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धर्म शास्त्र द्वारा कुछ ज्ञान की बातें

astroadmin | January 2, 2019 | 0 | अध्यात्म और धर्म

*करोति सुहृदां दैन्यमहितानां तथा मुदम् ।*
*अकाले च जरां पित्रोः कुसुतः कुरूते धु्रवम् ।।*
मार्कण्डेय पुराण, ७२/१२१

‘‘कुपुत्र निश्चय ही मित्रों को दुःखी तथा शत्रुओं को प्रसन्न करता है एवं माता-पिता की असयम में ही वृद्धावस्था ला देता है ।‘‘
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जीवन की कोई ऐसी परिस्थिति नहीं जिसे अवसर में ना बदला जा सके। हर परिस्थिति का  कुछ ना कुछ सन्देश होता है। अगर तुम्हारे पास किसी दिन कुछ खाने को ना हो तो श्री सुदामा जी की तरह प्रभु को धन्यवाद दो “प्रभु आज आपकी कृपा से यह एकादशी जैसा पुण्य मुझे प्राप्त हो रहा है।
अगर कभी भारी संकट आ जाए तो माँ कुंती की तरह भगवान के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करो कि प्रभु मेरे जीवन में यह दुःख ना आता तो मै आपको कैसे स्मरण करता ? मै अपने सुखों में उलझकर कहीं दिग्भ्रमित ना हो जाऊँ, इसीलिए आपने मेरे ऊपर यह कृपा की है। हर पल प्रभु को धन्यवाद दो
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*”कोशिश”*
*आखिरी सांस तक करनी चाहिए,*
*या तो “लक्ष्य” हासिल होगा*
*या “अनुभव”*

*”चीजें दोनों ही अच्छी है।”*
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सूर्य संवेदना पुष्पे:, दीप्ति कारुण्यगंधने|*
*लब्ध्वा शुभम् नववर्षेअस्मिन् कुर्यात्सर्वस्य मंगलम् ||*

“`जिस तरह सूर्य प्रकाश देता है, संवेदना करुणा को जन्म देती है, पुष्प सदैव महकता रहता है, उसी तरह यह नूतन वर्ष आपके लिए  हर दिन, हर पल के लिए मंगलमय हो।“`
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अनाश्रित:  कर्म  फलं कार्यं कर्म  करोति  य:l*
*स सन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चा क्रिया ll*

भावार्थ– *जो पुरुष कर्म फल की इच्छा का त्याग कर सदैव शुभ कर्म करता रहता है, परोपकार ही जिसके जीवन का ध्येय है, वही सच्चा सन्यासी है। कर्मों का त्याग सन्यास नहीं, अपितु अशुभ कर्मों का त्याग सन्यास है। दुनियाँ का त्याग करना सन्यास नहीं है अपितु दुनियाँ के लिए त्याग करना यह परम सन्यास है।*
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*धनानि भूमौ पशवः हि गोष्ठे*,
*नारि गृहद्वारि जनाः श्मशाने ।*
*देहश्चितायाम् परलोक मार्गे,*
*धर्मानुगो गच्छति जीवः एकः* ।।

*भावार्थ -* *मनुष्य का शरीर शांत होने पर, धन सम्पदा भूमि पर ही पड़ी रह जाती है, मोटर गाड़ियाँ घर में, पशु अस्तबल में रह जाते हैं , पत्नि घर के द्वार तक साथ देती है, बन्धुजन श्मशान तक साथ चलते हैं और अपनी स्वयं की देह चित्ता तक ही साथ देती है । तत्पश्चात् परलोक मार्ग पर जीव को अकेला ही जाना होता है । केवल धर्म ही उसका अनुगमन करता हुआ साथ चलता हैl*
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*भक्तिर्देवे मतिर्धर्मे ,*
*शक्तिस्त्यागे रतिः श्रुतौ l*
*दया सर्वेषु भूतेषु ,*
*स्यान्मे जन्मनि जन्मनि ll*

*भावार्थ– *हमारी प्रार्थना का मुख्य बिंदु यहीं हो कि प्रत्येक जन्म में मेरी परमात्मा में भक्ति हो, धर्म में मति हो, त्याग-दान देने की शक्ति हो, वेद के प्रति प्रेम हो और सभी प्राणियों के प्रति दया की भावना हो।*

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*किं तस्य बहुभिर्मन्त्रै: किं तीर्थै: किं तपोऽध्वरै:।*
*यस्यो  नम:   शिवायेति  मन्त्रो  हृदयगोचर:।।*

भावार्थ– *जिसके हृदय में  ‘नम: शिवाय’ यह मन्त्र निवास करता है, उसके लिए बहुत-से मन्त्र, तीर्थ, तप और यज्ञों की क्या आवश्यकता है!*
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जैसे सर्प की बाँबी (बिल )पीटने से सर्प का शमन नहीँ होता,उसी तरह बाह्य उपचार द्वारा आंतरिक  दोषों का भी शमन सम्भव नहीँ ॥
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सज्जन व्यक्ति सबको अपने जैसा सज्जन समझता है , किन्तु बदले मे कुटिल लोगों द्वारा ठगा जाता है
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सन्त समझाता है ,समझो और मानो तो ठीक ,न मानो तो तुम जानो ।
दुष्ट मनवाता है ,मान गये तो ठीक और न माने तो तुम जानो ॥नहिं कलि करम न ,भगति विवेकू ।राम नाम अवलम्बन एकू ।
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जिस प्रकार सूर्य की किरणों द्वारा अवशोषित होता हुआ जलसामान्य दृष्टि से  दिखाई नहीँ देता उसी तरह सर्वव्यापी परमात्मा भी सामान्य दृष्टि से नहीँ दिखता ॥हरिओम ॥
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ईशावास्यमिद्मसर्वम
जैसे बर्फ मे सर्वत्र जल व्याप्त होता है ठीक उसी तरह सृष्टि मे सर्वत्र ईश्वर व्याप्त है ।
॥हरि व्यापक सर्वत्र समाना ,

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जब नाव से नदिया पार हुई ,तो नाव से रहा प्रयोजन क्या ।
है आत्म ज्ञान हो गया जिसे ,उस योगी को फिर साधन क्या ॥

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बारि मथे घृत होइ बरु ,सिकता ते बरु तेल।
बिनु हरि भजन न भव तरिय,यह सिद्धांत                     अपेल ॥
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परित्राणाय साधूनाम विनाशाय च दुष्कृताम !
धर्म संस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥

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सुखी मीन जे नीर अगाधा,जिमि हरि शरण न एकउ बाधा

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भक्तिरेकैव मुक्तिदा
एकमात्र भक्ति ही मुक्ति देने में समर्थ है
दान व्रत नियम ज्ञान ध्यान होम और जप ए सब यत्न पूर्वक करने पर भी क्रोधी मनुस्य के व्यर्थ हो जाते हैँ ।
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क्रोधितस्य वृथा भवेत् ।
खुद को शर्म आये ऐसा कर्म कभी न करें ।
जैसे बछड़े गाय के पीछे सब जगह जाते हैं . ऐसे ही हमारे कर्म हर जन्म मे हमारे पीछे लगे रहते हैं ! इस लिए सदा सत्कर्म करना चाहिए ! !
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स्वात्मन्यवस्थानम मोक्ष:
आत्मा का अपने यथार्थ रुप में अवस्थान को मोक्ष कहते हैं ।
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एक एव सुहृद्धर्मों
निधनेप्यनुयाति य :।
शरीरेण समं नाशं
सर्वमन्यद्धिगच्छति ॥
एक धर्म ही ऐसा है जो मरने के बाद भी साथ जाता है। अन्य पदार्थ तो शरीर के साथ ही नष्ट हो जाते हैं ॥

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यदि त्रेता युग मेँ राक्षसराज रावण के अनुचर –
जंहकहुँ विप्र धेनु द्विज पावहिं।
नगर गाँव पुर आग लगावहिं॥ —
स्वयँ रावण ब्राह्मण होते हुए भी –
आपुहिउठिधावहिरहय न पावहि जो कह वेद पुराना ॥
तो कलयुग मेँ अधर्मियों द्वारा गाय, वेद और ब्राह्मण विरोध -किं आश्चर्यम् ॥

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