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पंचमुख भगवान श्री सदाशिव

astroadmin | July 21, 2018 | 0 | अध्यात्म और धर्म

“पंचमुख भगवान श्री सदाशिव ” :
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नारायण ! मान्यता है कि भगवान शिव संसार के समस्त मंगल का मूलहैं। यजुर्वेद में उनकी स्तुति इस प्रकार की गई है-
” नम: शंभवाय च मयोभवाय च नम: शंकराय च मयस्कराय च नम:        शिवाय च शिवतराय च॥”
इस वैदिक ऋचा में परमात्मा को ‘शिव’, ‘शंभु’ और ‘शंकर’ नाम से नमन किया गया है। ‘ शिव ‘ शब्द बहुत छोटा है, पर इसके अर्थ इसे गंभीर बना देते है। ‘शिव’ का व्यावहारिक अर्थ है ‘कल्याणकारी’। ‘शंभु’ का भावार्थ है ‘मंगलदायक’। ‘शंकर’ का तात्पर्य है ‘आनंद का स्रोत ‘। यद्यपि ये तीनों नाम भले ही भिन्न हों, लेकिन तीनों का संकेत – कल्याणकारी, मंगलदायक, आनंदघन परमात्मा की ओर ही है। वे देवाधिदेव महादेव, सबके अधिपति महेश्वर सदाशिव ही है। परंतु यह ध्यान रहे कि भगवान ‘शिव’ त्रिदेवों के अंतर्गत रुद्र (रौद्र रूप वाले ) – नहीं हैं। भगवान शिव की इच्छा से प्रकट रजोगुण रूप धारण करनेवाले ब्रह्मा , सत्वगुणरूप विष्णु एवं तमोगुण रूप रुद्र है, जो क्रमश: सृजन, रक्षण (पालन) तथा संहार का कार्य करते है। ये तीनों वस्तुत: सदाशिव की ही अभिव्यक्ति है, इसलिए ये शिव से पृथक भी नहीं हैं। ब्रह्मा – विष्णु-महेश तात्विक दृष्टि से एक ही है। इनमें भेद-करना अनुचित है।

ब्रहृमांड पंचतत्वों से बना है। ये पांच तत्व है- जल- पृथ्वी- अग्नि – वायु और आकाश। भगवान शिव पंचानन अर्थात पांच मुख वाले है। शिवपुराण में इनके इसी पंचानन स्वरूप का ध्यान बताया गया है। ये पांच मुख-
ईशान, तत्पुरुष, अघोर, वामदेव तथा सद्योजात नाम से जाने जाते है। भगवान शिव के ऊर्ध्वमुख का नाम ‘ईशान’ है, जिसका दुग्ध जैसा वर्ण है। ‘ईशान’ आकाश तत्व के अधिपति है। ईशान का अर्थ है सबके स्वामी। ईशान पंचमूर्ति महादेव की क्रीड़ामूर्ति हैं। पूर्वमुख का नाम
‘तत्पुरुष’ है, जिसका वर्ण पीत ( पीला ) है। तत्पुरुष वायुतत्व के अधिपति है। तत्पुरुष तपोमूर्ति हैं। भगवान सदाशिव के दक्षिणी मुख को ‘अघोर’ कहा जाता है। यह नीलवर्ण ( नीले रंग का ) है। अघोर अग्नितत्व के अधिपति है। अघोर शिवजी की संहारकारी शक्ति हैं, जो भक्तों के संकटों को दूर करती है। उत्तरी मुख का नाम वामदेव है, जो कृष्णवर्ण का है। वामदेव जल तत्व के अधिपति है। वामदेव विकारों का नाश करने वाले है, अतएव इनके आश्रय में जाने पर पंचविकार काम, क्रोध, मद, लोभ और मोह नष्ट हो जाते है। भगवान शंकर के पश्चिमी मुख को ‘ सद्योजात ‘ कहा जाता है, जो श्वेतवर्ण का है। सद्योजात पृथ्वी तत्व के अधिपति है और बालक के समान परम स्वच्छ, शुद्ध और निर्विकार है। सद्योजात ज्ञानमूर्ति बनकर अज्ञानरूपी अंधकार को नष्ट करके विशुद्ध ज्ञान को प्रकाशित कर देते है। पंचभूतों ( पंचतत्वों ) के अधिपति होने के कारण ये ‘भूतनाथ’ कहलाते है। शिव-जगत में पांच का और भी महत्व है। रुद्राक्ष सामान्यत: पांच मुख वाला ही होता है। शिव- परिवार में भी पांच सदस्य है- शिव, पार्वती, गणेश, कार्तिकेय और नंदीश्वर ।नन्दीश्वर को हमारे आचार्यचरणों ने साक्षात् धर्म के रूप में जाना है ।  शिवजी की उपासना पंचाक्षर मंत्र- ‘नम: शिवाय’ द्वारा की जाती है। शिव काल (समय) के प्रवर्तक और नियंत्रक होने के कारण ‘महाकाल’ भी कहलाते है। काल की गणना ‘पंचांग’ के द्वारा होती है। काल के पांच अंग- तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण शिव के ही अवयव है।

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