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बुद्ध महावीर और स्वामी विवेकानंद

astroadmin | March 19, 2018 | 0 | अध्यात्म और धर्म

कैसे हुआ महात्मा बुद्ध का निधन
बुद्ध जिसका अर्थ है वो “जो जाग रहा है” इस अर्थ में कि जो “वास्तविकता के लिए जगा” हो, कपिलवस्तु के राजा थे महात्मा बुद्ध के पिता
महात्मा बुद्ध का जन्म कपिलवस्तु के पास लुंबिनी में साल 563 ई.पू. में हुआ था उनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था. महात्मा बुद्ध के पिता शुद्धोधन कपिलवस्तु के शासक वहीं उनकी मां का नाम महामाया था और वो देवदह की राजकुमारी थी. हालांकि महात्मा बुद्ध पर से उनकी मां का साया जन्म के सांतवे दिन ही उठ गया. उनका पालन पोषण उनकी मौसी गौतमी ने किया था्.

16 साल की उम्र में हो गया था विवाह
महज 16 साल की उम्र में महात्मा बुद्ध की शादी राजकुमारी यशोधरा से हो गई थी. कुछ सालों में ही उनके बेटे का जन्म हुआ जिसका नाम राहुल रखा गया. शुरुआत से ही संन्यास का मन बनाए महात्मा बुद्ध ने बेटा पैदा होने पर कहा था किु आज उनके सामाजिक बंधनों में एक और कड़ी जुड़ गई है. फिर वो रात आई जब महात्मा अपनी पत्नी और बेटे को सोता हुआ छोड़कर ज्ञान की खोज के लिए निकल पड़े.

गौतम बुद्ध की मृत्यु 483 ई. में पूर्व कुशीनारा में हुई थी. उस समय उनकी उम्र 80 वर्ष थी. बौद्ध धर्म के अनुयायी इसे ‘महापरिनिर्वाण’ कहते हैं. लेकिन उनकी मृत्यु के मत में बौद्ध बुद्धिजीवी और इतिहासकार एकमत नहीं हैं. मान्यता ये भी है कि महात्मा बुद्ध को एक शख्स ने मीठे चावल और रोटी खाने को दिए थे. मीठा चावल खाने के बाद उनके पेट में दर्द हुआ और बाद में उनकी मृत्यु हो गई.

पार्थिव शरीर के लिए हुई लड़ाई
उनके मृत्यु पर 6 दिनों तक लोग दर्शनों के लिए आते रहे. सातवें दिन शव को जलाया गया. फिर उनके अवशेषों पर मगध के राजा अजातशत्रु, कपिलवस्तु के शाक्यों और वैशाली के विच्छवियों में झगड़ा हुआ. जब विवाद खत्म नहीं हुआ तो द्रोण नाम के एक ब्राह्मण ने समझौता कराया कि अवशेष आठ भागों में बांट लिये जाएं. ऐसा ही हुआ. आठ स्तूप आठ राज्यों में बनाकर अवशेष रखे गये. बताया जाता है कि बाद में अशोक ने उन्हें निकलवा कर 84000 स्तूपों में बांट दिया था.

यहां उन्होंने कुंद लोहार का आतिथ्य स्वीकार किया और उसके आमों के वन में अन्य भिक्षुओं के साथ ठहरे| कुंद ने खाने के लिए बुद्ध को मीठे चावल, रोटी, और मद्दव दिया| बुद्ध ने चावल और रोटी तो अन्य भिक्षुओं को दिलवा दिया, लेकिन मद्दव खुद खाने के लिए रख लिया|

ऐसा उन्होंने इसलिए किया क्योंकि उन्हें लगा कि मद्दव उनके अलावा कोई और नहीं पचा पायेगा| उन्होंने थोडा सा ही मद्दव खाया और बचा हुआ मद्दव जमीन के अंदर गड़वा दिया| भोजन के तुरंत बाद वो गंभीर रूप से बीमार हो गए|

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महावीर

का जन्म करीब ढाई हजार साल पहले हुआ था। ईसा से 599 वर्ष पहले वैशाली गणतंत्र के क्षत्रिय कुण्डलपुर में पिता सिद्धार्थ और माता त्रिशला के यहाँ चैत्र शुक्ल तेरस को वर्द्धमान का जन्म हुआ। बिहार के मुजफ्फरपुर जिले का आज का जो बसाढ़ गाँव है वही उस समय का वैशाली था।

यही वर्द्धमान बाद में इस काल के अंतिम तीर्थंकर महावीर स्वामी बने। जैन ग्रंथों के अनुसार, २३वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ जी के निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त हो जाने के २७८ वर्ष बाद इनका जन्म हुआ था।

तीर्थंकर महावीर का केवलिकाल ३० वर्ष का था और उनके ११ गणधर थे जिनमें मुख्य इंद्रभूति थे। उनके के संघ में १४००० दिगम्बर मुनि, ३६००० आर्यिकाएँ, १००००० श्रावक और ३००००० श्रविकाएँ थी। भगवान महावीर ने ईसापूर्व 527, 72 वर्ष की आयु में बिहार के पावापुरी (राजगीर) में कार्तिक कृष्ण अमावस्या को निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त किया। उनके साथ अन्य कोई मुनि मोक्ष नहीं गए |

विवाह

दिगम्बर परम्परा के अनुसार महावीर बाल ब्रह्मचारी थे। भगवान महावीर शादी नहीं करना चाहते थे क्योंकि ब्रह्मचर्य उनका प्रिय विषय था। भोगों में उनकी रूचि नहीं थी। परन्तु इनके माता -पिता शादी करवाना चाहते थे। दिगम्बर परम्परा के अनुसार उन्होंने इसके लिए मना कर दिया था।
श्वेतांबर परम्परा के अनुसार इनका विवाह यशोदा नामक सुकन्या के साथ सम्पन्न हुआ था और कालांतर में एक कन्या भी उत्पन्न हुई जिसका नाम प्रियदर्शिनी था। युवा होने पर उसका विवाह राजकुमार जमाली के साथ हुआ।

भगवान महावीर ने 72 वर्ष की अवस्था में ईसापूर्व 527 में पावापुरी (बिहार) में कार्तिक (आश्विन) कृष्ण अमावस्या को निर्वाण प्राप्त किया। इनके निर्वाण दिवस पर घर-घर दीपक जलाकर दीपावली मनाई जाती है।

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विवेकानंद

का जन्म 12 जनवरी, 1863 को हुआ था और 4 जुलाई 1902 को मात्र 39 साल की उम्र में महासमाधि धारण कर उन्होंने प्राण त्याग दिए थे।

बेलूर मठ में मौत

4 जुलाई, 1902 को अपनी मौत के दिन संध्या के समय बेलूर मठ में उन्होंने 3 घंटे तक योग किया। शाम के 7 बजे अपने कक्ष में जाते हुए उन्होंने किसी से भी उन्हें व्यवधान ना पहुंचाने की बात कही और रात के 9 बजकर 10 मिनट पर उनकी मृत्यु की खबर मठ में फैल गई।मात्र 39 साल की उम्र में महासमाधि

धर्मसभा सम्मेलन

स्वामी विवेकानंद ना सिर्फ वेदों के ज्ञाता थे, बल्कि 1893 में आर्ट इंस्टिट्यूट ऑफ शिकागों में पहले विश्व धर्मसभा सम्मेलन को संबोधित करने के बाद वो हिंदुत्व और वैदिक ज्ञान को वैश्विक स्तर पर पहचान देने के लिए भी खास तौर से जाने जाते हैं।

गंगा नदी के तट पर अंत्येष्टि

गंगा नदी के तट पर जहां 16 साल पहले उनके गुरु रामकृष्ण की अंत्येष्टि हुई थी, वहीं स्वामी जी का भी अंतिम संस्कार किया गया। वैज्ञानिक आधारों को मानने वालों के अनुसार महासमाधि के समय उन्हें ब्रेन हैमरेज हुआ था जिसके कारण उनकी मृत्यु हुई।

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