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मतवाद

astroadmin | March 19, 2018 | 0 | अध्यात्म और धर्म , सामान्य जानकारी

मतवाद से हानि-मतवाद से मनुष्य मतवाला हो जाता है।
अपने मत के समर्थन के अलावा वह न कुछ देख सकता है, न समझ सकता है। ऐसे व्यक्ति को गीता (2/46) में अविपश्चित् (विकल्प देखने में असमर्थ, मूर्ख) तथा नास्तिक  (न अन्यत् अस्ति कहने वाला) कहा है-
यामिमां पुष्पितां वाचः प्रवदन्त्यविपश्चिताः।
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः।।

भारत में एक और कठिनाई है। यहां विचार स्वातन्त्र्य में हर विचार जो अधिक चर्चा के कारण तर्क जैसा लगता है, उसे स्वीकार कर लेते है। बौद्ध लोगों ने अपने मत की प्रशंसा के लिए वैदिक मत की नकल कर उसकी निन्दा शुरू की तथा इतना आगे बढ़ गये कि भारत का विरोध करने लगे और विदेशी आक्रमणकारियों का समर्थन कर देश को गुलाम बनवा दिया। सबसे पहले वही अपना धर्म बदले जिसके कारण भारत में बौद्ध मत समाप्त हो गया।
अंग्रेजी शासन में भारत विरोध की नयी लहर में वामपंथी तथा नये बौद्ध बने। अंग्रेजों ने हर ऐसे समाज को बढ़ावा दिया जो हिन्दू धर्म की वर्ण व्यवस्था विशेषकर ब्राह्मणों का विरोध करे।
वे मूर्ति पूजा का भी विरोध कर अरबों लोगों की हत्या कर चुके हैं पर गले में ईसा की मूर्ति लटकाये रहते हैं। चीन, जापान आदि में बौद्ध धर्म वहाँ की प्राचीन परम्परा के साथ समन्वय कर रहा था अतः वहाँ वह स्थायी तथा देशभक्त हैं। भारत में तर्क तथा विचार स्वातन्त्र्य के नाम पर केवल आतंकवाद का समर्थन तथा देश विरोध में टीवी पर चर्चा चलती रहती है तथा मूल समाचार प्रायः बन्द हो गया है।
हमारा उद्देश्य दयानन्द या बुद्ध की निन्दा नहीं है, बल्कि सत्य जानना है। कई आर्यसमाजी विद्वानों के प्रति मेरी श्रद्धा है। पर जान बूझ कर फैलाये हुए भ्रम और पाखण्ड का निराकरण करना जरूरी है। कई लोग कहते हैं कि दयानन्द ने समाज की कुरीतियों तथा पाखण्ड का विरोध किया। पर उन्होंने वेद के नाम पर कई नये पाखण्ड आरम्भ कर दिये।
जैसे कि जब जहाँ इच्छा हुयी, आग में कुछ चीजें जला कर वातावरण की शुद्धि करने लगते हैं जिसका वेद में कहीं उल्लेख नहीं है।
जाति व्यवस्था में कोई बुराई नहीं है, पूरे विश्व में विभिन्न प्रकार के कामों के लिए सदा से जाति रही है। जाति के नाम पर अन्याय और अत्याचार गलत है। उसे दूर करने के बदले जाति व्यवस्था को समाप्त करने की कोशिश की। जैसे सिर दर्द होने पर दर्द दूर करने के बदले सिर काट दें। बाद मे ध्यान गया कि वेद में भी इसका उल्लेख है।
तब कहा कि यह जन्म नहीं, कर्म से है तथा इसके लिए मनुस्मृति का 30% भाग निकाला तथा अभी गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के कुलपति सुरेन्द्र कुमार द्वारा 60% भाग निकाल कर मनुस्मृति के समर्थन में आन्दोलन कर रहे हैं। कोई भी अशिक्षित मूर्ति पूजक भी ऐसे मूर्ख नहीं थे कि मूर्ति को भगवान माने।

उसे ब्रह्म के विभिन्न रूप का ध्यान करने के लिए उसकी मूर्ति मानते थे। जैसे आर्यसमाजी दयानन्द का सम्मान करने के लिए हर जगह उनकी मूर्ति लगाते हैं। मूर्ति का विरोध करने के कारण इस्लाम या इसाई मत से असन्तुष्ट कुछ लोग इससे आकर्षित होते हैं। पर वेद का मूल आधार नष्ट करने से हिन्दू धर्म को कोई लाभ नहीं है।
इसी तरह बौद्ध अवतार का उद्देश्य पुराणों में कहा है कि यह असुरों को मोहित कर भारत की रक्षा के लिए हुआ था। पर बौद्ध ग्रन्थों में 28 बुद्धों का वर्णन है  (स्तूप वंश)। विष्णु अवतार बुद्ध इनमें नहीं है। वे अलग हैं।

कश्यप  (17500 ईपू) को प्रथम बुद्ध कहा है। यह देव दैत्य मनुष्य के गुरु थे। योगवासिष्ठ में काकभुशुण्डि का स्थान मेरु (प्राड़्मेरु पामीर) से उत्तर पूर्व चीन में कहा गया है। इनको चीन में अमिताभ बुद्ध कहा है।
इन्होंने प्रायः 7000 ईपू में रावण को उपदेश दिया था जिसे लड़्कावतार सूत्र कहते हैं। उससे थोड़ा पहले सुमेधा ऋषि हुए थे जिन्होंने परशुराम को दीक्षा दी थी। इनका उपदेश दुर्गा सप्तशती तथा त्रिपुरा रहस्य में है। इनको ही बौद्ध लोग सुमेधा बुद्ध कहते हैं तथा 10 महाविद्याओं को 10 प्रज्ञा पारमिता कहते हैं। महाभारत काल में शाक्यसिंह बुद्ध नेपाल गये थे तथा वहाँ के राजा को दीक्षा दी थी।
उसके बाद उत्तर प्रदेश तथा बिहार के स्थानों में 7 बुद्ध हुए जिनमें 3 ने अपना उपदेश लिखित रूप में दिया जिससे वे सुरक्षित रहे-कनकमुनि, क्रकुच्छन्द, विपश्यि, शिखि-ये नाम सारनाथ स्तूप में हैं तथा सिद्धार्थ बुद्ध ने उल्लेख किया है। इक्ष्वाकु वंश के शुद्धोधन के पुत्र सिद्धार्थ बुद्ध 1887-1807 ईपू में थे। इन्होंने असुरों को नहीं केवल मगध राजा बिम्बिसार तथा अजातशत्रु को मोहित कर उनके क्षेत्र में अपना प्रचार किया जिसका प्रभाव अभी तक बिहार में है तथा काशी का विपरीत मगध कहा गया।

इनके देहान्त के 150 वर्ष बाद धान्यकटक (ओडिशा का कटक) में मैत्रेय बुद्ध हुए। उनके कुछ बाद दीपंकर बुद्ध ओडिशा के राजा इन्द्रभूति के गुरु थे जिनसे लामा परम्परा शुरू हुई। 1400 ईपू में कश्मीर में लोकधातु बुद्ध हुए जिन्होंने मध्य एशिया के बौद्धों को बुला कर पूरे कश्मीर को नष्ट भ्रष्ट कर दिया (43वें गोनन्द वंशी राजा अशोक काल में)। प्रायः 600 ईपू में कोसाम्बी में गौतम बुद्ध हुए जिन्होंने कई राजाओं की मदद से हिन्दू मन्दिर मठों पर कब्जा किया  (शंकर दिग्विजय)। ये अपने दल के साथ राजाओं से मिलने जाते थे तथा हल्ला मचा कर अकेले पण्डितों को निरुत्तर करते थे
(आर्यसमाज की तरह)।
विष्णु अवतार बुद्ध प्रायः 800 ईपू में मगध में अजिन ब्राह्मण के पुत्र के रूप में हुए। इन्होंने असुरों को मोहित किया था। 824 ईपू में असीरिया का विशाल आक्रमण मथुरा में कलिंग राजा खारावेल द्वारा पराजित होने पर 757 ईपू में असीरिया की रानी सेमिरामी ने उत्तर अफ्रीका तथा मध्य एशिया के सभी राजाओं की सहायता से 35 लाख की विशाल सेना भारत पर आक्रमण के लिए इकट्ठा की। तब भी भारत पर विजय में सन्देह था।
अतः 2 लाख ऊंटों को नकली सूंड लगा कर हाथी जैसा बनाया गया। इनको पराजित करने के लिए विष्णु बुद्ध ने आबू पर्वत पर मालवा के राजा शूद्रक के अधीन 4 राजाओं का संघ बनाया-परमार, प्रतिहार, चाहमान, शुक्ल या चालुक्य। यह मालव गण 756 ईपूके शूद्रक शक से 456 ईपू के श्रीहर्ष शक तक चला।
28 बुद्धों में मुख्य सिद्धार्थ बुद्ध को किसी भी बौद्ध ग्रन्थ ने विष्णु अवतार नहीं कहा है। जातक कथा के अनुसार 100 जन्मों के बाद उनकी उन्नति बुद्ध रूप में हुई।

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