ज्योतिष वास्तु और किसी भी प्रकार के रत्न के लिये फोन करे – 7309053333

निम्बार्काचार्यजी

astroadmin | March 19, 2018 | 0 | अध्यात्म और धर्म

दक्षिण देश में गोदावरी तट पर स्थित वैदूर्यपत्तन के निकट अरुणाश्रम में श्री अरुणमुनि की पत्नी जयंतीदेवी के गर्भ से अवतरित आचार्य के उपनयन संस्कार के समय स्वयं देवर्षि नारद ने उपस्थित होकर इन्हें गोपाल मंत्र की दीक्षा दी । इनके गुरु नारद, नारद के गुरु सनकादि, इस प्रकार इनका संप्रदायिक सनकादिसंप्रदाय के नाम से ही प्रसिद्ध है । इनका मत द्वैताद्वैतवाद के नाम से प्रसिद्ध है ।
सूर्यवतार आचार्य निम्बार्क के काल के विषय में बड़ा मतभेद है । इनके कुछ मतानुयायी द्वापर में हुआ बताते हैं, कुछ ईसा की पांचवी शताब्दी को इनका जन्म काल मानते हैं । किन्तु वर्तमान अन्वेषकों ने बड़े प्रमाण से इन्हें ग्यारहवीं शताब्दी का सिद्ध किया हैं । कोई इनके पिता का नाम जगन्नाथ मानते हैं और सूर्य के स्थान पर इन्हें भगवान के प्रिय आयुध सुदर्शन चक्र का अवतार बताते हैं ।

कहा जाता है कि इन का पहले नाम नित्यानंद था । एक दिन जब यह मथुरा के पास यमुना तट वर्ती क्षेत्र में निवास के दौरान, एक दण्डी अथवा किसी किसी मत से एक जैन साधु इन के आश्रम आये । दोनों आध्यात्मिक चर्चा में इतने तल्लीन हो गये की कब शाम हो गई पता ही नही चला । जब आचार्य ने अपने अतिथि को भोजन कराना चाहा तब उन्होंने सूर्यास्त के बाद भोजन ग्रहण करने से असमर्थता प्रकट की क्योंकि दण्डी और जैन लोगों के लिए संध्या या रात्रि में भोजन करना निषेध है ।
आचार्य को बड़ी चिंता हुई कि अतिथि को बिना भोजन कैसे जाने दे ? जब उनके हृदय में बड़ी वेदना हुई तभी एक चमत्कार होता है, सभी देखते है कि आश्रम के पास एक नीम के वृक्ष के ऊपर सूर्य प्रकाशित हो रहे हैं । अतिथि को भोजन कराया और उसके बाद भगवान सूर्य अस्त हो गए, तभी से उनका नाम *निम्बादित्य या निVम्बार्क* पड़ गया । आपने अनेक ग्रंथों की रचना की किंतु वेदांत सूत्रों के भाष्य, वेदांतपारिजातसौरभ के अतिरिक्त अन्य प्रधान ग्रंथ उपलब्ध नहीं है ।
************

निम्बार्काचार्य भारत के प्रसिद्ध दार्शनिक थे जिन्होने द्वैताद्वैत का दर्शन प्रतिपादित किया। उनका समय १३वीं शताब्दी माना जाता है। किन्तु निम्बार्क सम्प्रदाय का मानना है कि निम्बार्क का प्रादुर्भाव ३०९६ ईसापूर्व (आज से लगभग पाँच हजार वर्ष पूर्व) हुआ था। निम्बार्क का जन्मसथान वर्तमान आंध्र प्रदेश में है।
सनातन संस्कृति की आत्मा श्रीकृष्ण को उपास्य के रूप में स्थापित करने वाले निंबार्काचार्य वैष्णवाचार्यों में प्राचीनतम माने जाते हैं। राधा-कृष्ण की युगलोपासना को प्रतिष्ठापित करने वाले निंबार्काचार्य का प्रादुर्भाव कार्तिक पूर्णिमा को हुआ था। भक्तों की मान्यतानुसार आचार्य निंबार्क का आविर्भाव-काल द्वापरांत में कृष्ण के प्रपौत्र बज्रनाभ और परीक्षित पुत्र जनमेजय के समकालीन बताया जाता है।

इनके पिता अरुण ऋषि की, श्रीमद्‌भागवत में परीक्षित की भागवतकथा श्रवण के प्रसंग सहित अनेक स्थानों पर उपस्थिति को विशेष रूप से बतलाया गया है। हालांकि आधुनिक शोधकर्ता निंबार्क के काल को विक्रम की 5वीं सदी से 12वीं सदी के बीच सिद्ध करते हैं। संप्रदाय की मान्यतानुसार इन्हें भगवान के प्रमुख आयुध ‘सुदर्शन’ का अवतार माना जाता है।

इनका जन्म वैदुर्यपत्तन (दक्षिण काशी) के अरुणाश्रण में हुआ था। इनके पिता अरुण मुनि और इनकी माता का नाम जयंती था। जन्म के समय इनका नाम नियमानंद रखा गया और बाल्यकाल में ही ये ब्रज में आकर बस गए। मान्यतानुसार अपने गुरु नारद की आज्ञा से नियमानंद ने गोवर्धन की तलहटी को अपनी साधना-स्थली बनाया।

बचपन से ही यह बालक बड़ा चमत्कारी था। एक बार गोवर्धन स्थित इनके आश्रम में एक दिवाभोजी यति (केवल दिन में भोजन करने वाला संन्यासी) आये। स्वाभाविक रूप से शास्त्र-चर्चा हुई पर इसमें काफी समय व्यतीत हो गया और सूर्यास्त हो गया। यति बिना भोजन किए जाने लगे। तब बालक नियमानंद ने नीम के वृक्ष की ओर संकेत करते हुए कहा कि अभी सूर्यास्त नहीं हुआ है, आप भोजन करके ही जाएं। लेकिन यति जैसे ही भोजन करके उठे तो देखा कि रात्रि के दो पहर बीत चुके थे। तभी से इस बालक का नाम ‘निंबार्क’, यानी निंब (नीम का पेड़) पर अर्क (सूर्य) के दर्शन कराने वाला, हो गया।
निंबार्काचार्य ने ब्रह्मसूत्र, उपनिषद और गीता पर अपनी टीका लिखकर अपना समग्र दर्शन प्रस्तुत किया। इनकी यह टीका ‘वेदांत पारिजात सौरभ’ (दसश्लोकी) के नाम से प्रसिद्ध है। इनका मत ‘द्वैताद्वैत’ या ‘भेदाभेद’ के नाम से जाना जाता है। आचार्य निंबार्क के अनुसार जीव, जगत और ब्रह्म में वास्तविक रूप से भेदाभेद संबंध है। निंबार्क इन तीनों के अस्तित्व को उनके स्वभाव, गुण और अभिव्यक्ति के कारण भिन्न (प्रथक) मानते हैं तो तात्विक रूप से एक होने के कारण तीनों को अभिन्न मानते हैं। निंबार्क के अनुसार उपास्य राधाकृष्ण ही पूर्ण ब्रह्‌म हैं।

डॉ॰सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने अपनी सुविख्यात पुस्तक ‘भारतीय दर्शन’ में निंबार्क और उनके वेदांत दर्शन की चर्चा करते हुए लिखा है कि निंबार्क की दृष्टि में भक्ति का तात्पर्य उपासना न होकर प्रेम अनुराग है। प्रभु सदा अपने अनुरक्त भक्त के हित साधन के लिए प्रस्तुत रहते हैं। भक्तियुक्त कर्म ही ब्रह्मज्ञान प्राप्ति का साधन है।
यद्यपि श्रीनिम्बार्काचार्य ने अनेक ग्रन्थों का प्रणयन किया, किन्तु वर्तमान में वेदान्त-कृष्ण की पूजा होती है। श्रीमद्भागवत इस सम्प्रदाय का प्रधान ग्रन्थ है। इनके मत में ब्रह्म से जीव पृथक् भी है और एक भी है।
निम्बार्क सम्प्रदाय का विकास दो श्रेणियों में हुआ, एक विरक्त और दूसरी गृहस्थ। आचार्य निम्बार्क के दो प्रमुख शिष्य थे, केशव भट्ट और हरि व्यास। केशव भट्ट के अनुयायी विरक्त होते हैं और हरि व्यास के अनुयायी गृहस्थ। निम्बार्क सम्प्रदाय में राधा और कृष्ण की पूजा होती है।
ये लोग गोपीचन्दन का तिलक लगाते हैं और श्रीमद्भागवत इनका प्रमुख सम्प्रदाय ग्रन्थ है। भारत में अब भी इस सम्प्रदाय के अनुयायी पर्याप्त संख्या में हैं। सम्प्रदाय के रूप में निम्बार्क परम्परा को आगे बढ़ाने वाले उत्तरवर्ती आचार्यों में गोस्वामी श्री हित हरिवंश, श्री हरि व्यास और स्वामी हरिदास की गिनती प्रमुख रूप से की जाती है। उत्तरवर्ती आचार्यों में माधव मुकुन्द (1700- 1800 ई.) भी बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि निम्बार्क का गोलोकवास वृन्दावन या इसके आसपास चौदहवीं शती में हुआ।
सलेमाबाद (जिला अजमेर) के राधामाधव मंदिर, वृंदावन के निंबार्क-कोट, नीमगांव (गोवर्धन) सहित भारत के विभिन्न हिस्सों में निंबार्क जयंती विशेष समारोह पूर्वक मनाई जाती है।

Related Posts

कल्पवास

astroadmin | January 10, 2019 | 0

कल्पवास वेदकालीन अरण्य संस्कृति की देन है। कल्पवास का विधान हज़ारों वर्षों से चला आ रहा है। जब तीर्थराज प्रयाग में कोई शहर नहीं था तब यह भूमि ऋषियों की…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

दैनिक पन्चांग

तत्काल लिखे गये

फेसबुक

सबसे ज्यादा देखे जाने वाले

दिन के अनुसार देखे

January 2019
S M T W T F S
« Dec    
 12345
6789101112
13141516171819
20212223242526
2728293031  

स्तोत्रम

अब तक देखा गया

  • 49,798

नये पोस्ट को पाने के लिये अपना ईमेल लिख कर सब्सक्राइब करे


ज्योतिष वास्तु और किसी भी प्रकार के रत्न के लिये फोन करे – 7309053333
%d bloggers like this: