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मागी नाव न केवटु आना। कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना॥

astroadmin | March 19, 2018 | 0 | अध्यात्म और धर्म

 

श्री राम ने केवट से नाव माँगी, पर वह लाता नहीं। भगवान बार बार कह रहे हैं की केवट नाव लाओ, नाव लाओ। लेकिन एक केवट है सुन ही नही रहा है। संत जन कहते हैं ऐसा नही है की भगवान की बात मानना नही चाह रहा है, क्योंकि केवट जानते हैं। अगर राम जी नाव में बैठ गए तो चले जायेंगे। किसी के कहने से रुकते नही हैं भगवान। महाराज दशरथ ने रोका पर नही रुके, माता ने रोका पर नही रुके, गुरु वशिष्ठ ने रोका पर नही रुके, सुमंत्र ने रोका नही रुके, और निषादराज गुह ने रोका तब भी नही रुके। अब मैं रोकूंगा तो भी नही रुकेंगे। लेकिन जायेंगे तो तब जब मैं नाव लेकर आऊंगा। मैं नाव नही लाऊंगा। ये प्रेम है भक्त का कहीं मेरे भगवान ना चले जाएँ।

केवट कहते हैं भगवान! मैं आपके मर्म को जनता हूँ। अब थोड़ा सोचिये भगवान के मर्म को कौन जान सकता हैं? बड़े बड़े योगी आये और चले गए, बड़े बड़े ज्ञानी और बुद्धिजीवी आपके रहस्य को , आपकी सत्ता और आपके स्वरूप को नही जान पाये। पर आपके मर्म को, भेद को मैं जाना गया हूँ।

भगवान कहते हैं- केवट तुम ये बताओ की नाव में बिठाओगे या नही? क्योंकि हमें देर हो रही है और हमें जाना है।

केवट कहते हैं प्रभु तुम्हारे चरण कमलों की धूल के लिए सब लोग कहते हैं कि वह मनुष्य बना देने वाली कोई जड़ी है। जिसके छूते ही पत्थर की शिला(अहिल्या) स्त्री बन गई। मेरी नाव तो काठ(लकड़ी) की है। और काठ पत्थर से ज्यादा कठोर तो होता नहीं है। मेरी नाव भी मुनि की स्त्री हो जाएगी और इस प्रकार मेरी नाव उड़ जाएगी, मैं लुट जाऊँगा। आप पार भी नही पा पाएंगे और मेरी रोजी-रोटी भी छिन जाएगी। मैं तो इसी नाव से सारे परिवार का पालन-पोषण करता हूँ। दूसरा कोई धंधा नहीं जानता।

जौं प्रभु पार अवसि गा चहहू। मोहि पद पदुम पखारन कहहू॥ हे प्रभु! यदि तुम अवश्य ही पार जाना चाहते हो तो मुझे पहले अपने चरणकमल पखारने (धो लेने) के लिए कह दो॥

एक संत कहते हैं इसी बीच केवट का बेटा आ गया वो कहता है की पिताजी, इनके सिर्फ चरणों से ही खतरा नही है इनके तो हाथों से भी खतरा है। आपको याद होगा न की इन्होने शिव धनुष को सिर्फ हाथ लगाया था और उसके 2 टुकड़े हो गए थे। इसलिए इनके हाथों में भी जादू है।

जब लक्ष्मण जी ने ये बात सुनी तो कहते हैं बाप तो बाप बेटा भी उस्ताद है। ये दोनों बाप-बेटा हमें पार नही जाने देंगे। लक्ष्मण जी सोच रहे हैं बस एक बार नाव में बैठ जाएँ फिर देखूंगा इसको। क्योंकि लक्ष्मण जी को अंदर से बुरा लग रहा है। मेरे होते हुए रघुनाथ जी को हाथ फैलाकर मांगना पड़ रहा है। लक्ष्मण जी को अच्छा नही लग रहा है। लेकिन भगवान इस लीला का आनंद ले रहे हैं। भगवान को ऐसे हठीले भक्त बहुत अच्छे लगते हैं। क्योंकि उनके हट्ठ में भी प्रेम है।

केवट कहते हैं-
*पद कमल धोइ चढ़ाइ नाव न नाथ उतराई चहौं। मोहि राम राउरि आन दसरथसपथ सब साची कहौं॥*
*बरु तीर मारहुँ लखनु पै जब लगि न पाय पखारिहौं। तब लगि न तुलसीदास नाथ कृपाल पारु उतारिहौं॥*

अर्थ: हे नाथ! मैं चरण कमल धोकर आप लोगों को नाव पर चढ़ा लूँगा, मैं आपसे कुछ उतराई नहीं चाहता। हे राम! मुझे आपकी दुहाई और दशरथजी की सौगंध है, मैं सब सच-सच कहता हूँ। लक्ष्मण भले ही मुझे तीर मारें, पर जब तक मैं पैरों को पखार न लूँगा, तब तक हे तुलसीदास के नाथ! हे कृपालु! मैं पार नहीं उतारूँगा।

सुनि केवट के बैन प्रेम लपेटे अटपटे। बिहसे करुनाऐन चितइ जानकी लखन  तन॥केवट के प्रेम में लपेटे हुए अटपटे वचन सुनकर करुणाधाम श्री रामचन्द्रजी जानकीजी और लक्ष्मणजी की ओर देखकर हँसे॥ धन्य है ऐसा भक्त जिसने भगवान के चेहरे पर हंसी ला दी।

बेगि आनु जलपाय पखारू। होत बिलंबु उतारहि पारू॥ श्री रामचन्द्रजी केवट से मुस्कुराकर बोले भाई! तू वही कर जिससे तेरी नाव कोई नुकसान ना हो। भगवान कहते हैं-भैया! जल्दी पानी ला और पैर धो ले। देर हो रही है, पार उतार दे।

गोस्वामी जी कहते हैं गजब की बात है जो सबको पार उतारते हैं वो आज कह रहे हैं की केवट हमें पार उतार दे भैया।
*जासु नाम सुमिरत एक बारा। उतरहिं नर भवसिंधु अपारा॥ सोइ कृपालु केवटहि निहोरा। जेहिं जगु किय तिहु पगहु ते थोरा॥*
अर्थ: एक बार जिनका नाम स्मरण करते ही मनुष्य अपार भवसागर के पार उतर जाते हैं और जिन्होंने (वामनावतार में) जगत को तीन पग से भी छोटा कर दिया था (दो ही पग में त्रिलोकी को नाप लिया था), वही कृपालु श्री रामचन्द्रजी (गंगाजी से पार उतारने के लिए) केवट का निहोरा कर रहे हैं!
ये बात सुनकर गंगा जी को शंका हुई है ये साक्षात भगवान होकर भी पार उतारने के लिए केवट का निहोरा कैसे कर रहे हैं लेकिन समीप आने पर अपनी उत्पत्ति के स्थान पदनखों को देखते ही उन्हें पहचानकर देवनदी गंगाजी हर्षित हो गईं। वे समझ गईं कि भगवान नरलीला कर रहे हैं, इससे उनका मोह नष्ट हो गया। अब गंगा जी सोच रही है यदि मेरा इन चरणों का स्पर्श हुआ तो मैं आज धन्य होऊँगी।

केवट राम रजायसु पावा। पानि कठवता भरि लेइ आवा॥  केवट श्री रामचन्द्रजी की आज्ञा पाकर कठौते में भरकर जल ले आया।
अति आनंद उमगि अनुरागा। चरन सरोज पखारन लागा॥  अत्यन्त आनंद और प्रेम में उमंगकर वह भगवान के चरणकमल धोने लगा।
सब देवता फूल बरसाकर सिहाने लगे कि इसके समान पुण्य की राशि कोई नहीं है॥

केवट ने परिवार सहित भगवान के चरण धोये हैं। और फिर भगवान के चरणों का चरणामृत(चरणोदक) पिया है। केवट कहते हैं भगवान आपको तो मैं बाद में पार उतारूंगा लेकिन आपके चरणामृत ने मेरे पितरों को भवसागर से पार कर दिया। और फिर आनंदपूर्वक प्रभु श्री रामचन्द्रजी को गंगाजी के पार ले गया॥

जब पार नाव लग गई है तो निषादराज गुह और लक्ष्मणजी सहित श्री सीताजी और श्री रामचन्द्रजी नाव से उतरकर गंगाजी की बालू रेत में खड़े हो गए। केवट उतरकर भगवान के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया है। अब भगवान को थोड़ा संकोच हुआ है और मन में सोच रहे हैं की केवट को कुछ देना चाहिए।
जैसे ही भगवान के मन में आया है सीधे जानकी जी के मन में आ गया। क्योंकि राम का मन तो सीता जी ही हैं।
पिय हिय की सिय जाननिहारी। तुरंत सीताजी ने अपनी ऊँगली से रत्नजड़ित अंगूठी उतारी।
और कृपालु श्री रामचन्द्रजी ने केवट से कहा, नाव की उतराई लो।

केवट ने व्याकुल होकर चरण पकड़ लिए॥ केवट कहते हैं-
*नाथ आजु मैं काह न पावा। मिटे दोष दुख दारिद दावा॥ बहुत काल मैं कीन्हि मजूरी। आजु दीन्ह बिधि बनि भलि भूरी॥*
हे नाथ! आज मैंने क्या नहीं पाया! मेरे दोष, दुःख और दरिद्रता की आग आज बुझ गई है। मैंने बहुत समय तक मजदूरी की। विधाता ने आज बहुत अच्छी भरपूर मजदूरी दे दी।

*अब कछु नाथ न चाहिअ मोरें। दीन दयाल अनुग्रह तोरें॥*
हे नाथ! हे दीनदयाल! आपकी कृपा से अब मुझे कुछ नहीं चाहिए।

*बहुत कीन्ह प्रभु लखन सियँ नहिं कछु केवटु लेइ। बिदा कीन्ह करुनायतन भगति बिमल बरु देइ॥*
अर्थ : प्रभु श्री रामजी, लक्ष्मणजी और सीताजी ने बहुत आग्रह (या यत्न) किया, पर केवट कुछ नहीं लेता। तब करुणा के धाम भगवान श्री रामचन्द्रजी ने निर्मल भक्ति का वरदान देकर उसे विदा किया॥

इस प्रकार प्रभु श्री राम ने केवट पर अपनी कृपा की है।

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