्वारा इन्द्र की उपासना द्वारा शत्रुओँ स्पर्शाधको का नाश होता है ।
प्रथम मन्त्र “ऊँ आशुः शिशानो …. का अर्थ देखेँ त्वरा से गति करके शत्रुओँ का नाश करने वाला , भयंकर वृषभ की तरह, सामना करने वाले प्राणियोँ को क्षुब्ध करके नाश करने वाला . मेघ की तरह गर्जना करने वाला , शत्रुओँ आवाहन करने वाला . अति सावधान , अद्वितीय वीर , एकाकी पराक्रमी . देवराज इन्द्र शतशः सेनाओँ पर विजय प्राप्त करता है ।
चतुर्थाध्याय मे सप्तदश मन्त्र हैँ जो मैत्रसूक्त के रुप मेँ प्रसिद्ध है । इन मन्त्रो मेँ भगवान सूर्य की स्तुति है ” ऊँ आकृष्णेन रजसा ” मेँ भुवनभास्कर का मनोरम वर्णन है । यह अध्याय सूर्यनारायण का है ।
पंचमाध्याय मे 66मन्त्र है यह अध्याय प्रधान है , इसे शतरुद्रिय कहते हैँ  “शतसंख्यात रुद्रदेवता अस्येति शतरुद्रियम् । इन मन्त्रोँ मे रुद्र के शतशः रुप वर्णित हैँ । कैवल्योपनिषद मे कहा गया है कि शतरुद्रिय का अध्ययन से मनुष्य अनेक पातकोँ से मुक्त होकर पवित्र होता है । इसके देवता महारुद्र शिव हैँ ।
षष्ठाध्याय को महच्छिर के रुप मेँ माना जाता है । प्रथम मन्त्र मेँ सोम देवता का वर्णन है । प्रसिद्ध महामृत्युञ्जय मन्त्र ऊँ त्र्यम्बकं यजामहै इसी अध्याय मे है ।इसके देवता चन्द्रदेव हैँ ।
सप्तमाध्याय को जटा कहा जाता है । उग्रश्चभीमश्च मन्त्र मेँ मरुत् देवता का वर्णन है । इसके देवता वायुदेव है ।
अष्टमाध्याय को चमकाध्याय कहा जाता है । इसमेँ 29 मन्त्र हैँ । प्रत्येक मन्त्र मेँ “च “कार एवं “मे” का बाहुल्य होने से कदाचित चमकाध्याय अभिधान रखा गया है । इसके ऋषि “देव”स्वयं हैँ तथा देवता अग्नि हैँ ।प्रत्येक मन्त्र के अन्त मे यज्ञेन कल्पन्ताम् पद आता है ।
रुद्री के उपसंहार मेँ “ऋचं वाचं प्रपद्ये ” इत्यादि 24 मन्त्र शान्तयाध्याय के रुप मेँ एवं “स्वस्ति न इन्द्रो ” इत्यादि 12 मन्त्र स्वस्ति प्रार्थना के रुप मेँ प्रसिद्ध है ।

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