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धनतेरस का महत्व और विधि

astroadmin | October 31, 2018 | 0 | अध्यात्म और धर्म

पांच दिवसीय दीपोत्सव पर्व का पहला दिन धनतेरस होता है प्रतिवर्ष धनतेरस का पर्व कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी तिथि के दिन पूरी श्रद्धा व विश्वास के साथ मनाया जाता है। धनवन्तरि के अलावा इस दिन, देवी लक्ष्मी और धन के देवता कुबेर की भी पूजा करने की मान्यता है। इस बार धनतेरस 5 नवंबर को आ रही है। इस दिन के बारे में पूराणो मे एक कथा प्रचलित है।

प्रचलित कथा के अनुसार कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन समुद्र मंथन से आयुर्वेद के जनक भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। उन्होंने देवताओं को अमृतपान कराकर अमर कर दिया था। 

अतः वर्तमान संदर्भ में भी आयु और स्वास्थ्य की कामना से धनतेरस पर भगवान धन्वंतरि का पूजन किया जाता है। इस दिन वैदिक देवता यमराज का पूजन भी किया जाता है। 

कई श्रद्धालु इस दिन उपवास रहकर यमराज की कथा का श्रवण भी करते हैं। आज से ही तीन दिन तक चलने वाला गो-त्रिरात्र व्रत भी शुरू होता है। 

1 * इस दिन धन्वंतरि जी का पूजन करें। 

 

2 * नवीन झाडू एवं सूपड़ा खरीदकर उनका पूजन करें।

 

3 * सायंकाल दीपक प्रज्वलित कर घर, दुकान आदि को श्रृंगारित करें।

 

4 * मंदिर, गौशाला, नदी के घाट, कुओं, तालाब, बगीचों में भी दीपक लगाएं।

 

5 * यथाशक्ति तांबे, पीतल, चांदी के गृह-उपयोगी नवीन बर्तन व आभूषण क्रय करते हैं।

 

6 * हल जुती मिट्टी को दूध में भिगोकर उसमें सेमर की शाखा डालकर तीन बार अपने शरीर पर फेरें।

 

7 * कार्तिक स्नान करके प्रदोष काल में घाट, गौशाला, बावड़ी, कुआं, मंदिर आदि स्थानों पर तीन दिन तक दीपक जलाएं। 

 

8*  कुबेर पूजन करें। शुभ मुहूर्त में अपने व्यावसायिक प्रतिष्ठान में नई गादी बिछाएं अथवा पुरानी गादी को ही साफ कर पुनः स्थापित करें। पश्चात नवीन वस्त्र बिछाएं।

 

9* सायंकाल पश्चात तेरह दीपक प्रज्वलित कर तिजोरी में कुबेर का पूजन करें।

 

10* निम्न ध्यान मंत्र बोलकर भगवान कुबेर पर फूल चढ़ाएं –

 

श्रेष्ठ विमान पर विराजमान, गरुड़मणि के समान आभावाले, दोनों हाथों में गदा एवं वर धारण करने वाले, सिर पर श्रेष्ठ मुकुट से अलंकृत तुंदिल शरीर वाले, भगवान शिव के प्रिय मित्र निधीश्वर कुबेर का मैं ध्यान करता हूं।

 

इसके पश्चात निम्न मंत्र द्वारा चंदन, धूप, दीप, नैवेद्य से पूजन करें –

 

‘यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धन-धान्य अधिपतये 

धन-धान्य समृद्धि मे देहि दापय स्वाहा।’ 

 

इसके पश्चात कपूर से आरती उतारकर मंत्र पुष्पांजलि अर्पित करें।

 

11*  यम के निमित्त दीपदान करें। 

 

12 * तेरस के सायंकाल किसी पात्र में तिल के तेल से युक्त दीपक प्रज्वलित करें।

 

13 * पश्चात गंध, पुष्प, अक्षत से पूजन कर दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके यम से निम्न प्रार्थना करें-

 

‘मृत्युना दंडपाशाभ्याम्‌ कालेन श्यामया सह। 

त्रयोदश्यां दीपदानात्‌ सूर्यजः प्रयतां मम। 

 

अब उन दीपकों से यम की प्रसन्नता के लिए सार्वजनिक स्थलों को प्रकाशित करें।

एक कथा और प्रचलित है एक समय भगवान विष्णु मृत्युलोक में विचरण करने के लिए आ रहे थे तब लक्ष्मीजी ने भी उनसे साथ चलने का आग्रह किया। तब विष्णु जी ने कहा कि यदि मैं जो बात कहूं तुम अगर वैसा ही मानो तो फिर चलो। तब लक्ष्मीजी उनकी बात मान गईं और भगवान विष्णु के साथ भूमंडल पर आ गईं। कुछ देर बाद एक जगह पर पहुंच कर भगवान विष्णु ने लक्ष्मीजी से कहा कि जब तक मैं न आऊं तुम यहां ठहरो। मैं दक्षिण दिशा की ओर जा रहा हूं, तुम उधर मत आना। विष्णुजी के जाने पर लक्ष्मी के मन में कौतुहल जागा कि आखिर दक्षिण दिशा में ऐसा क्या रहस्य है, जो मुझे मना किया गया है और भगवान स्वयं चले गए। 

 

लक्ष्मीजी से रहा न गया और जैसे ही भगवान आगे बढ़े लक्ष्मी भी पीछे-पीछे चल पड़ीं। कुछ ही आगे जाने पर उन्हें सरसों का एक खेत दिखाई दिया जिसमें खूब फूल लगे थे। सरसों की शोभा देखकर वह मंत्रमुग्ध हो गईं और फूल तोड़कर अपना श्रृंगार करने के बाद आगे बढ़ीं। आगे जाने पर एक गन्ने के खेत से लक्ष्मीजी गन्ने तोड़कर रस चूसने लगीं। 

 

उसी क्षण विष्णु जी आए और यह देख लक्ष्मीजी पर नाराज होकर उन्हें शाप दे दिया कि मैंने तुम्हें इधर आने को मना किया था, पर तुम न मानी और किसान की चोरी का अपराध कर बैठी। अब तुम इस अपराध के जुर्म में इस किसान की 12 वर्ष तक सेवा करो। ऐसा कहकर भगवान उन्हें छोड़कर क्षीरसागर चले गए। तब लक्ष्मीजी उस गरीब किसान के घर रहने लगीं। 

 

एक दिन लक्ष्मीजी ने उस किसान की पत्नी से कहा कि तुम स्नान कर पहले मेरी बनाई गई इस देवी लक्ष्मी का पूजन करो, फिर रसोई बनाना, तब तुम जो मांगोगी मिलेगा। किसान की पत्नी ने ऐसा ही किया। पूजा के प्रभाव और लक्ष्मी की कृपा से किसान का घर दूसरे ही दिन से अन्न, धन, रत्न, स्वर्ण आदि से भर गया। लक्ष्मी ने किसान को धन-धान्य से पूर्ण कर दिया। किसान के 12 वर्ष बड़े आनंद से कट गए। फिर 12 वर्ष के बाद लक्ष्मीजी जाने के लिए तैयार हुईं। 

 

विष्णुजी लक्ष्मीजी को लेने आए तो किसान ने उन्हें भेजने से इंकार कर दिया। तब भगवान ने किसान से कहा कि इन्हें कौन जाने देता है, यह तो चंचला हैं, कहीं नहीं ठहरतीं। इनको बड़े-बड़े नहीं रोक सके। इनको मेरा शाप था इसलिए 12 वर्ष से तुम्हारी सेवा कर रही थीं। तुम्हारी 12 वर्ष सेवा का समय पूरा हो चुका है। किसान हठपूर्वक बोला कि, नहीं अब मैं लक्ष्मीजी को नहीं जाने दूंगा। 

 

तब लक्ष्मीजी ने कहा कि हे किसान तुम मुझे रोकना चाहते हो तो जो मैं कहूं वैसा करो। कल तेरस है। तुम कल घर को लीप-पोतकर स्वच्छ करना। रात्रि में घी का दीपक जलाकर रखना और सायंकाल मेरा पूजन करना और एक तांबे के कलश में रुपए भरकर मेरे लिए रखना, मैं उस कलश में निवास करूंगी। किंतु पूजा के समय मैं तुम्हें दिखाई नहीं दूंगी। इस एक दिन की पूजा से वर्ष भर मैं तुम्हारे घर से नहीं जाऊंगी। यह कहकर वह दीपकों के प्रकाश के साथ दसों दिशाओं में फैल गईं। अगले दिन किसान ने लक्ष्मीजी के कथानुसार पूजन किया। उसका घर धन-धान्य से पूर्ण हो गया।

इसी वजह से हर वर्ष तेरस के दिन लक्ष्मीजी की पूजा होने लगी। 

 

धनतेरस के पर्व को दीपावली का आरंभ माना जाता है। इस दिन को धन एवं आरोग्य से जोड़कर देखा जाता है। यही कारण है कि इस दिन भगवान धनवंतरि और कुबेर का पूजन अर्चन किया जाता है। ताकि हर घर में समृद्धि और आरोग्य बना रहे। धनतेरस पर पढ़ें यह विशेष 6 बातें –  

1 धनतेरस, धनवंतरि त्रयोदशी या धन त्रयोदशी दीपावली से पूर्व मनाया जाना महत्वपूर्ण पर्व है। इस दिन आरोग्य के देवता धनवंतरी, मृत्यु के अधिपति यम, वास्तविक धन संपदा की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी तथा वैभव के स्वामी कुबेर की पूजा की जाती है।

2  इस त्योहार को मनाए जाने के पीछे मान्यता है कि लक्ष्मी के आह्वान के पहले आरोग्य की प्राप्ति और यम को प्रसन्न करने के लिए कर्मों का शुद्धिकरण अत्यंत आवश्यक है। कुबेर भी आसुरी प्रवृत्तियों का हरण करने वाले देव हैं। 

3  धनवंतरि और मां लक्ष्मी का अवतरण समुद्र मंथन से हुआ था। दोनों ही कलश लेकर अवतरित हुए थे। इसके साथ ही मां लक्ष्मी का वाहन ऐरावत हाथी भी समुद्र मंथन द्वारा अवतरित हुआ था।

4  श्री सूक्त में लक्ष्मी के स्वरूपों का विवरण कुछ इस प्रकार मिलता है। ‘धनमग्नि, धनम वायु, धनम सूर्यो धनम वसु:’अर्थात् प्रकृति ही लक्ष्मी है और प्रकृति की रक्षा करके मनुष्य स्वयं के लिए ही नहीं, अपितु नि:स्वार्थ होकर पूरे समाज के लिए लक्ष्मी का सृजन कर सकता है। 

5  श्री सूक्त में आगे यह भी लिखा गया है- ‘न क्रोधो न मात्सर्यम न लोभो ना अशुभा मति’ तात्पर्य यह कि जहां क्रोध और किसी के प्रति द्वेष की भावना होगी, वहां मन की शुभता में कमी आएगी, जिससे वास्तविक लक्ष्मी की प्राप्ति में बाधा उत्पन्न होगी। यानी किसी भी प्रकार की मानसिक विकृतियां लक्ष्मी की प्राप्ति में बाधक हैं।

6  आचार्य धनवंतरि के बताए गए मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य संबंधी उपाय अपनाना ही धनतेरस का प्रयोजन है। श्री सूक्त में वर्णन है कि, लक्ष्मी जी भय और शोक से मुक्ति दिलाती हैं तथा धन-धान्य और अन्य सुविधाओं से युक्त करके मनुष्य को निरोगी काया और लंबी आयु देती हैं। अत: धनतेरस पर लक्ष्मी जी का पूजन अवश्य करें।

 इस दिन धन के देवता कुबेर और लक्ष्मी की पूजा करने का विधान तो है ही, इसी दिन आयु और आरोग्य के लिए आयुर्वेद के देवता भगवान धनवंतरि की पूजा भी की जाती है। लेकिन इस दिन की सबसे ज्यादा मान्यता धन की पूजा से ही जुड़ी है। इसलिए इस दिन दिन धन की प्राप्ति के लिए अनेक तरह के टोटके, उपाय, तंत्र-मंत्र    किए जाते हैं।  आइए जानते हैं इस दिन किया जाने वाला एक ऐसा सिद्ध और चमत्कारिक प्रयोग, जिसे करने से आपके जीवन की आर्थिक समस्याओं का समाधान हो जाएगा।

कौड़ी और गोमती चक्र से यह प्रयोग जुड़ा है कौड़ी और गोमती चक्र से। मां लक्ष्मी की पूजा में अधिकांश लोग कौड़ी रखते हैं। लक्ष्मी पूजा में कुछ लोग गोमती चक्र भी रखते हैं। लेकिन किसी को इन चीजों का असली प्रयोग पता नहीं है। यह सिद्ध प्रयोग अनेकों बार आजमाया जा चुका है और तंत्र शास्त्र में भी इस प्रयोग के चमत्कारों के बारे में बातें लिखी गई हैं।

ध्यान रहे कौड़ी पूरी सफेद होनी चाहिए इस प्रयोग को करने के लिए आपको पांच सफेद कौड़ी की जरूरत होगी। ध्यान रहे कौड़ी पूरी सफेद होनी चाहिए, उन पर किसी प्रकार का दाग-धब्बा नहीं होना चाहिए। इसी तरह सात गोमती चक्र लाएं। ये दोनों चीजें किसी पूजा-पाठ के सामान मिलने वाली दुकान पर आसानी से मिल जाएंगी। धनतेरस के दिन ये दोनों चीजें खरीदकर ले आएं। अब संध्याकाल में स्नान करके शुद्ध वस्त्र धारण करें और अपने पूजा स्थान लाल सूती कपड़े के आसन पर बैठ जाएं। अपने सामने चौकी पर मां लक्ष्मी और कुबेर की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। अष्टदल कलम उनके सामने चौकी पर ही चावल से अष्टदल कलम बनाएं और उसके मध्य में लाल कमल का फूल रखें। एक पात्र में कौड़ी और गोमती चक्र रखकर उन्हें गंगाजल से अच्छे से धो लें। इन्हें साफ कपड़े से पोंछने के बाद कमल के फूल पर रखें और इन पर केसर की बिंदी लगाएं। धूप-दीप से आरती करें और इसके बाद कनकधारा स्तोत्र के सात पाठ और श्रीसूक्त के पांच पाठ करें। इसके बाद कौड़ी, गोमती चक्र, कमल का फूल और कुछ दाने चावल के लेकर इन्हें लाल रेशमी वस्त्र में बांधकर अपनी तिजोरी में रखें।

यह होंगे लाभ आर्थिक समस्याओं का समाधान होगा। बार-बार धन की हानि नहीं होगी। कर्ज से छुटकारा मिलेगा। कुबेर की कृपा से आपके पास धन का संग्रहण होने लगेगा। समस्त प्रकार के भौतिक सुखों की प्राप्ति होगी। भूमि, भवन, वाहन खरीदने के योग बनेंगे। उधार दिया हुआ पैसा कभी फंसेगा नहीं। जो पैसा फंसा हुआ है व आपके पास जल्द लौट आएगा। आजीविका का संकट दूर होगा। यदि आपके पास नौकरी व्यवसाय नहीं है तो तीन महीने के भीतर परेशानी दूर हो जाएगी।

धनतेरस को क्या क्या नही खरीदना है…….

शीशे का सामान- राहु से संबंधित वस्तु होने के कारण इनकी खरीदारी से बचना चाहिए। अगर शीशे का सामान खरीदना जरूरी ही है तब इस बात का ध्यान रखें कि वह पारदर्शी हो धुंधला शीशा न खरीदें, कांच की बनी वस्तुएं न लें। 

एल्युमिनियम के बर्तन- राहु से संबंधित वस्तु होने के कारण इनकी भी खरीदारी करने से बचें। चाकू, कैंची, छुरी और लोहे के बरतन आदि भी धनतेरस पर न लें।

सोने के आभूषण की बजाय हीरे और चांदी के आभूषण खरीदना अधिक शुभ रहेगा। सोना खरीदना ही है तो बिस्कुट या बॉड खरीदें, लाभ होगा।

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