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महाभारत

astroadmin | March 19, 2018 | 0 | अध्यात्म और धर्म

सामान्यतया अधिकांश  लोग  महाभारत अध्ययन करने के बजाय महाभारत के आधार पर  लिखे गये काव्य और कहानियों के आधार  पर महाभारत  के वीरों  पर  तुलनात्मक टिप्पणी करने लगते  हैं।
#पितामह  भीष्म #आचार्य द्रोण  #कुलगुरू कृपाचार्य  और #द्रोणपुत्र  अश्वत्थामा  ने  कभी  भी  अपने आप को अर्जुन  के #समकक्ष का धनुर्धर  नहीं  #माना ।

केवल  #कर्ण  जो स्वयं को अर्जुन से श्रेष्ठ  धनुर्धर समझते  थे ।
इसलिए  संक्षेप  में  ही महाभारत के पहले  के युद्धों  को लिख दे रहा हूँ।
*****
1: पहली बार आचार्य द्रोण के गुरुकुल  के दीक्षांत समारोह में चुनौती देता है । अर्जुन  स्वयं  सन्नध हो आगे आता  है । यह और बात है कि कुल गुरू कृपाचार्य ने द्वन्द युद्ध  होने नहीँ  दिया।
लेकिन
15 दिन  के अन्दर  ही  वास्तविक युद्ध  होता है ।
****
आचार्य द्रोण ने  गुरु दक्षिणा में  राजा द्रुपद  को बन्दी बना कर लाने का आदेश दिया।
दुर्योधन  अपने  सभी  भाइयों   मित्र  कर्ण  मामा शकुनि  सहित  एक अक्षौहिणी  सेना  सहित
राजा द्रुपद  के  राज्य पर आक्रमण  करता है ।
उस समय द्रुपद सेना  के प्रमुख  योद्धा  भी बाहर  थे।
बावजूद   इसके   महाराज  द्रुपद ने दुर्योधन और  कर्ण   की  इस  बड़ी   सेना  को  तीन  प्रहर  में   पराजित   कर  दिया   और
कर्ण  दुर्योधन  आदि  पैदल  भाग कर हस्तिनापुर आ गये।
******
#वीरता की  #कसौटी   #विजय  या  #वीरगति
*******
तथाकथित   #कवचकुण्डल  पहने  हुए   पलायन
*****
तीसरे   दिन   युधिष्ठिर  के नेतृत्व  में   द्रुपद  महाराज   पर  आक्रमण।
साथ में आयी  सेना  की संदिग्ध निष्ठा  के  कारण    सेना को छोड़ – अपने अग्रज युधिष्ठिर को भी महाराज समझ  कर बाहर  बैठा कर
भीम  अर्जुन   नकुल  सहदेव  ने आक्रमण   किया  और  एक  प्रहर से  भी  कम समय में
#अर्जुन ने  महाराज  #द्रुपद को  #बन्दी  बना  लिया  ।
******
4  चार   युद्ध  महाभारत   के  पहले   का  और  लिखूँ गा ।#धनुर्वेद:-  (2)

#महादेवशिव-#परशुराम और #अर्जुन

#भगवानपरशुराम  यद्यपि कि स्वयं  ही भगवान विष्णु के रोषावतार हैं
लेकिन धनुर्वेद का ज्ञान उन्होंने  #महादेवशिव से प्राप्त किया था।
महाभारत काल द्वापर  युग में  भगवान परशुराम  के  #तीन शिष्य  #महायोद्धा  के रूप  में #विख्यात  हुए
#पितामह भीष्म  – #आचार्य  द्रोण  और  #दानवीरकर्ण ।।
******
सामान्य रूप  से सभी  लोग  भी  और  स्वयं  #अर्जुन  भी  अपना  परिचय  #द्रोणशिष्य   के रूप  में  ही  देता  है।
जैसे  सभी  विशिष्ट  विद्वान  और  महान वैज्ञानिक भी  अपने  प्राथमिक विद्यालय  के गुरूजनों  का  सामाजिक रूप  में   चरण वंदन करते हैं  ।
लेकिन  वास्तविक रूप  में  उच्च शिक्षा  के उपरांत यह  शिष्य  बहुत  बड़े  होते  हैं।
*****
उसी प्रकार  से  अर्जुन  के लिए  आचार्य द्रोण  की  शिक्षा – आधुनिकतम  और  सर्वोच्च  नहीँ  थी ।
****
इस  गुरु कुल के बाद  सभी  #देवताओं  ने #अपने  #स्वार्थ  के लिए  अपने अपने   देवास्त्र  और  दिव्यास्त्र अर्जुन  को प्रदान  किया ।
*****
#और  #अन्ततः
अर्जुन  ने  सीधे सीधे साक्षात  #महादेव #शिव  को कठिन -कठोर तपश्चर्या   और  #रणसन्तोष  से   प्रसन्न  कर उनसे
#पूर्ण #पशुपताश्त्र  भी  प्राप्त  किया  जो  #महादेव  ने  केवल  और  केवल  #अर्जुन  को  प्रदान  किया  ।
इसके पूर्व   अत्यन्त  प्रिय  भक्तों  को भी
#लघु #पशुपताश्त्र  ही  दिया  था ।
****
अर्जुन  ने  जीवन में   कभी  – एक बार  भी पशुपति नीलकंठ अस्त्र   का  प्रयोग  नहीं   किया  ।
उसकी   सज्जनता  और   धैर्य  के  कारण  बहुत   लोगों  का नाम   वीरों   में   लिखा  गया  ।
*************
वस्तुतः  अर्जुन   अपने   गुरु  के  भी  गुरु  #भगवानपरशुराम  का  #गुरुभाई  बना ।
लेकिन
आचरण   व्यवहार  में  #द्रोणशिष्य  ही
बना रहा ।

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