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भोजन विधिः

astroadmin | March 19, 2018 | 0 | अध्यात्म और धर्म , सामान्य जानकारी

वैश्वदेवं समाप्य देवान् सघृतपक्वान्नेन संतर्प्य

“अतिथि भोजन पर्याप्तम्पुरुषाहारसम्मतं भोजनं त्यक्त्वा ” अतिथिः आगच्छति तदा तेन अतिथिं तर्पयेत् — शेषान्नेन गोभ्योश्वाभ्यांपिप्लिकान् यथाशक्तिः संतर्प्य —

हाथ-पैर धोकर — पूर्व वा उत्तराभिमुख शुद्ध आसन पर बैठकर पवित्र स्थानपर भोजनपात्र रखें ….
नमस्कार करें –
*ॐ अन्नपूर्णे सदापूर्णे शंकरप्राणवल्लभे | ज्ञानवैराग्य सिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति ||*

दायें हाथ में जल लेकर *
नमो भगवते वासुदेवाय*
मंत्र से भोजनपात्र के फिरते दक्षिणावर्ति जलधारा करें..

पुनः जल लेकर
*गायत्री मंत्र तथा ॐ सत्येन त्वर्तेन परिषिंचामि ||*

मंत्र द्वय से भोजनपर जल छिंडके..
घृतयुक्त भात का नन्हा बैर जैसा निवाला लेकर भोजनपात्र की बहार जमीनपर या किसी छोटे पात्र में दाई और से बाईं और तीन बलिदान दें

*१- ॐ भूः पतये स्वाहा/
२- ॐ भुवनपतये स्वाहा/
३- ॐ भूतानां पतये स्वाहा ||*

दायें हाथ में जल रखे– *
ॐ ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविः ब्रह्माज्ञौ ब्रह्मणाऽहुतम् |
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्म समाधिनः||
ॐ तत् सत् ब्रह्मार्पणमस्तु ||*

वह जल तीनों बलिदान पर देवतीर्थ से समर्पित करें..

पुनः जठराग्नि का स्मरण करतें हुए दायें हाथ में जल रखें —

(पूर्वाऽपोशानम्)- *ॐ अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा ||*

घृतयुक्त भात के पाँच निवाले मौन होतें हुए ऐकैक मंत्र से ब्रह्माग्निरूप जठराग्नि में मुखद्वारा ग्रहण करें..

*१- ॐ प्राणाय स्वाहा/
२- ॐ अपानायस्वाहा/
३- ॐउदानाय स्वाहा/
४- ॐ व्यानाय स्वाहा/
५- ॐ समानाय स्वाहा ||*

हाथ साफ करकें शिखा खोलकर
ज्ञानवैराग्य सिद्धि कामनया *भोजन-यज्ञ* मानकर स्वस्थ चित्त से भोजन करें…
भोजन के बाद कुछ अन्न के दाने भोजनपात्र में उच्छिष्ट छोड़ दें..

(भोजन करतें हुए भोजनमध्य जल पीना चाहे तो बाएँ हाथ से जलपात्र को लेकर दायें हाथ की करधनी का स्पर्श करतें हुए जल ग्रहण करें – अकेला  बायाँ हाथ का उपयोग न करें) भोजनान्ते दायें हाथ में जल लेकर —>

*ॐ अमृताऽपिधानमसि स्वाहा ||*

मंत्र से (उत्तरापोशान) का आचमन करें ||

रहे हुए शेषान्नपर जल छोड़े..

जल ग्रहण करकें गायत्रीमंत्र से शिखाबंधन करें …

सायंकाल के बाद भोजन में —
भोजनपर जल छिंडकें —

*ॐ ऋतेन त्वा सत्येन परिषिंचामि ||*

कमसे कम एक समय और ज्यादा दो समय का भोजन शास्त्रोचित यज्ञ हैं |
तीसरी बार *भोजन और नास्ते* का विधान नहीं…
फिर भी यदि कुछ अस्वास्थ-व्यक्ति के लिए आवश्यक हो तो गायत्रीमंत्र से अभिमंत्रित कर- मनसा इष्टदेव को समर्पित करतें हुए नास्ता इत्यादि करें.
(यदि भोजन में बलिदान त्रय हेतु भात न बनाईं हो तो भी सभी विधान बलित्रय को छोड़कर करें)

बिना वैश्वदेव किए — देवताओं को अग्निपर पक्व अन्नादि से भोजन तथा ब्राह्मण को पके हुए अन्न से भोजन नहीं करवाना चाहिये… नहीं तो भोजनकर्ता कारयिता दौनों प्रायश्चित्त के भागीदारी बनेंगे…

बिना वैश्वदेव किए – देवताओं को — कच्चे अनाज,फल,शाक,सूखे मेवे, मिश्री, दूध की मेवासामग्री , दूध आदि का भोग लगाये.. और ब्राह्मण को भी भोजन करवाने हेतु कहे हुए कच्चे अन्नादि सामग्री का दान दे देवें…
अब सवाल यह हैं कि विवाहित स्त्री “यह भोजन विधि से ” ही भोजन करें ?
उत्तर — शास्त्रीय आज्ञानुसार पति का उच्छिष्ट (भोजन करतें हुए बचा अन्यपात्रों का अन्न) ग्रहण करें इस तरह – “पत्न्यासह (पत्नी की सहायता से ही) पति” वैश्वदेव और भोजन-यज्ञ करता हैं अतः पति का भोजन एक ही विधान हुआ…..
यहाँ भक्ष्यपदार्थ का स्व के लिए नहीं अपितु “धर्मार्थ शरीर टीकाने मात्र का” यज्ञ हैं…

पति यदि दूरगामी हो तो पत्नी *बिना मंत्र से अग्नि की पूजा* करकें —
– स्वाहा की जगह *नमोन्त* अन्न का प्रतिदेव के निमित्त वैश्वदेवयज्ञ करकें — ॐकार रहित भूत-मनुष्य-यज्ञों को सम्पादित करकें देवताओं को नैवेद्य समर्पित करें– बाद में “दायें कन्धे पर साड़ी वा पल्लु करके- पितृयज्ञ के बाद अतिथियज्ञान्त समापन करें — अतिथि के लिए कुछ भोजनरख कर

भोजन विधि में स्त्री या कुमारिका के लिए —
नमोभगवते वासुदेवाय से जलसेचन और क्रियामात्र अन्नपर जल छिंडक-कर – भूपतये नमः/ भुवनपतये नमः/ भूतानां पतये नमः // बलित्रय देकर – बलित्रय पर जल समर्पित करें ” तत् सत् ब्रह्मार्पणमस्तु”

बिना मंत्र आचमन करें —
प्राणाय नमः/ अपानाय नमः/ / उदानाय नमः/ व्यानाय नमः/ समानाय नमः

इस तरह पाँच ग्रास ग्रहण करें..
बाद में भोजन करें…

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