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पुखराज रत्न

astroadmin | March 19, 2018 | 0 | ज्योतिष सीखें , सामान्य जानकारी

पुखराज रत्न एल्युमिनियम और फ्लोरीन सहित सिलिकेट खनिज होता है।संस्कृत भाषा में पुखराज को पुष्पराग कहा जाता है। अमलतास के फूलों की तरह पीले रंग का पुखराज सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। पुखराज के स्थान पर टाइगर, सुनहला या पीला हकीक भी धारण कर सकते हैं।

पुखराज की अंगूठी
Topaz Ring

रत्न  Ratan Facts and Benefits)

पुखराज पीले रंग का एक बेहद खूबसूरत रत्न है। इसे बृहस्पति ग्रह का रत्न माना जाता है। पुखराज की गुणवत्ता आकार, रंग तथा शुद्धता के आधार पर तय की जाती है। पुखराज (Pukhraj or Yellow Sapphire) तकरीबन हर रंग में मौजूद होते हैं, लेकिन जातकों को अपनी राशि के अनुसार इन पुखराज को धारण करना चाहिए।
पुखराज के तथ्य
पुखराज के बारे में बताया जाता है कि जिन जातकों की कुंडली में बृहस्पति कमज़ोर हो उन्हें पीला पुखराज धारण करना चाहिए।
पुखराज के लिए राशि
धनु तथा मीन राशियों के जातकों के लिए पुखराज धारण करना अत्यंत लाभकारी माना गया है।
पुखराज के फायदे
* पुखराज धारण करने से मान सम्मान तथा धन संपत्ति में वृद्धि होती है।
* यह रत्न शिक्षा के क्षेत्र में भी सफलता प्रदान करवाता है।
* इस रत्न से जातकों के मन में धार्मिकता तथा सामाजिक कार्य में रुचि होने लगती है।
* विवाह में आती रुकावटें तथा व्यापार में होता नुकसान से बचने के लिए भी पीला पुखराज धारण करने की सलाह दी जाती है।
पुखराज के स्वास्थ्य संबंधी लाभ
* ज्योतिषी मानते हैं कि जिन जातकों को सीने की दर्द, श्वास, गला आदि रोगों से परेशानी है तो उन्हें पुखराज धारण करना चाहिए।
* अल्सर, गठिया, दस्त, नपुंसकता, टीबी, हृदय, घुटना तथा जोड़ों के दर्द से राहत पाने के लिए भी पुखराज का उपयोग किया जाता है।
कैसे धारण करें पुखराज
पुखराज गुरुवार के दिन धारण करना चाहिए। धारण करने से पूर्व पीली वस्तुओं विशेषकर जो बृहस्पति से संबंधित हो उनका देना चाहिए। बृहस्पति से संबंधित कुछ वस्तुएं हैं केला, हल्दी, पीले कपड़े आदि। माना जाता है कि पुखराज हमेशा सवा 5 रत्ती, सवा 9 रत्ती, सवा 12 रत्ती की मात्रा में धारण करें। पुखराज धारण करने से पहले इसकी विधिवत पूजा-अर्चना करनी चाहिए। बिना ज्योतिषी की सलाह और कुंडली देखे बिना पुखराज या अन्य रत्न नहीं धारण करने चाहिए।
पुखराज का उपरत्न
पुखराज के स्थान पर रत्न ज्योतिषी धिया, सुनैला, सुनहला या पीला हकीक पहनने की भी सलाह देते हैं।

पुखराज, ब्रहस्पति गृह का प्रतिनिधित्व करता है! यह पीले रंग का एक बहुत मूल्यवान रत्न है, जितना यह मूल्यवान है उतनी ही इस रत्न की कार्य क्षमता प्रचलित है! इस रत्न को धारण करने से ईश्वरीय कृपया प्राप्त होती है! मेरे व्यक्तिगत अनुभव में, पुखराज धारण करने से विशेषकर आर्थिक परेशानिया खत्म हो जाती है, और धारण करता को अलग अलग रास्तो से आर्थिक लाभ मिलना प्रारम्भ हो जाता है, इसलिए मेरा यह मानना है की आर्थिक समस्याओ से निजाद प्राप्त करने और जीवन में तरक्की प्राप्त करने के लिए जातक को अवश्य अपनी कुंडली का निरक्षण करवाकर पुखराज धारण करना चाहिए! पुखराज धारण करने से अच्छा स्वास्थ्य, आर्थिक लाभ, लम्बी उम्र और मान प्रतिष्ठा प्राप्त होती है!

जिन कन्याओ के विवाह में विलम्भ हो रहा हो उन्हें पुखराज अवश्य धारण करना चाहिए, मेरे अनुभव से पुखराज धारण करने से कन्याओ का विवाह अच्छे घर में होता है! जिन दम्पत्तियो को पुत्र की लालसा हो उन्हें भी पुखराज अवश्य धारण करना चाहिए क्योकि ब्रहस्पति पति और पुत्र  दोनों कारक होता है, लेकिन में फिर से दोहरा रहा हूँ की किसी भी रत्न को धारण करने से पहले किसी अनुभवी ज्योतिषी की सलाह अवश्य कर लें!

पुखराज धारण करने की विधि

यदि आप ब्रहस्पति देव के रत्न, पुखराज को धारण करना चाहते है, तो 3 से 5  कैरेट के पुखराज को स्वर्ण या चाँदी की अंगूठी में जड्वाकर किसी भी शुक्ल पक्ष के ब्रहस्पति वार को सूर्य उदय होने के पश्चात् इसकी प्राण प्रतिष्ठा करवाकर धारण करें! इसके लिए सबसे पहले अंगुठी को दूध,,,गंगा जल शहद, और शक्कर के घोल में डाल दे, फिर पांच अगरबत्ती ब्रहस्पति देव के नाम जलाए औ प्रार्थना करे कि हे ब्रहस्पति देव मै आपका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए आपका प्रतिनिधि रत्न पुखराज धारण कर रहा हूँ कृपया करके मुझे अपना आशीर्वाद प्रदान करे !

अंगूठी को निकालकर 108 बारी अगरबत्ती के ऊपर से घुमाते हुए ॐ ब्रह्म ब्रह्स्पतिये नम: का जाप करे तत्पश्चात अंगूठी विष्णु जी के चरणों से स्पर्श कराकर तर्जनी में धारण करे! ब्रहस्पति के अच्छे प्रभावों को प्राप्त करने के लिए उच्च कोटि का सिलोनी पुखराज ही धारण करे, पुखराज धारण करने के 30 दिनों में प्रभाव देना आरम्भ कर देता है और लगभग 4 वर्ष तक पूर्ण प्रभाव देता है और फिर निष्क्रिय हो जाता है ! निष्क्रिय होने के बाद आप पुन: नया पुखराज धारण कर सकते है ! अच्छे प्रभाव के लिए पुखराज का रंग हल्का पीला और दाग रहित होना चाहिए , पुखराज में कोई दोष नहीं होना चाहिए अन्यथा शुभ प्रभाओं में कमी आ सकती है !

पुखराज के उपरत्न

धिया- हल्का पीला,केसरी- हल्की चमक- भारी,केरू- पीतल के रंग का,सोनल- सफेद- पीली किरणें,सुनैला- सफेद-रंग का चिकना चमकदार।अन्य: पुखराज के स्थान पर टाइगर, सुनहला या पीला हकीक भी धारण कर सकते हैं।

गुरु रत्न पुखराज
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार अखिल ब्राह्मण मे विचरण कर रहे ग्रहो का रत्नों (रंगीन मूल्यवान पत्थरों ) से निकटता का संबंध होता है ।  मनुष्य के जीवन पर आकाशीय ग्रहों व उनकी बदलती चालों का प्रभाव अवश्य पड़ता है, ऐसे मे यदि कोई मनुष्य अपनी जन्म-कुंडली मे स्थित पाप ग्रहों की मुक्ति अथवा अपने जीवन से संबन्धित किसी अल्पसामर्थ्यवान ग्रह की शक्ति मे वृद्धि हेतु उस ग्रह का प्रतिनिधि रत्न धारण करता है तो उस मनुष्य के जीवन तथा भाग्य मे परिवर्तन अवश्यभावी हो जाता है । बशर्ते की उसने वह रत्न असली ओर दोष रहित होने के साथ-साथ पूर्ण विधि-विधान से धारण किया हो ।
ज्योतिष के नवग्रहों मे एकमात्र प्रमुख ग्रह वृहस्पति को देवताओं का गुरु होने का कारण ‘गुरु’ कहा जाता है । यही वह मुख्य ग्रह है जिसके अनुकूल रहने पर जन्मकुंडली के अन्य पापी अथवा क्रूर ग्रहों का दुष्प्रभाव मनुष्य पर नहीं पड़ता है ।

ज्योतिषी किसी भी जातक की कुंडली का अध्ययन करने से पूर्व उस कुंडली मे वृहस्पति की स्थिति ओर बलाबल पर सर्वप्रथम ध्यान देता है ।
नवग्रहों के नवरत्नों मे से वृहस्पति का रत्न ‘पुखराज’ होता है । इसे ‘गुरु रत्न’ भी कहा जाता है । पुखराज सफ़ेद, पीला, गुलाबी, आसमानी, तथा नीले रंगों मे पाया जाता है । किन्तु वृहस्पति गृह के प्रतिनिधि रंग ‘पीला’ होने के कारण ‘पीला पुखराज’ ही इस गृह के लिए उपयुक्त और अनुकूल रत्न माना गया है । प्रायः पुखराज विश्व के अधिकांश देशों मे न्यूनाधिक्य पाया जाता है , परंतु सामान्यतः ब्राज़ील का पुखराज क्वालिटी मे सर्वोत्तम माना जाता है । वैसे भारत मे भी उत्तम किस्म का पुखराज पाया गया है ।
वृहस्पति के इस प्रतिनिधि रत्न को हिन्दी मे – पुखराज, पुष्यराज , पुखराज ; संस्कृत मे – पुष्यराज ; अँग्रेजी मे – टोपाज अथवा यलो सैफायर ; इजीप्शियन मे – टार्शिश ; फारसी मे – जर्द याकूत ; बर्मी मे – आउटफ़िया ; लैटिन मे – तोपजियों ; चीनी मे – सी लेंग स्याक ; पंजाबी मे – फोकज ; गुजराती मे – पीलूराज ; देवनागरी मे – पीत स्फेटिक माठी ; अरबी मे – याकूत अल अजरक और सीलोनी मे – रत्नी पुष्परगय के नाम से पहचाना व जाना जाता है ।

असली पुखराज की पहचान
1. चौबीस घंटे तक पुखराज को दूध मे पड़ा रहने पर भी उसकी चमक मे कोई अंतर नही आए तो उसे असली जाने ।
2. जहरीले कीड़े ने जिस जगह पर काटा हो वहाँ पुखराज घिसकर लगाने से यदि जहर तुरंत उतार जाये तो पुखराज असली जाने ।
3. असली पुखराज पारदर्शी व स्निग्ध  होने के साथ हाथ मे लेने पर वजनदार प्रतीत होता है ।
4. गोबर से रगड़ने पर असली पुखराज की चमक मे वृद्धि हो जाती है ।
5. धूप मे सफ़ेद कपड़े पर रख देने से असली पुखराज मे से पीली आभा (किरणे) फूट पड़ती है ।
6. आग मे तपाने पर असली पुखराज तड़कता नहीं है साथ ही उसका रंग बदलकर एकदम सफ़ेद हो जाता है ।
7. असली पुखराज मे कोई न कोई रेशा अवश्य होता है चाहे वह छोटा-सा ही क्यों न हो ?

पुखराज के दोष
दोषयुक्त पुखराज कदापि धारण नहीं करना चाहिए । भले ही इसके बदले मे पुखराज का कोई उपरत्न ही धारण कर लें । पुखराज मे प्रायः निम्न दोष बताए गए है – प्रभाहीन , धारीदार , लाल छीटें , खरोचकर , चारी , सुषम , दूधक , जालक, अनरखी , श्याम बिन्दु , श्वेत बिन्दु, रक्तक  बिन्दु, गड्ढेदार , छीटेदार, खड़ी रेखा से युक्त , अपारदर्शी तथा रक्ताभ धब्बों से युक्त पुखराज दोषी होता है । इस प्रकार का पुखराज धारण करना अनिष्टकारी रहता है ।

पुखराज की विशेषताएँ तथा धारण करने से लाभ
वृहस्पति का प्रतिनिधि रत्न होने के कारण चिकना , चमकदार , पानीदार, पारदर्शी ओर अच्छे पीले रंग का पुखराज धारण करने से व्यापार तथा व्यवसाय मे वृद्धि होती है । यह अध्ययन तथा शिक्षा के क्षेत्र मे भी उन्नति का कारक माना गया है । वृहस्पति जीव अर्थात पुत्रकारक गृह होने के कारण इसे धारण करने से वंशवृद्धि होती है । पुत्र अथवा संतान की कामना के इच्छुक दम्पतियों को दोषरहित पीला पुखराज अवश्य ही धारण कर लेना चाहिए । यह भूत-प्रेत बाधा से भी धारण कर्ता की रक्षा करता है । इसे धारण करने से धन-वैभव और ऐश्वर्य की सहज मे ही प्राप्ति होती है  ।
निर्बल वृहस्पति की स्थिति मे निर्दोष पुखराज धारण करना परम कल्याणकारी होता है । यह रत्न अविवाहित जातको (विशेषकर कन्याओं को) विवाह सुख, गृहिणियों को संतान सुख व पति सुख, दंपत्तियों को वैवाहिक जीवन मे सुख एवं व्यापारियों को अत्यधिक लाभ देता है । इसे धारण कर लेने से अनेकानेक प्रकार के शारीरिक , मानसिक , बौद्धिक ओर दैवीय कष्टों से मुक्ति मिल जाती है ।

पुखराज से रोगोपचार
पुखराज हड्डी का दर्द, काली खांसी , पीलिया , तिल्ली, एकांतरा ज्वर मे धारण करना लाभप्रद है । इसे कुष्ठ रोग व चर्म रोग नाशक माना गया है । इसके अलावा इस रत्न को सुख व संतोष प्रदाता, बल-वीर्य व नेत्र ज्योतिवर्धक माना गया है । आयुर्वेद मे इसको जठराग्नि बढ़ाने वाला , विष का प्रभाव नष्ट करने वाला, वीर्य पैदा करने वाला, बवासीर नाशक , बुद्धिवर्धक , वातरोग नाशक, और चेहरे की चमक मे वृद्धि करने वाला लिखा गया है ।  जवान तथा सुंदर युवतियाँ अपने सतीत्व को बचाने के लिए प्राचीन काल मे इसे अपने पास रखती थी क्योंकि इसे पवित्रता का प्रतीक माना जाता है । पेट मे वायु गोला की शिकायत अथवा पांडुरोग मे भी पुखराज धारण करना लाभकारी रहता है ।

पुखराज के उपरत्न
हैं । इन्हे पुखराज की अपेक्षाकृत ज्यादा वजन मे तथा अधिक समय तक धारण करने पर ही प्र्याप्त लाभ परिलक्षित होता है ।
पुखराज के उपरत्न इस प्रकार है – सुनैला (सुनहला ) , केरु, घीया , सोनल , केसरी, फिटकरी व पीला हकीक इत्यादि । इनमे से भी मेरे व्यक्तिगत अनुभवानुसार पीला हकीक तथा सुनैला ही सर्वाधिक प्रभावी पाये गए है ।

पुखराज किसे धारण करना चाहिए
जन्मकुंडली मे वृहस्पति की शुभ भाव मे स्थिति होने पर प्रभाव मे वृद्धि हेतु और अशुभ स्थिति अथवा नीच राशिगत होने पर दोष निवारण हेतु पीला पुखराज धारण करना चाहिए । वृहस्पति की महादशा तथा अंतर्दशा मे भी इसे धारण अवश्य करना चाहिए  ।
धनु, कर्क, मेष, वृश्चिक तथा मीन लग्न अथवा राशि वाले जातक भी इसे धारण करके लाभ उठा सकते हैं । यदि जन्मदिन गुरुवार ठठा पुष्य नक्षत्र हो अथवा जन्म नक्षत्र पुनर्वसु , विशाखा या पूर्वभाद्रपद हो तभी पुखराज धारण करने से लाभ होता है । जिनकी कुंडली मे वृहस्पति केन्द्र अथवा त्रिकोणस्थ अथवा इन स्तनों का स्वामी हो अथवा जन्मकुंडली मे गुरु लग्नेश या प्रधान गृह हो तो उन जातकों को निर्दोष व पीला पुखराज धारण करके अवश्य लाभ उठाना चाहिए ।

पुखराज धारण करने की विधि
पुखराज को सोने की अंगूठी मे जड़वाकर तथा शुक्लपक्ष मे गुरुवार को प्रायः स्नान-ध्यान के पश्चात दाहिने हाथ की तर्जनी उंगली मे धारण करना चाहिए । अंगूठी मे पुखराज इस प्रकार इस प्रकार से जड़वाएँ की रत्न का निचला सिरा खुला रहे तथा अंगुली से स्पर्श करता रहे ।
अंगूठी बनवाने के लिए कम से कम चार कैरट अथवा चार रत्ती के वजन अथवा उससे अधिक वजन का पारदर्शी , स्निग्ध तथा निर्दोष पुखराज लेना चाहिए ।
गुरुवार के दिन अथवा गुरुपुष्य  नक्षत्र मे प्रायः सूर्योदय से ग्यारह बजे के मध्य पुखराज की अंगूठी बनवाणी चाहिए । तत्पश्चात अंगूठी को सर्वप्रथम गंगाजल से, फिर कच्चे दूध से तथा पुनः गंगाजल से धोकर वृहस्पति के मंत्र (ॐ बृं बृहस्पतये नमः ) अथवा (ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरुवे नमः ) का जाप करते हुए धारण करनी चाहिए । अंगूठी धारण करने के पश्चात ब्राह्मण को यथायोग्य दक्षिणा (पीला वस्त्र, चने की दाल, हल्दी, शक्कर, पीला पुष्प तथा गुरु यंत्र इत्यादि) का दान अवश्य देना चाहिए ।

विशेष
जो जातक अंगूठी धारण करने मे असुविधा महसूस करते हों उन्हे सोने के लॉकेट मे गुरु यंत्र के साथ पुखराज धारण कर लेना चाहिए । बल्कि मेरी निजी राय मे तो सोने के गुरु यंत्र लॉकेट मे पुखराज धारण करने से जहां एक ओर सदैव रत्न व यंत्र पवित्र बना रहेगा वही नित्य स्नान के समय स्वतः ही रत्न स्नान भी होता रहेगा । अतएव अंगूठी की अपेक्षाकृत रत्न को लॉकेट मे जदवाकर धारण करना श्रेयस्कर रेहता है ।

पुखराज की प्रभाव अवधि
अंगूठी अथवा लॉकेट मे जड़वाने के दिन से लेकर चार वर्ष तीन महीने और अट्ठारह दिनों तक पुखराज एक व्यक्ति के पास प्रभावशाली रेहता है । अतः इस अवधि के पश्चात रत्न को किसी दूसरे व्यक्ति को बेच देना चाहिए तथा स्वयं को पुनः दूसरे पुखराज की अंगूठी बनवाकर पूर्वोक्त विधिनुसार धारण कर लेनी चाहिए ।
पीले रंग का यह कीमती रत्‍न गुरू का रत्‍न होता है जिसे अंग्रेजी में ‘टोपाज’ कहते हैं। इस रत्‍न का स्‍वामीबृहस्‍पति है और यह हीरे और माणिक के बाद तीसरा सबसे कठोर रत्‍न है। यह मुख्‍य रूप से पीले रंग का होता है लेकिन अलग-अलग भौगोलिक स्‍थ‍िति के कारण ये पीले के पांच अलग-अलग शेड में पाया जाता है। सबसे अच्‍छा पुखराज नीबू के छिलके के समान पीला वाला माना जाता है। इसके अलावा हल्‍दी जैसा पीला, केसरी, सोने के रंग जैसा और पीलापन लिए हुए सफेद पुखराज इसके अन्‍य रंग हैं।

पुखराज की प्राकृतिक उपलब्‍धता

क्रिस्‍टल के रूप में पुखराज भी खदानों से निकाला जाता है। इसकी खदानें मुख्‍य रूप से रूस, श्रीलंका, अफगानिस्‍तान, नार्वे, इटली में हैं। लेकिन सबसे अच्‍छा पुखराज ब्राजील में पाया जाता है। भारत में हिमालयन क्षेत्र में पुखराज पाया जाता है।

विज्ञान और पुखराज

पुखराज सिलिकेट मिनरल है जो कि एल्‍युमीनियम और फ्लो‍रीन से मिलकर बना है।इसका फार्मुला Al2SiO4(F,OH)2 है। इस रत्‍न में प्राकृतिक रूप से ही कुछ अशुद्धियां और तरल या गैसीय पदार्थ पाए जाते हैं। इसकी कठोरता 8 होती है और घनत्‍व 6.53 होता है।

पुखराज के गुण

पीले रंग का चमकदार रत्‍न होता है जिसे ध्‍यान से देखने पर ऐसा प्रतीत होता है जैसे इसके अंदर पानी हो। इस रत्‍न से आर-पार दिखाई देता है किन्‍तु स्‍पष्‍ट नहीं। यह गुरू के दोषों को दूर करने की क्षमता रखता है।

ज्‍योतिष और पुखराज के लाभ:

बृहस्‍पति एक शक्तिशाली ग्रह है। इस ग्रह की अच्‍छी दृष्‍टी जहां मानव को धनवान बनाती है और समाजिक सम्‍मान दिलाती है वहीं यदि यह विपरीत फल दे तो अत्‍यंत बुरे फल देता है। इसलिए पुखराज सभी नहीं पहन सकते। इसको खरीदने से पहले किसी अच्‍छे ज्‍योतिष शास्‍त्री से कुंडली दिखवा ले। कुंडली में इन परिस्‍थ‍ितियों में पुखराज पहनें:

बृहस्‍पति के ग्रह धनु और मीन लग्‍न वाले व्‍यक्तियों को पुखराज अवश्‍य पहनना चाहिए।कुंडली में अगर बृहस्‍पति मेष,वृष, सिंह, वृश्‍चिक,तुला, कुंभ या मकर राशियों में स्‍थ‍ित हो तो पुखराज पहनना चाहिए।मेष, वृष, सिंह, वृश्चिक, तुला, कुंभ या मकर में से किसी भी राशि में यदि बृहस्‍पति उपस्‍थित हो तो पुखराज पहनना लाभकारी होता है।बृहस्‍पति अगर मकर राशि में हो तो पुखराज पहनने में देर नहीं करनी चाहिए।बृहस्‍पति धनेष होकर नौवे घर में, चौथे घर का स्‍वामी होकर ग्‍यारवें भाव में, सातवें भाव का स्‍वामी होकर दूसरे भाव में और भाग्‍येश होकर चौथे भाव में हो तो पुखराज पहनना शुभ फल कारक होता है।उत्‍तम भाव में स्थित बृहस्‍पति यदि अपने भाव से छठे या आठवें स्‍थान पर स्‍थ‍ित हो तो पुखराज जरूर पहनना चाहिए।बृहस्‍पति की महादशा में या किसी भी महादशा में बृहस्‍पति का अंतर हो तो भी पुखराज पहनना लाभकारक होता है।विवाह में अड़चने आती हो तो शुभ कार्यों का कारक बृहस्‍पति के रत्‍न पुखराज को धारण करने विवाह शीघ्र हो जाता है।पुखराज पहनने से हमारा मन शांत होता है और बुरे विचारों में कमी आती है।

पुखराज का विकल्‍प

पुखराज न खरीद पाने और अच्‍छा पुखराज न मिलने की स्थिति में इसके विकल्‍प के रूप में पीला मोती, पीला जिरकॉन या सुनैला पहन सकते हैं।

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