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ब्रह्माजी

astroadmin | March 18, 2018 | 0 | अध्यात्म और धर्म

जब भगवान ने अतिदारुण अहंकार की रचना की तो उसने शिवजी और ब्रह्माजी को आक्रांत कर लिया जिससे दोनों में विवाद हो गया और-

*तच्छ्रुत्वा क्रोधयुक्तेन शंकरेण महात्मना।*
*नखाग्रेण शिरश्छिन्नं ब्राह्‌मं परुषवादिनम्।।*
*तच्छिन्नं शंकरस्यैव सव्ये करतलेऽपतत्।*
*पतते न कदाचिच्च तच्छंकरकराच्छिरः।।*
वामनपुराण, २/३६-३७

“क्रोध से भरे भगवान शिवजी ने ब्रह्माजी के कठोर भाषण करने वाले सिर को अपने नाखून के अग्र भाग से काट डाला । वह कटा हुआ ब्रम्हाजी का सिर शिवजी की वाम हथेली पर जा गिरा एवं वह कपाल उनकी हथेली से इस प्रकार चिपक गया कि गिराने पर भी किसी प्रकार न गिरा। ”

अनेक तीर्थो में जाने का बाद भी वह कपाल नही छूटता है,  वाराणसी में जा स्नान करने से वह कपाल उनके हाथ से छूट जाता है तब से शिवजी का एक नाम ‘कपाली’ और उस तीर्थ का नाम ‘कपालमोचन’ हुआ।

*पद्मा- धर्मराज को श्राप

मनुवंशी राजा अनरण्य के सौ पुत्र और एक कन्या थी। कन्या का  नाम पद्मा था ।

एक बार पिप्पलाद मुनि निर्जन वन में तपस्या करते हुए निवास करते थे।  उनने एक गंधर्व को कई युवतियों से घिरे हुए देखा ।उनके मन में गृहस्थाश्रम की भावना जागृत हुई। उनने एक बार अनरण्य की पुत्री पद्मा को देखा  तो वह राजा के पास उसे मांगने के लिए पहुंच गए। राजा मुनि की वृद्ध और जीर्ण-शीर्ण स्थिति को देखकर परेशान हो गया ।वह अपनी पुत्री को मुनि को कैसे दे सकता था ।मुनि ने राजा को शाप देने का निश्चय भी कर लिया।  नीति शास्त्रियों ने देश हित में और परिवार हित में कन्या को समझाया कि वह मुनि से विवाह कर ले ।पद्मा का विवाह पिप्पलाद मुनि से हो गया।
राजा राज्य छोड़कर तपस्या के लिए चला गया रानी की मौत हो गई उनका जेष्ट पुत्र कीर्तिमान राजा बन गया।
इधर धर्म ने पद्मा के सतीत्व का परीक्षण करने का निश्चय किया कि यह युवती वृद्ध और जीर्ण-शीर्ण मुनि के साथ भी अपने सतीत्व का पालन करती है या नहीं ।धर्म ने छद्म रूप धारण करके पद्मा के सामने जो प्रस्ताव रखा उससे क्रोधित होकर पद्मा ने धर्म को कालक्रम से क्षय होने का श्राप दे दिया ।
धर्म अपने असली रुप में प्रकट हुए और पद्मा को वस्तुस्थिति बताई पद्मा को बहुत पश्चाताप हुआ । उसने कहा आप तो सब जगह रहते हैं सब जानते हैं फिर परीक्षण की बात कैसे आई।
लेकिन धर्म ने शाप को शिरोधार्य किया इस क्रम में बताया गया कि सतयुग में धर्म के चारों चरण रहेंगे त्रेता में तीन द्वापर में दो कलयुग में एक और कलयुग के अंत में चौथा चरण भी छिप जाएगा। लेकिन कलयुग में कहां-कहां धर्म रहेगा इस बात की महत्वपूर्ण जानकारी इस प्रसंग में विस्तार से प्राप्त होती है ।
यह प्रसंग ब्रह्मवैवर्तपुराण के  श्रीकृष्णजन्म खंड के अंतर्गत अध्याय 41 व 42 में प्राप्त होती है।

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