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तुलसीदास, मीरा बाई ,रैदास आदि

astroadmin | March 19, 2018 | 0 | अध्यात्म और धर्म

पूरा नाम : गोस्वामी तुलसीदास जी जन्म : 1511 ई० (सम्वत्- 1568 वि०)जन्म स्थान : राजापुर, चित्रकूट – उत्तर प्रदेश
पिता का नाम : आत्माराम दुबे
माता का नाम : हुलसी (पत्नी )
पत्नी     -रत्नावली
तुलसीदास की मृत्यु : 1623 ई० (संवत 1680 वि०)
रामललानहछूवैराग्य-संदीपनीबरवै ,रामायणकलिधर्माधर्म निरुपण, रामायणछप्पय ,रामायणकुंडलिया ,रामायणछंदावली, रामायणसतसईजानकी-मंगलपार्वती, -मंगलश्रीकृष्ण-गीतावलीझूलनारोला ,रामायण, रामशलाकाक, वितावली, दोहावली, रामाज्ञाप्रश्न, गीतावली, विनयपत्रिका, संकट
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मीरा बाई
जन्म: –        /   / 1498,ई/   आश्विन पूर्णिमा की रात भोर मे
मेड़ता, राजस्थान

मृत्यु: 1547

मीरा का जन्म राजस्थान के मेड़ता में सन 1498 में एक राजपरिवार में हुआ था।मीरा का विवाह राणा सांगा के पुत्र और मेवाड़ के राजकुमार भोज राज के साथ सन 1516 में संपन्न हुआ। उनके पति भोज राज दिल्ली सल्तनत के शाशकों के साथ एक संघर्ष में सन 1518 में घायल हो गए
और इसी कारण सन 1521 में उनकी मृत्यु हो गयी।
उनके पति के मृत्यु के कुछ वर्षों के अन्दर ही उनके पिता और श्वसुर भी मुग़ल साम्राज्य के संस्थापक बाबर के साथ युद्ध में मारे गए।
सन्‌ 1533 के आसपास मीरा को ‘राव बीरमदेव’ ने मेड़ता बुला लिया और  मीरा के चित्तौड़ त्याग के अगले साल ही सन्‌ 1534 में गुजरात के बहादुरशाह ने चित्तौड़ पर कब्ज़ा कर लिया।
इस युद्ध में चितौड़ के शासक विक्रमादित्य मारे गए तथा सैकड़ों महिलाओं ने जौहर किया। इसके पश्चात सन्‌ 1538 में जोधपुर के शासक राव मालदेव ने मेड़ता पर अधिकार कर लिया जिसके बाद बीरमदेव ने भागकर अजमेर में शरण ली और मीरा बाई ब्रज की तीर्थ यात्रा पर निकल पड़ीं।

सन्‌ 1539 में मीरा बाई वृंदावन में रूप गोस्वामी से मिलीं। वृंदावन में कुछ साल निवास करने के बाद मीराबाई सन्‌ 1546 के आस-पास द्वारका चली गईं।

तत्कालीन समाज में मीराबाई को एक विद्रोही माना गया क्योंकि उनके धार्मिक क्रिया-कलाप किसी राजकुमारी और विधवा के लिए स्थापित परंपरागत नियमों के अनुकूल नहीं थे।

इसी दौरान उन्होंने तुलसीदास को पत्र लिखा था :-

स्वस्ति श्री तुलसी कुलभूषण दूषन- हरन गोसाई।
बारहिं बार प्रनाम करहूँ अब हरहूँ सोक- समुदाई।।
घर के स्वजन हमारे जेते सबन्ह उपाधि बढ़ाई।
साधु- सग अरु भजन करत माहिं देत कलेस महाई।।
मेरे माता- पिता के समहौ, हरिभक्तन्ह सुखदाई।
हमको कहा उचित करिबो है, सो लिखिए समझाई।।

मीराबाई के पत्र का जबाव तुलसी दास ने इस प्रकार दिया:-

जाके प्रिय न राम बैदेही।
सो नर तजिए कोटि बैरी सम जद्यपि परम सनेहा।।
नाते सबै राम के मनियत सुह्मद सुसंख्य जहाँ लौ।
अंजन कहा आँखि जो फूटे, बहुतक कहो कहां लौ।।

मीराबाई ने चार ग्रंथों की रचना की–

– बरसी का मायरा
– गीत गोविंद टीका
– राग गोविंद
– राग सोरठ के पद

बसो मेरे नैनन में नंदलाल।
मोहनी मूरति, साँवरि, सुरति नैना बने विसाल।।
अधर सुधारस मुरली बाजति, उर बैजंती माल।
क्षुद्र घंटिका कटि- तट सोभित, नूपुर शब्द रसाल।
मीरा प्रभु संतन सुखदाई, भक्त बछल गोपाल।।

मीराबाई रैदास को अपना गुरु मानते हुए कहती हैं –

‘गुरु मिलिया रैदास दीन्ही ज्ञान की गुटकी।’

अब कैसे छूटे राम रट लागी।
प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी, जाकी अँग-अँग बास समानी॥
प्रभु जी, तुम घन बन हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा॥
प्रभु जी, तुम दीपक हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती॥
प्रभु जी, तुम मोती, हम धागा जैसे सोनहिं मिलत सोहागा

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भारत के महान संत और आध्यात्मिक कवि कबीर दास का जन्म  वर्ष 1440 में और मृत्यु वर्ष 1518 में हुई थी। इस्लाम के अनुसार ‘कबीर’ का अर्थ महान होता है।
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रैदास नाम से विख्यात संत रविदास का जन्म सन् 1388 (इनका जन्म कुछ विद्वान 1398 में हुआ भी बताते हैं) को बनारस में हुआ था। रैदास कबीर के समकालीन हैं।

रैदास की ख्याति से प्रभावित होकर सिकंदर लोदी ने इन्हें दिल्ली आने का निमंत्रण भेजा था।

मध्ययुगीन साधकों में रैदास का विशिष्ट स्थान है। कबीर की तरह रैदास भी संत कोटि के प्रमुख कवियों में विशिष्ट स्थान रखते हैं। कबीर ने ‘संतन में रविदास’ कहकर इन्हें मान्यता दी है।

जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात।
रैदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जाति न जात।।

रैदास कनक और कंगन माहि जिमि अंतर कछु नाहिं।
तैसे ही अंतर नहीं हिन्दुअन तुरकन माहि।।

हिंदू तुरक नहीं कछु भेदा सभी मह एक रक्त और मासा।
दोऊ एकऊ दूजा नाहीं, पेख्यो सोइ रैदासा।।

मीराबाई रैदास को अपना गुरु मानते हुए कहती हैं –

‘गुरु मिलिया रैदास दीन्ही ज्ञान की गुटकी।’

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रहीम का पूरा नाम अब्दुल रहीम (अब्दुर्रहीम) ख़ानख़ाना था। आपका जन्म 17 दिसम्बर 1556 को लाहौर में हुआ। रहीम के पिता का नाम बैरम खान तथा माता का नाम सुल्ताना बेगम था। बैरम ख़ाँ मुगल बादशाह अकबर के संरक्षक थे। रहीम जब पैदा हुए तो बैरम ख़ाँ की आयु 60 वर्ष हो चुकी थी।

कहा जाता है कि रहीम का नामकरण अकबर ने ही किया था।अब्दुल रहीम का जन्म लाहौर (वर्तमान पाकिस्तान में) बैरम खान के बेटे के रूप में हुआ था।

गुजरात के पाटन में बैरन खान की मृत्यु हो जाने के बाद उनकी पहली पत्नी और छोटे रहीम को दिल्ली से अहमदाबाद सुरक्षा पूर्वक लाया गया और अकबर के शाही दरबार में पेश किया गया, जिन्होंने बाद में उसे ‘मिर्ज़ा खान’ का शीर्षक दिया था।
,ए बैरम खान की दूसरी पत्नी, सलीमा सुल्तान बेगम (रहीम की बड़ी अम्मीजान) ने उनके चचेरे भाई, अकबर से निगाह कर लिया। जिसने इसके बाद अब्दुल रहीम को दरबार में खान-ए-खाना बनाया और इसके बाद अब्दुल रहीम अकबर के शाही दरबार के नौरत्नो में से एक ,

बहुत से दोहे लिखने के अलावा, रहीम ने बाबर के संस्मरण का अनुवाद किया, बाबरनामा का अनुवाद चगताई भाषा से पर्शियन भाषा में किया, जिसका काम 998 CE (1589-90) में पूरा हुआ। संस्कृत पर रहीम की अच्छी पकड़ थी।

संस्कृत में उन्होंने ज्योतिषी शास्त्र पर दो किताबे लिखी। जिनका नाम खेताकौतुकम और द्वात्रिम्शाद्योगावाल्ली।

मुस्लिम धर्म के अनुयायी होने के बावजूद कृष्ण  भक्त थे ,

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रैदास नाम से विख्यात संत रविदास का जन्म सन् 1388 (इनका जन्म कुछ विद्वान 1398 में हुआ भी बताते हैं) को बनारस में हुआ था। रैदास कबीर के समकालीन हैं।

रैदास की ख्याति से प्रभावित होकर सिकंदर लोदी ने इन्हें दिल्ली आने का निमंत्रण भेजा था।

मध्ययुगीन साधकों में रैदास का विशिष्ट स्थान है। कबीर की तरह रैदास भी संत कोटि के प्रमुख कवियों में विशिष्ट स्थान रखते हैं। कबीर ने ‘संतन में रविदास’ कहकर इन्हें मान्यता दी है।
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मिर्ज़ा ग़ालिब का जन्म आगरा में हुआ था। प्रसिद्ध उर्दू आलोचक मालिक राम लिखते है: ‘‘मिर्जा 8 रजब हिजरी 27 दिसम्बर 1797 ई0 को बुधवार के दिन सूरज निकलने से चार घड़ी पहले आगरे में पैदा हुए थे।” लगभग ग़ालिब जब पांच वर्ष के थे तो उनके पिता अब्दुल्ला बेग का 1802 में स्वर्गवास हो गया। उनकी देख-रेख उनके चाचा नसरूल्ला बेग ने की मगर 1806 में वे भी अल्लाह को प्यार हो गए। बचपन में ग़ालिब ने अपने हाथ से पतंगें भी बनाईं और उडाईं और साथ ही साथ कबूतर बाजी में भी एक समय पीछे नहीं थे।

के घर का दर्दनाक फ़साना: ग़ालिब सदा से ही किराए के मकान में रहे क्योंकि कभी इतनी रक़म ही न जुटा पाए कि अपना घर ले लें। आगरा में पैदा हुए और फिर बारह वर्ष की आयु में दिल्ली आ गए जहां नवाब लोहारू नवाब इलाही बख़्श मारूफ़ की पुत्री से ब्याह हुआ। अपने जीवन के अधिकतर समय में ग़ालिब गली कासिमजान, बल्लीमारान वाली हवेली में रहे जिसको ‘‘हकीमों की हवेली” कहा जाता था क्योंकि इसके मालिक शरीफ़ख़ानी हकीमों के परिवार से थे। ग़ालिब का स्वर्गवास इसी हवेली में हुआ था। ‘‘न था कुछ तो खुदा था कुछ न होता तो खुदा हो/ डुबोया मुझको होने ने, न होता मैं तो क्या होता।”

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मिर्ज़ा ग़ालिब का जन्म आगरा में हुआ था। प्रसिद्ध उर्दू आलोचक मालिक राम लिखते है: ‘‘मिर्जा 8 रजब हिजरी 27 दिसम्बर 1797 ई0 को बुधवार के दिन सूरज निकलने से चार घड़ी पहले आगरे में पैदा हुए थे।” लगभग ग़ालिब जब पांच वर्ष के थे तो उनके पिता अब्दुल्ला बेग का 1802 में स्वर्गवास हो गया। उनकी देख-रेख उनके चाचा नसरूल्ला बेग ने की मगर 1806 में वे भी अल्लाह को प्यार हो गए। बचपन में ग़ालिब ने अपने हाथ से पतंगें भी बनाईं और उडाईं और साथ ही साथ कबूतर बाजी में भी एक समय पीछे नहीं थे।

 

के घर का दर्दनाक फ़साना: ग़ालिब सदा से ही किराए के मकान में रहे क्योंकि कभी इतनी रक़म ही न जुटा पाए कि अपना घर ले लें। आगरा में पैदा हुए और फिर बारह वर्ष की आयु में दिल्ली आ गए जहां नवाब लोहारू नवाब इलाही बख़्श मारूफ़ की पुत्री से ब्याह हुआ। अपने जीवन के अधिकतर समय में ग़ालिब गली कासिमजान, बल्लीमारान वाली हवेली में रहे जिसको ‘‘हकीमों की हवेली” कहा जाता था क्योंकि इसके मालिक शरीफ़ख़ानी हकीमों के परिवार से थे। ग़ालिब का स्वर्गवास इसी हवेली में हुआ था। ‘‘न था कुछ तो खुदा था कुछ न होता तो खुदा हो/ डुबोया मुझको होने ने, न होता मैं तो क्या होता।”

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महाकवि बिहारीलाल का जन्म 1603 के लगभग ग्वालियर में हुआ। उनके पिता का नाम केशवराय था व वे माथुर चौबे जाति से संबंध रखते थे।

बिहारी का बचपन बुंदेल खंड में बीता और युवावस्था ससुराल मथुरा में व्यतीत की। उनके एक दोहे से उनके बाल्यकाल व यौवनकाल का मान्य प्रमाण मिलता है:

जनम ग्वालियर जानिए खंड बुंदेले बाल।
तरुनाई आई सुघर मथुरा बसि ससुराल।।

नहिं पराग नहिं मधुर मधु, नहिं विकास यहि काल।
अली कली ही सा बिंध्यों, आगे कौन हवाल।।

इस दोहे ने राजा पर मंत्र जैसा कार्य किया। वे रानी के प्रेम-पाश से मुक्त होकर पुनः अपना राज-काज संभालने लगे। वे बिहारी की काव्य कुशलता से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने बिहारी से और भी दोहे रचने के लिए कहा और प्रति दोहे पर एक अशर्फ़ी देने का वचन दिया। बिहारी जयपुर नरेश के दरबार में रहकर काव्य-रचना करने लगे, वहां उन्हें पर्याप्त धन और यश मिला। 1664 में वहीं रहते उनकी मृत्यु हो गई।

सतसई बिहारी की प्रमुख रचना हैं। इसमें 713 दोहे हैं।

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रसखान का जन्म सन् 1548 में हुआ माना जाता है। उनका मूल नाम सैयद इब्राहिम था और वे दिल्ली के आस-पास के रहने वाले थे। कृष्ण-भक्ति ने उन्हें ऐसा मुग्ध कर दिया कि गोस्वामी विट्ठलनाथ से दीक्षा ली और ब्रजभूमि में जा बसे। सन् 1628 के लगभग उनकी मृत्यु हुई।

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