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मूल निवासी

astroadmin | March 18, 2018 | 0 | अध्यात्म और धर्म

जब मै मूल निवासी शब्द बोलता हूँ तो इसका मतलब होता है originator means प्रारंभिक । मूल निवासी शब्द को जानने से पहले हमे इसका इतिहास जानना होगा। आप में से कई लोगो ने bio पढ़ी होगी  इतिहास पढ़ी होगी। उसमे हमे पढ़ाया जाता है की हमारे पूर्वज कोई आदिमानव थे जो पत्थर तोड़ते थे या मांस खाते etc etc.
मतलब सभी लोग अगर बात करे तो ब्राह्मण क्षत्रिय  वैश्य या शुद्र । ये तो रहा मानव का initiallization जिसे बृत्तिश इतिहास कर हमे कहते आ रहे। जब मै इतिहास की बात करता हूँ तो मै इनमें brittish संस्कृत विद्वानों में ओल्डन वर्ग (१८५४-१९२०), अलब्रेट वेबर (१८२५-१९०१), फ्रेडरिक रोजन (१८०५-१८३७), अलफ्रेड लुडविग (१८३२-१९१२), जार्ज बुहलर (१८३७-१८९८), ज्युलियस जौली (१८४९-१९३२),
ओटोवॉन बोथलिंगम (१८१५-१९०४), मौरिस विंटरनिट्स (१८६३-१९३७), अर्नेस्ट कुहन (१८४६-१९२०) आदि थे। तीसरे वर्ग में ब्रिटेन में एच.एच. विल्सन (१७८६-१८६०), फ्रेडरिक मैक्समूलर (१८२३-१९००), मौनियर विलियम्स, अर्थन ऐंथोनी मैक्डोनल (१८५४-१९३०, ए.बी. कीथ (१८७९-१९४४) आदि थे। भारत में प्रशासन से जुड़े विद्वानों में चार्ल्स विलसन, विलियम जोन्स (१७४६-१७९४), कॉलब्रुक (१७६५-१८३६), स्टीवेंसन, ग्रिफिथ आदि मुखय थे मतलब एक वर्ग अंग्रेज़ो का
दूसरा वर्ग डी डी कौशाम्बी,राम विलास शर्मा,रोमिला थापर ,कुलदीप नैयर ,बिपिन चंद्र विपिन ,इरफान हबीब,रामशरण शर्मा,सतीश चंद्रा,सुमित सरकार,डी. एन. झाजैसे वाम्पथी इतिहास्कार है।
British  इतिहासकारो ने लगभग missonary वर्ग से जुड़े इतिहासकार रहे जिन्होंने 200 साल तक इतिहास लिखा बाद में वामपंथी ‘THE MYTH OF THE HOLY COW’ में डी. एन. झा ने लिखा कि ‘वैदिक जमाने में हिन्दू गाय का मांस खाते थे।’ यह किस तरह का शोध है ?
ये आप विचार कर सकते है ।
फिर उन्ही के समकालीन कुछ राष्टवादी लेखक पी एन. ओक,सावरकर,दयानंद स्वामी,लाजपत रॉय,एनी बेसेंट ,डेविड फ़्रॉली etc etc ने लिखी ।
अंग्रेजो का लेखन हिंदुस्तान में आने के बाद ही शुरू होता है ,
जो की 1835 में missonry कान्वेंट स्कूल से शुरू होता। पहले 1835 में maculay बाद में हंटर ने शिक्षा के लिए आयोग लाया। ध्यान रहे इनका एक ही लछ्य था की कैसे हिंदुस्तान कोई इसाई यत्व में जकड़ा जाये ।

परिणामस्वरूप यहाँ कॉलेज खोले गए और १७८४ में कलकत्ते में ‘एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल’ की स्थापना की गई। चार्ल्स बिल्किन्स पहला अंग्रेज अधिकारी था जिसने बनारस में संस्कृत भाषा सीखी और १७८५ में श्री मद्भागवद् गीता, १७८७ में हितोपदेश और १७९५ में महाभारत के शाकुन्तलोपखयान का अंग्रेजी में अनुवाद प्रकाशित किया।
जब १७६३ में विलियम जोन्स को ब्रिटिश सेटिलमेंट का मुखय न्यायाधीश नियुक्त किया गया तो उसने संस्कृत सीखी और १७८९ में महाकवि कालीदास के अभिज्ञानशाकुन्तलम् और १७९४ में मनुस्मृति का अंग्रेजी में अनुवाद किया। इसी समय (१८०२) दाराशिकोह के फारसी में, उपनिषदों का फ्रेंच लेखक एन्क्वेरिल डू पेरोन (१७२१-१८०५) द्वारा किया गया लेटिन अनुवाद प्रकाशित हुआ। इन साहित्यिक और दार्शनिक ग्रंथों ने यूरोप और विशेषकर जर्मनी में, संस्कृत भाषा और साहित्य के प्रति अभूतपूर्व जागृति एवं जिज्ञासा पैदा कर दी।
आगस्त विलहेम श्लेगल, (बोन यूनीवर्सिटी) जर्मनी, में पहला संस्कृत प्रोफेसर नियुक्त हुआ और उसका छोटा भाई फ्रेडरिक श्लेगल दोनों ही भारतीय दर्शन व साहित्य के अनन्य प्रशंसक थे।
एक दूसरे जर्मन संस्कृत विद्वान विल्हेम हम्बोल्ड और ऑगस्ट श्लेगल ने मिलकर भगवद् गीता का जर्मन में भाष्य प्रकाशित किया।
वह भारत में मेडीकल प्रोफेशन के एक सदस्य के रूप में, १८०८ में आया तथा १८३२ तक यहाँ रहा। भारत निवास के इस काल में उसने संस्कृत भाषा सीखी, इस आशा और उद्देश्य से कि शायदयह भाषा ज्ञान उसे हिन्दू धर्म शास्त्रों को समझने और आवश्यकता होने पर विकृत आर्थ करने और भारतीयों को ईसाईयत में धर्मान्तरित करने में सहायक हो सके। इस संस्कृत ज्ञान के आधार पर ही विलसन को, १८३२ में,
ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में संस्कृत की बोडेन चेयर का प्रथम अधिष्ठाता बनाया गया। यहाँ उसने सबसे पहले मिशनरियों के लिए दी रिलीजन एण्ड फिलोसोफिकल सिस्टम ऑफ दी हिन्दूज नामक पुस्तक लिखी। इस पुस्तके के लिखने के उद्देश्य के विषय में उसने कहाः
“These lectures were written to help candidates for a prize of £ 200/= given by John Muir, a well known Haileybury (where candidates were prepared for Indian Civil Services) man and great Sanskrit scholar, for the best refutation of the Hindu Religious Systems.” (Bharti, p.9)
अर्थात् यह लेखमाला उन व्यक्तियों की सहायता के लिए लिखी गई हैं जो कि म्यू द्वारा स्थापित दो सौं पौंड के पुरस्कार के लिए प्रत्याशी हों और जो हिन्दू धर्म ग्रन्थों का सर्वोत्तम प्रकार से खंडन कर सकें। (भारती, पृ. ९)
१८६० में, प्रो॰ विलसन के निधन के बाद, बोडेन चेयर का दूसरा अधिष्ठाता मौनियर विलियम्स हुआ।
१८१९ में बम्बई में जन्मा मौनियर एक कट्टर ईसाई था। यह हिन्दू धर्म को नष्ट करने को और भी अधिक वचनबद्ध था जैसाकि उसने
अपनी पुस्तक दी स्टडी ऑफ संस्कृत इन रिलेशन टू मिशनरी वर्क इन इंडिया (१८६१) इसमें उसने एक मिशनरी की तरह स्पष्ट कहाः
“When the walls of the mighty fortress of Hinduism are encircled, undermined and finally stormed by the soldiers of the Cross, the victory to Christianity must be signal and complete.” (p.262)
अर्थात् जब हिन्दू धर्म के मजबूत किलों की दीवारों को घेरा जाएगा, उन पर सुरंगे बिछाई जाऐंगी और अंत में ईसामसीह के सैनिकों द्वारा उन पर धावा बोला जाएगा तो ईसाईयत की विजय अन्तिम और पूरी तरह होगी (वही पृ. २६२)
मैकॉले कहता था की ईसाइयत की बीज बोन के लिए हमे पहले हिन्दुइस्म को खूब जोतना होगा। जैसे एक किसान अपनी खेत में कुछ भी नई फसल लगाने से पहले जोतता है ।
इस तरह भारत में आया “the aaryan invasion theory ,1835” जिसे हिंदी में कहते है “आर्य आगमन सिद्धांत ” जिसमे अंग्रेजो विद्वानों न ईसाईे मिशनरी भावना से प्रेरित होकर वैदिक देवतावाद का तुलनात्मक गाथावाद, विकासवाद और मानवइतिहास की दृष्टि से पक्षपातपूर्ण अनुवाद कर विशाल साहित्य लिखा। इस सिद्धान्त को बताने वाला मैक्समूलेर था जो उस समय ईस्ट इंडिया कंपनी में काम करता था।
आप किसी भी वाम्पथी इतिहास की बुक उठा लेना वह इन्हें अवश्य  कोट करते है ।
ईसाई लेखक हॉवेल Havell, E. B. (1915). The Ancient and Medieval Architecture of India: a study of Indo-Aryan civilisation में यहाँ तक  तो इस स्तर तक लिखता है की
“विष्णु एक पूज्य वीर था क्षत्रयो का गुरु और आर्य जाती को शिक्षा देने के लिए समय समय पर अवतार धारण करने वाला और उन्हें एनी जातियो पर विजय दिलाने वाला था। (आर्यन रूल इन इंडिया पृष्ठ 32)
अब जरा कोई विचार कर की क्या ये बात वैज्ञानिक है , अगर ऐसा ही था तो अब क्यों नही जन्म लेता ?? और अगर ऐसी बाते सत्य है तो वो बहूत ही आस्चर्य जनक बात या यु कहे की अलौकिक बात है । क्या ऐसी भी बाते हो सकती है । तो आप समझ सकते है की इतिहास इस स्तर पे लिखी गई है ।
फिर बाद में वामपंथी इतिहासकार रमेश चन्द मजूमदार ने आउट ऑफ़ लाइन एंशिएंट इंडियन हिस्ट्री में  ,एम् सी दास ने ऋग्वेद इंडिया फिर अंग्रेजो के सबसे चहेते नेहरू ने डिस्कोवरी ऑफ़ इंडिया में उन्ही को कोट किया।
लेकिन रास्ट्रवादी लेखको ने हमेशा इनका प्रतिकार किया है उनमे सबसे अग्रगामी 1824 में जन्मे पूज्य श्री दयानद स्वामी जी है ।

जिन्होंने सत्यार्थ प्रकाश में सबसे पहले मैक्स मूलर का खंडन और सत्य का मंडन किया । बाद में अन्य आर्य समाजी लेखको ने कई पुस्तके भी लिखी ।
जो जब मै आर्य शब्द की बात करता हूँ तो ये महाभारत और रामायण में वाल्मीक और व्यास रचित ग्रंथो में पांडव…राम और कृष्ण जैसे महापुरुषो को कहा गया है । जरा विचार करिये की अंग्रेजो ने किस तरह हमारे महापुरुषो को विदेशी ,लड़ाकू इत्यादि बिना किसी प्रमाण और तथ्यों के साबित कर दिया।
आर्य शब्द श्रेष्ठता का शब्द है जो की मात्र एक विशेषण था। व्यास के रामायण में अनार्य शब्द का उपयोग कैकेई के लिए भी हुआ है जब उन्होंने राम को वन भेजा।इसी तरह वेदों के एक मन्त्र में उपदेश करते हुए कहा है ”
कृण्वन्तो विश्वार्यम ” अर्थात सम्पूर्ण विश्व को आर्य बनाओ यहाँ आर्य शब्द श्रेष्ट के अर्थ में लिया गया है यदि आर्य कोई जाति या नस्ल विशेष होती तो सम्पूर्ण विश्व को आर्य बनाओ ये उपदेश नही होता |
जबकि स्वयम अम्बेडकर ने “शुद्र कौन थे” नाम की अपनी पुस्तक में आर्यों के विदेशी होने का प्रबल खंडन किया है |विश्वविख्यात एलफिन्सटन अपनी पुस्तक ” elphinston:history of india vol1
“में लिखते है “न मनुस्मृति में न वेदों में आर्यों के बाहर से आने का कोई वर्णन प्राप्त नही होता है | भारत में ऋग्वेद का प्रथम विदेशी अनुवादक   इसी तरह life and letter of में भी maxmullar का एक पत्र मिलता है जिसको उसने १८६६ में अपनी पत्नि को लिखा था पत्र निम्न प्रकार है –अर्थात मुझे आशा है कि मै यह कार्य सम्पूर्ण करूंगा और मुझे पूर्ण विश्वास है ,यद्यपि मै उसे देखने को जीवित न रहूँगा, तथापि मेरा यह संस्करण वेद का आध्न्त अनुवाद बहुत हद तक भारत के भाग्य पर और उस देश की लाखो आत्माओ के विकास पर प्रभाव डालेगा |
वेद इनके धर्म का मूल है और मुझे विश्वास है कि इनको यह दिखना कि वह मूल क्या है -उस धर्म को नष्ट करने का एक मात्र उपाय है ,जो गत ३००० वर्षो से उससे (वेद ) उत्त्पन्न हुआ है |
इसी तरह एक और दितीय पत्र मेक्समुलर ने १६ दि. १८६८ को भारत के तत्कालीन मंत्री ड्यूक ऑफ़ आर्गायल को लिखा था –
” the ancient religion of india is doomed , if christianity does not step in , whose fault will it be ?
अर्थात भारत के प्राचीन धर्म का पतन हो गया है , यदि अब भी इसाई धर्म नही प्रचलित होता है तो इसमें किसका दोष है ?
इन सबसे विदेशियों का उद्देश हम समझ सकते है |

” रामायण बालकाण्ड में आर्य शब्द आया है – •
श्री राम के उत्तम गुणों का वर्णन करते हुए वाल्मीकि रामायण में नारद मुनि ने कहा है –
आर्य: सर्वसमश्चायमं, सोमवत् प्रियदर्शन: | (रामायण बालकाण्ड १/१६) अर्थात् श्री राम आर्य – धर्मात्मा, सदाचारी, सबको समान दृष्टि से देखने वाले और चंद्र की तरह प्रिय दर्शन वाले थे “
” किष्किन्धा काण्ड १९/२७ में बालि की स्त्री पति के वध हो जाने पर उसे आर्य पुत्र कह कर रुधन करती है |”
बौद्धों के विवेक विलास में आर्य शब्द -” बौधानाम सुगतो देवो विश्वम च क्षणभंगुरमार्य सत्वाख्या यावरुव चतुष्यमिद क्रमात |”
” बुद्ध वग्ग में अपने उपदेशो को बुद्ध ने चार आर्य सत्य नाम से प्रकाशित किया है -चत्वारि आरिय सच्चानि (अ.१४ ) “
धम्मपद अध्याय ६ वाक्य ७९/६/४ में आया है जो आर्यों के कहे मार्ग पर चलता है वो पंडित है |
जैन ग्रन्थ रत्नसार भाग १ पृष्ठ १ में जैनों के गुरुमंत्र में आर्य शब्द का प्रयोग हुआ है – णमो अरिहन्ताण णमो सिद्धाण णमो आयरियाण णमो उवज्झाणाम णमो लोए सब्ब साहूणम “यहा आर्यों को नमस्कार किया है अर्थात सभी श्रेष्ट को नमस्कार
• जैन धर्म को आर्य धर्म भी कहा जाता है | [पृष्ठ xvi, पुस्तक : समणसुत्तं (जैनधर्मसार)]
मनु स्मृति में आया है कि –
शनकैस्तु क्रियालोपादिमा: क्षत्रियजातय:।
वृषलत्वं गता लोके ब्रह्माणादर्शनेन्॥10:43॥ –
निश्चय करके यह क्षत्रिय जातिया अपने कर्मो के त्याग से ओर यज्ञ ,अध्यापन,तथा संस्कारादि के निमित्त ब्राह्मणो के न मिलने के कारण शुद्रत्व को प्राप्त हो गयी। ”
पौण्ड्र्काश्र्चौड्रद्रविडा: काम्बोजा यवना: शका:।
पारदा: पहल्वाश्र्चीना: किरात: दरदा: खशा:॥10:44॥
पौण्ड्रक,द्रविड, काम्बोज,यवन, चीनी, किरात,दरद,यह जातिया शुद्रव को प्राप्त हो गयी ओर कितने ही मलेच्छ हो गए जिनका विद्वानो से संपर्क नही रहा।आप देख सकते है की सिन्धु घाटी सभ्यता के शिव और मेवाड़ के एकलिंगनाथ यानि भगवान शिव में कितनी समानता है ,
एक समय मेवाड़ में भी सिन्धु घाटी सभ्यता के लोग रहते थे और आज भी वह के लोग 4 सर वाले शिव की पूजा करते हैइस तरह से आधुनिक भारतीय और सिन्धु सभ्यताओ में समानता देखि जिससे स्पष्ट होता है की सिन्धु सभ्यता नष्ट नही हुई |
जेसे आज पौराणिक सभ्यता के साथ वेद और वैदिक ज्ञान है उसी तरह सिन्धु सभ्यता में भी था चुकी सिन्धु लिपि अभी तक पढ़ी नही गयी है लेकिन फिर भी कुछ शीलो पर बने चित्रों से वैदिक मन्त्रो का उस समय होना प्रसिद्ध है |
सिन्धु लिपि ब्राह्मी से मिलती है इसके अलावा सिन्धु सभ्यता में कई यज्ञ वेदिया मिली है अर्थात सिन्धु वासी अग्निहोत्र करते थे |इसी तरह सिन्धु सभ्यता में स्वस्तिक का चिन्ह मिला है जिसे यहा देखे ये अक्सर शुभ कार्यो में बनाया जाता है यज्ञ करते समय रंगोली के रूप में इसे यज्ञ वेदी को सजाने में भी बनाया जाता था |
ऋग्वेद में स्वस्तिवाचन से कई अर्थ है स्वस्ति का अर्थ होता है कल्याण करने वाला ,उत्तम ,शुभ आदि ये चिन्ह शुभ और कल्याण का प्रतीक है इसलिए इसका नाम स्वस्तिक हुआ है |
इस तरह अन्य कई प्रमाण मिल सकते है जिन्हें विस्तार भय से छोड़ते है इन सभी से सिद्ध है की सिन्धु सभ्यता आज भी विद्यमान है किसी ने उसे नष्ट नही किया थोडा बहुत अंतर अवश्य आया है क्यूंकि कोई भी चीज़ सदा एकसी नही होती लोगो के साथ साथ उन में भी बदलाव आता है |
डीएनए टेस्ट ने कई बार अलग अलग परिणाम दिए है आधुनिक डीएनए टेस्टों से भी ये साबित हुआ है की सवर्ण और दलित आदिवासी ,द्रविड़ सभी के पूर्वज एक ही थे कोई विदेशी नही थे जिसका प्रमाण ये टाइम्स ऑफ़ इंडिया में छपा ये रिसर्च पेपर की न्यूज़ है।
अब हम विदेशियों द्वरा काफी पहले निकाला गलत डीएनए रिपोर्ट की समीक्षा करते है
माइकल की डीएनए रिपोर्ट की समीक्षा –
२००१ टाइम्स ऑफ़ इंडिया में एक खबर छपी कि अमेरिका के वाशिंगटन में उत्ताह विश्वविध्यालय के बायोलोजी डिपार्टमेंट के विभागाध्यक्ष माइकल बाम्शाद ने डीएनए टेस्ट के आधार पर बताया कि भारत की sc ,st जातियों का डीएनए एक जेसा है तथा विदेशियों और gen,obc का एक जेसा है | जिससे उसने निष्कर्ष निकाला कि ब्राह्मण ,क्षत्रिय ,वैश्य आदि विदेशी थे और st sc मुल्निवाशी |
इस पर हम आपसे पूछते है कि मान लीजिये कि आपके परिवार वाले अमेरिका जा कर वश गये | तो उनका डीएनए आपसे मिलेगा अथवा नही | आप कहेंगे कि अवश्य मिलेगा | इसी प्रकार भारत से सवर्ण लोग विदेशो में गये थे |

ब्राह्मण विद्या के प्रचार हेतु ,क्षत्रिय दिग्विजय हेतु ,वेश्य व्यपार हेतु , और इनमे से कई लोग विदेशो में ही बस गये | अनेक विदेशी उन्ही की संताने है | आज भी बहुत सारे भारतीय विदेशो में जाकर व्यापार ,नौकरी कर रहे है | अनेक श्रमिक भी बाहर जा कर बस गये है | तो उनका डीएनए भारत में रह रहे उनके परिजनों से क्यूँ नही मिलेगा ? तो दोनों में से किसे मूल निवासी कहेंगे | परिवार वाले या बाहर वालो को अथवा दोनों को ?
पूर्वकाल में भारत साधन सम्पन्न देश था इसलिए शुद्रो को विदेश जाने की ज्यादा आवश्यकता नही हुई |
दूसरी बात यह कि माइकल ने केवल दक्षिण के १ या २ गाँवों का ही डीएनए टेस्ट क्यूँ करवाया क्या १०० करोड़ आबादी में १ या २ गाँव से निष्कर्ष निकालना तर्क संगत होगा ?
उदयपुर राज्य के राजा गौह की शादी ईरान के प्रसिद्ध बादशाह नौशेरवा की पौत्री के साथ हुई थी |
लोगो का विचार है की जिला बस्ती के रहने वाले कलहंस क्षत्रिय भी ईरान के रहने वाले है |
जेसा की हमने पहले बताया की कण्व ऋषि ने मिश्र में जा कर शुद्धिकरण किया था और इनमे से कइयो को भारत भी बसाया जिनमे कई शुद्र ,क्षत्रिय ,वेश्य और ब्राह्मण थे |
इसी तरह इस्लामिक आक्र्मंकारियो से भयभीत हो कर पारसी लोग इरान से भारत वश गये |
गुजरात में एक जगह अफ़्रीकी आदिवासी भी है जो आज भी अफ़्रीकी संस्कृति और भाषा रहन सहन प्रयोग में करते है |
आर्य एक विशेषण है जो किसी के साथ भी प्रयुक्त हो सकता है वनवासी ,शुद्र ,दलित सभी के साथ बस उसके कर्म श्रेष्ट हो रामायण में जाम्बवान ,हनुमान ,बालि ,सुग्रीव आदि वनवासी जातियों के लिए आर्य शब्द प्रयुक्त हुआ है अत: स्पष्ट है कि ये भी आर्य बन सकते है |
प्रसिद्ध अग्रेँज इतिहासकार कर्नल.टाड के अनुसार बप्पा ने कई अरबी युवतियोँ से विवाह करके 32 सन्तानेँ पैदा जो आज अरब मेँ नौशेरा पठान के नाम से जाने जाते हैँ।
उपरोक्त वर्णन से हमने भारत में कुछ विदेशी जातियों पर प्रकाश डाला जिससे हम इस निष्कर्ष पर पंहुचे है कि भारत के हर वर्ग में मध्यकाल में कुछ विदेशी जातियों का भी मिश्रण है चाहे वो शुद्र हो या ब्राह्मण |
अगली बात अब आते है रेस थ्योरी पर जिसे हिंदी में कहते है नस्ल विज्ञान । वैसे इस नस्ल विज्ञानं के जनक है
Johann Friedrich Blumenbach 1752,जिन्होंने दुनिया भर के नस्लो का अध्यन किया था उन्हें classifed किया था । बाद में अंग्रेजो उनकी इस थ्योरी को उपनेषवाद के रूप में introduced kiya. अंग्रेजो ने न केवल आर्यो को नस्ल बता कर 5000 साल पहले आया हुआ
विदेशी कहा बल्कि शेष जातियो को भी 15000 साल पहले आया प्रोटोऑस्ट्रेलिओड(निग्रोइअं और हब्शी) कहा। उन्होंने कहा की शेष जातीया भी भारत में अफ्रीका से आई । जिसका प्रमाण हम विक्कीपीड़िया के माध्यम से दे रहे है ।

एक अन्य नस्ल विज्ञानी वरिष्ठ नस्ल विज्ञानी हावर्ड यूनिवर्सिटी का विवरण इस  देखे

ऋग्वेद के अनुसारः
ब्राह्मणासः सोमिनो वाचमक्रत , ब्रह्म कृण्वन्तः परिवत्सरीणम् ।
अध्वर्यवो घर्मिणः सिष्विदाना, आविर्भवन्ति गुह्या न केचित् ॥ ऋग्वेद 7/103/8 ॥
ब्राह्मण वह है जो शांत, तपस्वी और यजनशील हो । जैसे वर्षपर्यंत चलनेवाले सोमयुक्त यज्ञ में स्तोता मंत्र-ध्वनि करते हैं वैसे ही मेढक भी करते हैं । जो स्वयम् ज्ञानवान हो और संसार को भी ज्ञान देकर भूले भटको को सन्मार्ग पर ले जाता हो, ऐसों को ही ब्राह्मण कहते हैं । उन्हें संसार के समक्ष आकर लोगों का उपकार करना चाहिये ।
महर्षि मनु के अनुसार
विधाता शासिता वक्ता मो ब्राह्मण उच्यते।
तस्मै नाकुशलं ब्रूयान्न शुष्कां गिरमीरयेत्॥
अर्थात-शास्त्रो का रचयिता तथा सत्कर्मों का अनुष्ठान करने वाला, शिष्यादि की ताडनकर्ता,वेदादि का वक्ता और सर्व प्राणियों की हितकामना करने वाला ब्राह्मण कहलाता है। अत: उसके लिए गाली-गलौज या डाँट-डपट के शब्दों का प्रयोग उचित नहीं” (मनु; 11-35)
यजुर्वेद के अनुसारः
वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः । यजुर्वेद
ब्राह्मणत्व एक उपलब्धि है जिसे प्रखर प्रज्ञा, भाव-सम्वेदना, और प्रचण्ड साधना से और समाज की निःस्वार्थ अराधना से प्राप्त किया जा सकता है । ब्राह्मण एक अलग वर्ग तो है ही, जिसमे कोई भी प्रवेश कर सकता है, बुद्ध क्षत्रिय थे, स्वामि विवेकानंद कायस्थ थे, पर ये सभी अति उत्त्कृष्ट स्तर के ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण थे । ”ब्राह्मण” शब्द उन्हीं के लिये प्रयुक्त होना चाहिये, जिनमें ब्रह्मचेतना और धर्मधारणा जीवित और जाग्रत हो , भले ही वो किसी भी वंश में क्युं ना उत्पन्न हुये हों
न जटाहि न गोत्तेहि न जच्चा होति ब्राह्मणो।
यम्हि सच्चं च धम्मो च सो सुची सो च ब्राह्मणो॥
भगवान बुद्ध धर्म कहते हैं कि ब्राह्मण न तो जटा से होता है, न गोत्र से और न जन्म से। जिसमें सत्य है, धर्म है और जो पवित्र है, वही ब्राह्मण है।
महाभारत के कर्ता वेदव्यास और नारदमुनि के अनुसार “जो जन्म से ब्राह्मण हे किन्तु कर्म से ब्राह्मण
नहीं हे उसे शुद्र (मजदूरी) के काम में लगा दो” (सन्दर्भ ग्रन्थ – महाभारत)

ऐतरेय ऋषि दास अथवा अपराधी के पुत्र थे|
परन्तु उच्च कोटि के ब्राह्मण बने और उन्होंने ऐतरेय ब्राह्मण और ऐतरेय उपनिषद की रचना की| ऋग्वेद को समझने के लिए ऐतरेय ब्राह्मण अतिशय आवश्यक माना जाता है|
ऐलूष ऋषि दासी पुत्र थे | जुआरी और हीनचरित्र भी थे | परन्तु बाद में उन्होंने अध्ययन किया और ऋग्वेद पर अनुसन्धान करके अनेक अविष्कार किये|ऋषियों ने उन्हें आमंत्रित कर के आचार्य पद पर आसीन किया | (ऐतरेय ब्राह्मण)
सत्यकाम जाबाल गणिका (वेश्या) के पुत्र थे परन्तु वे ब्राह्मणत्व को प्राप्त हुए |
राजा दक्ष के पुत्र पृषध शूद्र होगए थे,प्रायश्चित स्वरुप तपस्या करके उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया |
धृष्ट नाभाग के पुत्र थे परन्तु ब्राह्मण हुए और उनके पुत्र ने क्षत्रिय वर्ण अपनाया |
आगे उन्हींके वंश में पुनः कुछ ब्राह्मण हुए
हारित क्षत्रियपुत्र से ब्राह्मणहुए
: मातंग चांडालपुत्र से ब्राह्मण बने |
ऋषि पुलस्त्य का पौत्र रावण अपनेकर्मों से राक्षस बना |
राजा रघु का पुत्र प्रवृद्ध राक्षस हुआ |
त्रिशंकु राजा होते हुए भी कर्मों से चांडाल बन गए थे |
विश्वामित्र के पुत्रों ने शूद्रवर्ण अपनाया |विश्वामित्र स्वयं क्षत्रिय थे परन्तु बाद उन्होंने ब्राह्मणत्व को प्राप्त किया |
विदुर दासी पुत्र थे | तथापि वे ब्राह्मण हुए और उन्होंने हस्तिनापुर साम्राज्य का मंत्री पद सुशोभित किया |
विदुर को पांडव चाचा कहके बुलाते थे। और महाराज धृतरास्ट्र कोई भी काम बिना विदूर के सलाह के नही करते थे।
अब ये लेख को सक्षिप्त में रखने की कोसिस किया हूँ अपनी बातो को विराम देते हुए विवेकानंद जी को कोट कर रहा हूँ जो उन्होंने अपने पत्र में लिखा।
“अगर सम्पूर्ण भारत वासी समुद्र के पास खड़े हो कऱ समुद्र से कीचड़ निकाल कर पश्चिम के देशो पे फेके तो ये तिनका मात्र भी न होगा। जो वो हमारे साथ करते है ।”
ॐ तत् सत्

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कल्पवास

astroadmin | January 10, 2019 | 0

कल्पवास वेदकालीन अरण्य संस्कृति की देन है। कल्पवास का विधान हज़ारों वर्षों से चला आ रहा है। जब तीर्थराज प्रयाग में कोई शहर नहीं था तब यह भूमि ऋषियों की…

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