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ज्योतिष के बारे मे संक्षेप मे कुछ जानकारी

astroadmin | May 29, 2018 | 0 | अध्यात्म और धर्म , ज्योतिष सीखें

वैदिक काल से ज्योतिष का प्रचलन रहा है। ज्योतिष वेद का छठां अंग भी कहा जाता है। समय की पहिचान बिना ज्योतिष ज्ञान के नही हो सकती है। इसी प्रकार से आसमानी गह भी ज्योतिष से ही कालान्तर के लगातार ज्ञान को प्राप्त करने के कारण ही पहिचाने जाते है। जब तक ज्योतिष का ज्ञान नही था तब तक पृथ्वी स्थिर थी और सूर्य चन्द्रमा और तारे चला करते थे। जैसे ही ज्योतिष का ज्ञान होने लगा तो पता लगा कि सूर्य तो अपनी ही कक्षा मे स्थापित है बाकी के ग्रह चल रहे है। लेकिन ऋषियों और मनीषियों को बहुत पहले से ज्योतिष का ज्ञान था उन्हे प्रत्येक ग्रह के बारे मे जानकारी थी,यहां तक कि मंगल ग्रह के बारे मे भी उनका ज्ञान प्रचुर मात्रा मे था और उन्होने मंगल ग्रह की पूरी गाथा पहले ही लिख दी थी। पुराने जमाने से सुनता आया हूँ- “लाल देह लाली लसे और धरि लाल लंगूर,बज्र देह दानव दलन जय जय कपि शूर”,इस दोहे को लिखा तो तुलसीदास जी है लेकिन उन्हे इस बारे मे कैसे पता लगा कि मंगल का रंग लाल है और जब मंगल को खुली आंख से देखा जाये तो लाल रंग का ही दिखाई देता है सूखा ग्रह है इसलिये बज्र की तरह से कठोर है,साथ ही ध्वजा पर लाल रंग का होना मंगल का उपस्थिति का कारण भी बनाता है,मंगल के देवता हनुमान जी के विषय मे उन्होने लिखा था। इस बात का सटीक पता तब और चला जब अमेरिका के नासा स्पेस से वाइकिंग नामका उपग्रह यान मंगल पर भेजा गया और उसने जब सन दो हजार में मंगल के ऊपर की कुछ तस्वीरे भेजी तो उसके अन्दर एक फ़ेस आफ़ मार्स के नाम से भी तस्वीर आयी। यह तस्वीर बिलकुल हनुमान जी की तस्वीर की तरह थी,इस तस्वीर को उन्होने सन दो हजार दो तक नही प्रसारित की,इसका भी कारण था,वे अपने को बहुत ही उन्नत और वैज्ञानिक भाषा मे दक्ष मानते थे और जब भी उनका कोई टूरिस्ट भारत आता था और भारत मे जब हनुमानजी के मंदिर को देखता तो वह मजाक करता था और “मंकी टेम्पिल” कह के चला जाता था। इस फ़ेस आफ़ मार्स ने अमेरिका के वैज्ञानिक धारणा को चौपट कर दिया और उन्हे यह पता लग गया कि भारत मे तो आदि काल से ही मंगल को हनुमान जी के रूप मे माना जा रहा है।

जिस प्रकार से विज्ञान के अन्दर जो भी धारणा पैदा की जाती है उसके अनुसार रसायन शास्त्र भौतिक शास्त्र चिकित्सा शास्त्र आदि बनाये गये है। लेकिन जितनेी तत्व विज्ञान की कसौटी पर खरे उतरते है उनके अन्दर केवल चार तत्व की मीमांसा ही की जा सकती है। बाकी का एक तत्व जो गुरु के रूप मे है वह विज्ञान न तो कभी प्रकट कर पाया है और न ही कभी अपनी धारणा से प्रकट कर सकता है। शरीर विज्ञान को ही ले लीजिये,सिर से लेकर पैर तक सभी अंगो का विश्लेषण कर सकता है,हड्डी से लेकर मांस मज्जा खून वसा धडकन की नाप आदि सभी को प्रकट कर सकता है कृत्रिम अंग बनाकर एक बार शरीर के अंग को संचालित कर सकता है। फ़ाइवर ब्लड को बनाकर कुछ समय के लिये खून की मात्रा को बढा सकता है लेकिन जो सबसे मुख्य बात है वह है प्राण वायु यानी गुरु की वह पैदा नही कर सकता है जब प्राण वायु को शरीर से जाना होता है तो वह चली जाती है और शरीर मृत होकर पडा रह जाता है उसके बाद शरीर वैज्ञानिक केवल पोस्ट्मार्टम रिपोर्ट को ही पेश कर सकता है कि ह्रदय रुक गया मस्तिष्क ने काम करना बन्द कर दिया अमुक चीज की कमी रह गयी और अमुक कारण नही बन पाया। नही समझ पाये आज तक कि गुरु क्या है लेकिन ज्योतिष शास्त्र मे सर्वप्रथम गुरु का विवेचन समझना पडता है गुरु जिस स्थान से शुरु होता है अपने अन्तिम समय तक केवल काल की अवधि तक ही सीमित रहता है उसे कोई पकड नही पाया अपने अनुसार पैदा नही कर पाया और न ही विज्ञान के अन्दर इतनी दम है कि वह भौतिक रूप से गुरु को प्रदर्शित कर सके। जिस दिन यह गुरु भौतिकता मे समझ मे आने लगेगा उस दिन विज्ञान की परिभाषा पराविज्ञान के रूप मे जानी जायेगी।

नवग्रह की भाषा मे जीव जो गुरु के रूप मे है वह जिस माहौल मे जाता है उसी माहौल के प्रकार का बन जाता है। ईमान्दारी की जलवायु मे रहने पर वह ईमानदार रहता है और बेईमान के साथ रहने पर वह बेईमान बन जायेगा। लेकिन गुरु को जो कारक स्वभाव को बदलने के लिये प्रेरित करते है वह गुरु के अलावा है,जैसे शनि चालाकी भरता है और गुरु को आलसी बना देता है,चालाकी और आलसी के आगे भूख तो खत्म नही हो जायेगी,गुरु को जब भूख लगेगी तो वह चालाकी करेगा अपने लिये भोजन और अपने निवास की जरूरत को समझेगा,इस बीच मे जो लोग चालाकी और ईमानदारी को समझते है वह शनि के असर के कारक गुरुको दोष देने लगेंगे और कहेंगे कि अमुक व्यक्ति चोर है वह आलसी है वह हमेशा दूसरो के साथ अपघात करता है,लेकिन यह बात हमेशा के लिये नही होती है जैसे ही गुरु अपने स्थान को समय के साथ बदलता है वही चोर आदमी ईमादार से भी बढ कर काम करने लगता है,और जो ईमानदारी का पाठ पढाने वाले होते है वह शनि की चपेट मे आकर बेईमानी करने लगते है। समय के फ़ेर मे एक मनुष्य जो जज की कुर्सी पर बैठ कर अपराधी को दंड देता है और जब समय घूमता है तो वही जज एक अपराधी की तरह से प्रकृति का दंड स्वीकार भी करता है और सजा को भी भुगतता है भले ही उसके कारक बदल गये हों।

कर्म की परिभाषा

कर्म तीन प्रकार के होते है एक संचित कर्म जो वर्तमान तक किया गया है,दूसरा प्रारब्ध कर्म यानी जो हम पहले का किया भोग रहे है साथ ही जो अभी चल रहा है वह क्रियमाण कर्म कहलता है इसका किया हम आगे जाकर भोगेंगे.कर्म की रूप रेखा सांसों पर निर्भर है जैसे सांस का आना संचित कर्म सांस का शरीर मे रुकना क्रियमाण कर्म और सांस का जाना प्रारब्ध कर्म की सीमा मे आजायेगा,अगर संचित सही है और क्रियमाण सही रहा है तो प्रारब्ध भी सही होगा और संचित गलत है और क्रियमाण भी गलत है तो जरूरी नही है कि शरीर मे सांस का आना हो। कर्म की बाहरी रूप रेखा मे तीन प्रकार माने जाते है सत रज और तम इन तीनो कर्मो का प्रभाव द्रश्य संसार मे दिखाई देता है और जो दिखाई देता है वह भौतिक कहलाता है,जो नही दिखाई देता है वह आध्यात्मिक कहलाता है। शरीर जब से शुरु हुआ है और जब तक रहेगा तब तक यह कर्म द्रश्य रूप से सामने रहेंगे और इन्ही कर्मो पर ज्योतिष की नींव टिकी हुयी है। कर्म के लिये कब सोचा जायेगा सोचा जब जायेगा जब जरूरत होगी फ़िर कर्म का वास्तविक रूप सामने लाया जायेगा इस प्रकार के भौतिकता का समावेश शुरु हो जायेगा जैसे ही कर्म सामने आता है वह कर्म के रूप मे प्रतिभाषित किया जाता है। जो मर्यादा से बिना किसी को दुख दिये कर्म पूरा हो जाता है उसे सात्विक कर्म कहते है और इसे शुरु करने से लेकर आखिरी तक समय की गति से पूरा किया जाता है,जो कर्म किसी उद्देश्य विशेष से किया जाता है किसी के प्रति चिन्ता नही की जाती है कोई मरे या जिये कोई लेना देना नही होता है कर्म के साथ क्रोध की भावना बदला लेने की भावना एक दूसरे की प्रतिस्पर्धा मे किया जाने वाला काम रज के रूप मे माना जाता है राजनीति करना और शत्रुता को निपटाने के लिये भोजन को प्राप्त करने के लिये नौकरी आदि करना व्यापार करने के समय किसी का भला बुरा नही सोचना और धन की बढोत्तरी के लिये कर्म को किये जाना रज कर्म की श्रेणी मे आता है,इसी प्रकार से कभी कभी वह काम किये जाते है जो देखने मे कुछ होते है और सामने उनका रूप कुछ और ही होता बिना किसी उद्देश्य के कर्म किये जाते उन कर्मो से हानि भी हो सकती है लाभ भी हो सकता है यानी बिना कर्म की निश्चित माप को प्राप्त किये जाते है वह कर्म तम की श्रेणी मे आते है और उन कर्मो को करने के लिये कोई कोई अपना पूरा जीवन निकाल देता है कोई उस कर्म को क्षण मात्र मे कर लेता है कई बार कई पीढिया इस प्रकार के कर्म को करने के लिये अपनी आहुति दे देती है लेकिन कर्म फ़िर भी पूरा नही हो पाता है।

कर्म के लिये साधन शरीर को बनाया गया है

शरीर के तीन भाग होते है एक स्थूल शरीर होता है एक स्थूल शरीर दूसरा सूक्ष्म शरीर तीसरा कारण शरीर,स्थूल जो सामने दिखाई देता है कर्म करता है बात करता है लोगो के लिये कहे सुने अनुसार उसका जबाब देता है और सुन कर निर्णय वाली बात भी करता है समय आने पर यह स्थूल शरीर नष्ट हो जाता है और सूक्ष्म शरीर लोगो के आसपास रह जाता है लोग महसूस करते है लेकिन देख नही पाते है सूक्ष्म की गति समाप्त होते ही कारण शरीर का रह जाना माना जाता है जैसे ही स्थूल और सूक्ष्म का विनास हो गया कारण शरीर रह जाता है,स्थूल शरीर का आत्मा से सम्बन्ध रहता है आत्मा के जाते ही स्थूल शरीर का विनास हो जाता है,शरीर के विनास होने के बाद आत्मा दूसरे शरीर मे प्रवेश कर जाती है और शरीर तथा किये गये कर्मो का सम्बन्ध आत्मा से नही रहता है।जन्म के लेने से अन्तिम गति को प्राप्त करने तक आत्मा की सात श्रेणियों की यात्रा को पूरा करना माना जाता है जैसे ही आत्मा सातो श्रेणियों को पूरा कर लेती है वह मोक्ष को प्राप्त कर लेती है यह श्रेणी ही कुंडलिनी जागरण के लिये मानी जाती है.

सात ग्रह और दो छाया ग्रह मानव व्यक्तित्व को प्रभावित करते है

मानव के दो व्यक्तित्व होते है एक बाह्य व्यक्तित्व और दूसरा आन्तरिक व्यक्तित्व,सूर्य चन्द्र मंगल बुध गुरु शुक्र शनि साथ ग्रह बाह्य रूप से मानव शरीर को प्रभावित करते है और राहु केतु दो छाया ग्रह आन्तरिक रूप से मानव के व्यक्तितो को प्रभावित करते है। सूर्य और चन्द्रमा का प्रत्यक्ष प्रभाव देखा जाता है सूर्य से गर्मी मिलती है प्रकाश भी मिलता है सूर्य के अनुसार ही ऋतुयें आती जाती है चन्द्रमा के द्वारा शरीर का पानी और धरातल का जलीय क्षेत्र प्रभावित होता है,यह बात समुद्र मे आने वाले ज्वार भाटा से सिद्ध हो चुकी है। जिस प्रकार की ग्रह रश्मियों के प्रभाव मे जातक का जन्म होता है उसी प्रकार का प्रभाव जातक के जीवन मे बना रहता है,कम प्रभाव होने पर कम जीवन और अधिक प्रभाव होने पर अधिक जीवन का मिलना होता है जो भी होता है वह कर्मो को पूरा करने के लिये होता है। सूर्य के अन्दर ही सभी रश्मिया है लेकिन उन्हे अपने पास रखने के लिये और उनका प्रयोग करने के लिये अलग अलग ग्रह अपना अपना आस्तित्व रखते है जैसे मन की क्रिया सोचने की क्रिया भावना को व्यक्ति करने की क्रिया पानी को स्थिर और उछालने वाली क्रिया को चन्द्रमा पूरा करता है सूर्य की गर्मी को सोने और समय पर उसे प्रस्तुत करने के लिये मंगल का रूप बना है सूर्य से जो भी रश्मिया आती है जाती है उन्हे कन्ट्रोल करने के लिये बुध अपना प्रभाव देता है किसे कम देना है किसे अधिक देना है का काम बुध करता है गुरु जीवन वायु को प्रदान करता है शुक्र जीवन की शक्ति को प्रदान करता है शनि कर्म और विकर्म करवा कर शरीर का विनाश करने के लिये अपनी गति को सूर्य से प्राप्त करता है। राहु केतु आकस्मिक कारण पैदा करते है और शंका आदि के लाने पर शंका की पूर्ति के लिये शरीर को साधन आदि देत

सूर्य

सूर्य को जगत पिता कहा गया है इसी की शक्ति से समस्त ग्रह चलायमान है यह आत्म कारक एवं पिता का कारक है पुत्र राज्य सम्मान पद भाई शक्ति दायी आंख चिकित्सा पितरो की आत्मा भगवान भोले नाथ और राजनीति का कारक ग्रह है.

चन्द्र

यह माता पार्वती की तरह से जगत को पालने वाला है जो समस्त संसार का पालन पोषण करती है,बहन जल भोजन सामग्री औषिधि वनस्पति समुद्र मस्तिष्क कला स्त्री मित्र तालाब सिंचाई कानून एवं दया का कारक ग्रह है,शादी के पूर्व कन्या का प्रतिनिधि है लेकिन शादी के बाद विवाहित महिला की कुंडली चन्द्रमा का रूप सास के रूप मे बन जाता है चन्द्रमा अगर धोखा देने वाले ग्रहो के बीच मे फ़ंसा होता है तो आजीवन धोखे ही मिला करता है विदेश यात्रा आदि के कारक के रूप मे भी देखा जाता है।

मंगल

भूमि के पुत्र के रूप मे मंगल की कल्पना की जाती है,यह स्त्री चक्र मे पति का भी कारक होता हिअ और पत्थर कठोर वस्तु अग्नि गुस्सा पुलिस अस्पताल इंजीनियर तकनीकी काम भोजन पकाने के काम शत्रु और ह्रदय को भी मंगल ही सम्भालता है स्त्री चक्र मे मंगल कमजोर होने पर वह उसे दिशाहीन बना देता है। पुरुष कुंडली मे यह भाई का रूप भी प्रदान करता है।

बुध

सूर्य के साथ चलने वाला और जिस ग्रह के साथ हो उस के अनुसार ही अपनी कारकत्व की शक्ति को बताने वाला खरीदने बेचने वाली भूमि का भी कारक बनता है बुद्धि का कारक भी है और कमन्यूकेशन के जितने भी काम होते है सभी के अन्दर बुध का प्रभाव अधिक होता है,इसकी प्रबलता मे व्यक्ति अपने ही कानून बनाकर अपने ही कानून पर चलने वाला और अपने ही कानून के अन्दर खुद को समाप्त करने वाला बनता है। बुध का रूप नाजुक माना जाता है यह फ़ूल के रूप मे कोमलता और बहिन बुआ बेटी के रूप मे सम्पर्क बढाने वाला माना गया है.

गुरु

गुरु को जीव भी कहा गया है ब्रह्मा की उपाधि भी दी गयी है इसके बिना संसार की चाल ही समाप्त हो जाती है यह सम्बन्ध बनाने के लिये भी जीवन मे जीने के लिये रास्ते भी देने के लिये माना जाता है यह धन से रिस्ता जोडने पर बैंक की उपाधि देता है स्त्री को पुरुष से और पुरुष को स्त्री से सम्बन्ध बनाने के लिये अपनी योग्यता को प्रदान करता है उच्च का गुरु संस्कारी बनाता है और मर्यादा से चलने के लिये अपनी युति को प्रदान करता है जबकि नीच का होकर मनमानी करने के लिये और अपनी ही चलाकर भोग और धन के प्रति आकर्षित होने के लिये बाध्य करता है। गुरु के अनुसार ही जीव की प्रकृति को देखा जाता है यह राशि और भाव के अनुसार ही अपनी युति को प्रदान करता है।

शुक्र

जीवन मे जो भी भौतिक सुख है का कारक शुक्र ही है गुरु जहां आध्यात्मिक और मर्यादा का पोषण करता है वही शुक्र केवल भौतिकता को देखकर ही अपनी युति को प्रदान करता है। लेकिन बिना चन्द्रमा के शुक्र की औकात नही होती है। वैसे यह पत्थर को मनमोहक बना सकता है तो कुरूप को भी सुन्दर बनाने की योग्यता को रखता है कंगाल को राजा बनाने और राजा को कंगाल बनाने की क्षमता को रखता है। राहु के साथ मिलकर इसका रूप वृहद बन जाता है और एक प्रकार का नशा इस प्रकार से जीव के अन्दर भरता है कि जीव उस नशे से आजन्म दूर नही हो पाता है। भवन सवारी पत्नी बहिन तंत्र मंत्र आदि के साथ साथ एक्टिंग और प्रहसन की कला में प्रवीण बनाने का काम भी इसी का है।

शनि

जहां सूर्य की सीमा समाप्त हो जाती है वहीं पर शनि की सीमा समाप्त होती है अक्सर जो लोग सुबह और शाम के समय मे पैदा होते है वह सूर्य और शनि की मिश्रित सीमा मे बन्धे होते है या तो वह इतना काम करते है कि उनके बराबार कोई काम नही कर सकता है या वह इतने फ़्री रहते है कि उन्हे कोई काम ही समझ मे नही आता है। अक्सर इस युति मे पैदा होने वाले जातक अपने पिता और अपने पुत्रो के साथ कभी भी सामान्य नही रह सकते है और उनके विचारो मे हमेशा ही कोई न कोई अलगाव रहता है।

राहु

यह छाया ग्रह है जिस ग्रह के साथ होता है उसी ग्रह का असर अपने मे प्राप्त करना इसका काम होता है जीवन मे जब भी यह जीवन के कारक ग्रहों पर अपना गोचर करता है उसी समय मे यह जीवन के उस क्षेत्र के प्रति अपने प्रभाव को प्रसारित करता है। पितामह की जीवनी राहु से ही देखी जाती है जीवन मे आने वाली समस्याये और उनसे मुक्ति का कारण राहु के द्वारा ही प्राप्त होता है।

केतु

यह भी छाया ग्रह है और राहु से हमेशा एक सौ अस्सी डिग्री पर अपना आस्तित्व बनाकर रखता है जहां राहु खराब करता है तो केतु उसे अच्छा करता है जहां राहु अच्छा करता है वहां केतु खराब करता है,जैसे शरीर मे गर्दन के ऊपर का हिस्सा राहु के कब्जे मे है तो शरीर केतु का है राहु अगर भोजन को करने के लिये कारक को समाप्त करता है तो केतु उस कारक के अनुसार शरीर की पालना करता है।

सूर्य चन्द्रमा मंगल बुध गुरु शुक्र शनि राहु केतु यह सभी आपस मे सम्बन्ध रखते है इन सम्बन्धो को बनाने वाला भी त्रिक सिद्धान्त ही काम करता है। यह सिद्धान्त भी कर्म के सत रज और तम सिद्धान्त पर ही काम करता है। यथा ब्रह्माण्डे तथा पिण्डे की कहावत के अनुसार जो भी ब्रह्माण्ड मे घटित हो रहा है वह ही शरीर के अन्दर भी घटित हो रहा है लेकिन वही रश्मिया अपना काम कर रही ह जो जन्म के समय मे कार्य करती थी,रसायन शास्त्र के नियम के अनुसार जितना पानी मे नमक मिलाते जाओगे उतना वह नमकीन होता जायेगा लेकिन एक सीमा पर जाकर पानी नमक को घोलना बन्द कर देगा। उसी प्रकार से हर ग्रह अपनी अपनी सीमा के अनुसार जितनी रश्मिया शरीर के अन्दर कार्य करने के लिये अपना बल् दे रही उतना ही असर कर पायेगा यह नही है कि रश्मिया कम है और ग्रह अपना अधिक बल दे दे,जब ग्रह अपना बल देने के लिये आगे आयेगा तो उस बल को रोकने के लिये भी कई कारक जो ग्रहों के रूप मे है सामने आने लगेंगे अगर ग्रह अच्छा रूप दे रहा है और कार्य को गति प्रदान करने के लिये अपनी शक्ति को दे रहा है तो खराब ग्रहो का कार्य उस गति को कम करने के लिये अपनी अपनी शक्ति का प्रयोग करने लगेंगे,उसी प्रकार से जब ग्रह अपनी बुरी गति को प्रदान करने के लिये अपना असर शुरु करेग उस समय भी जो भी कुंडली मे अच्छे ग्रह है (Good stars in favor) अपना काम शुरु कर देंगे,इस प्रकार से ग्रह के द्वारा दी जाने वाली दिक्कत कम हो जायेगी। विरले समय मे ही ऐसा होता है कि कोई ग्रह किसी ग्रह को सहारा नही दे सके और जो घटना घटित होनी है वह पूरी शक्ति से घटित हो जाये। आइये देखते है कि कौन सा ग्रह किस ग्रह से क्या सम्बन्ध रखता है।

सूर्य का अन्य ग्रहो से सम्बन्ध

सूर्य जगत का राजा है अपने समय पर उदय होता है और अपने समय पर ही अस्त हो जाता है। जातक के लिये बलशाली होने पर उसे राज्य का बल देता है लोगो को हुकुम पर चलाने की औकात रखता है। शरीर मे हड्डियों का निर्माण करता है और बलशाली बनाता है शरीर के अन्दर एक अद्भुत चमक को देता है साथ ही एक प्रकार की अहम की मात्रा को देता है जिस मात्रा से जो भी काम हाथ मे लिया जाता है उसे पूरा किया जाता है। चन्द्रमा के साथ सम्बन्ध होने पर देखने के बाद सोचने के लिये शक्ति देता है मंगल के साथ मिलने पर शौर्य और पराक्रम की वृद्धि करता है,बुध के साथ मिलकर अपने शौर्य और गाथा को दूरस्थ प्रसारित करता है अपनी वाणी और चरित्र को तेजपूर्ण रूप मे प्रस्तुत करता है,शाही आदेश को प्रसारित करता है,गुरु के साथ मिलकर सभी धर्म और न्याय तथा लोगो के आपसी सम्बन्धो को बनाता है,लोगो के अन्दर धन और वैभव की कमी को पूरा करता है,शुक्र के साथ मिलकर राजशी ठाठ बाट और शान शौकत को दिखाता है भव्य कलाकारी से युक्त राजमहल और लोगो के लिये वैभव को इकट्ठा करता है शनि के साथ मिलकर गरीबो और कामगर लोगो के लिये राहत का काम देता है जिनके पास काम नही है जो भटकते हुये लोग है उन्हे आश्रय देता है पिता के रूप मे पुत्र को सहारा देता है राहु के साथ मिलकर चक्रवर्ती बनने के कारण पैदा करता है और केतु के साथ मिलकर अपनी आस्था विश्वास और न्याय को प्रसारित करने के लिये साधनो को नियुक्त करता है जो कार्य खुद नही कर सकता है वह केतु के द्वारा अपनी आज्ञा से करवाता है.यह सब तभी होता है जब सभी ग्रह अपनी अपनी शक्ति से सूर्य को अच्छा बल दे रहे होते है लेकिन कुंडली मे अगर सूर्य खराब भाव मे है तो वह खराब रूप ही प्रस्तुत करेगा,सूर्य के बारे मे पूरी जानकारी नही दी जा रही है उसका कारण है कि लोग मेरे द्वारा लिखे गये लेखो को अपने नाम से प्रकाशित करते है और लोगो को गुमराह करते है

चन्द्रमा का अन्य ग्रहो से सम्बन्ध

जितने भी कार्य सोचने के है वह चन्द्रमा के द्वारा ही होते है अगर चन्द्रमा का रूप सही है तो जीवन मे सोचने की क्रिया सही होगी अगर चन्द्रमा का स्थान गंदा है तो सोचने का काम भी गंदा ही होगा और जैसे जैसे चन्द्रमा गोचर से अन्य ग्रहों के साथ जायेगा या भाव के अनुसार अपनी गोचर से क्रिया को पूर्ण करेगा उन भावो के बारे मे भी अपनी सोच को गंदा करता जायेगा। राहु के साथ चन्द्रमा के आते ही कई प्रकार के भ्रम आजाते है और उन भ्रमो से बाहर निकलना ही नही हो पाता है उसी प्रकार से केतु के साथ आते ही मोक्ष का रास्ता खुल जाता है,और जो भी भावना है वह खाली ही दिखाई देती है मन एक साथ नकारात्मक हो जाता है

सूर्य के साथ जाते ही चन्द्रमा के अन्दर सूखापन आजाता है और जैसे रेगिस्तान मे धूप के अन्दर मारीचिका दिखाई देती है वैसी ही चन्द्रमा की सोच हो जाती है,मंगल के साथ जाते ही गर्म भाप का रूप चन्द्रमा ले लेता है और मानसिक सोच या जो भी गति होती है वह गर्म स्वभाव की हो जाती है बुध के साथ चन्द्रमा की युति अक्समात मजाकिया हो जाती है और कभी कभी मजाक मे जाललेवा भी हो जाती है गुरु के साथ चन्द्रमा अपने मे यही सोचता रहता है कि उससे अधिक कोई जानकार नही है साथ ही बार बार रिस्ते बनाने और बिगाडने मे चन्द्रमा के साथ गुरु का ही हाथ होता है मानसिक रूप से कभी तो वह जिन्दा करने की बात करने लगता है और कभी कभी बिलकुल ही समाप्त करने की बात करने लगता है। चन्द्रमा के बारे मे पूरी जानकारी नही दी जा रही है उसका कारण है कि लोग मेरे द्वारा लिखे गये लेखो को अपने नाम से प्रकाशित करते है और लोगो को गुमराह करते है 

मंगल का अन्य ग्रहो से सम्बन्ध

इस ब्रह्माण्ड मे जितने भी द्रश्य और अद्रश्य कारक है सभी मे मंगल की गर्मी स्थित है,जो वस्तु गर्मी को नही रख सकता है वह मंगल की श्रेणी से बाहर हो जाता है,एक पत्थर के अन्दर भी गर्मी है धरती के अन्दर तो इतनी गर्मी है कि जमीन के जितने नीचे जाते जाओगे गर्मी की मात्रा बढती जायेगी और ऐसी स्थिति भी आजयेगी जहां मिट्टी लावा के रूप मे पिघल कर बह रही होगी। जिसके अन्दर जितनी गर्मी होती है उतना ही वह शक्तिशाली माना जाता है। लेकिन इतनी अधिक गर्मी भी नही होनी चाहिये कि वह आग का गोला बनकर जलाने लगे और खुद जल जाये। सूर्य के साथ मिलकर मंगल खुद को उत्तेजित कर लेता है और जितना अहम बढता जायेगा उतना वह अच्छा भी काम कर सकता है और खतरनाक भी काम कर सकता है अगर मंगल फ़्री हो जाता है तो तानाशाही का कायम होना निश्चित है,मंगल के साथ चन्द्रमा मिलता है तो वह अपनी सोच को क्रूर रूप से पैदा कर लेता है उसकी सोच मे केवल गर्म पानी जैसी बौछार ही निकलती है बुध के साथ मिलकर फ़ूल को कुम्हलाने की हिम्मत रखता है बात को इतने खरे लहजे मे कहता है कि जो नाजुक लोग होते है वह बात करने मे भी डरने लगते है। लेकिन इस युति एक बार अच्छी मानी जाती है कि व्यक्ति के अन्दर बात करने की तकनीक आजाती है वह कम्पयूटर जैसे सोफ़्टवेयर की तकनीक को बना सकता है मंग्ल के साथ गुरु के मिलने से जानकारी के अलावा भी प्रस्तुत करने की कला आजाती है और यह जीवन के लिये कष्टदायी भी हो जाती है। जितनी जानकारी होती है उससे अधिक करने से भी एक प्रकार से नई समस्या पैदा हो जाती है और उसे सम्भालना नही हो पाता है। मंगल के साथ शुक्र के मिलने से कलात्मक कारणो मे तो तकनीक का विकास होने लगता है लेकिन शरीर के अन्दर यह युति अधिक कामुकता को पैदा कर देती है और शरीर के विनास के लिये दिक्कत का कारण बन जाता है शुगर जैसी बीमारिया लग जाती है,शनि के साथ मिलने से यह गर्म मिट्टी जैसे काम करवाने की युति देता है तकनीकी कामो मे सुरक्षा के कामो मे मन लगाता है,कत्थई रंग के कारण बनाने मे यानी सूखे हुये रक्त जैसे कारण पैदा करना इसकी शिफ़्त बन जाती है। राहु के साथ मंगल की युति होने से या तो बिजली तेल पेट्रोल आदि के कामो मे बरक्कत होने लगती है या राजपूती शान से खुद को शहीद करने मे भी वक्त नही लगता है,केतु के साथ मिलने से शरीर को पतला बनाने और केवल तकनीकी रूप से दूसरो के लिये काम करने के अलावा और कोई कारण नही बन पाता है

बुध के साथ अन्य ग्रहो का सम्बन्ध

बुध एक नाजुक ग्रह है यह मैने पहले ही बता दिया है इस ग्रह का रूप गोल होता है और भाषाई ग्यान के लिये यह अच्छा माना जाता है लेकिन बुध की एक आदत यह भी होती है कि व्यक्ति को खुद के ऊपर विश्वास नही होता है केवल बातो के अलावा और कोई भान नही होता है खुद को नचाने गाने भावो को प्रस्तुत करने की कला ही आती है अंग्रेजी आदि भाषाओ के जानकार लोगो को आप देख सकते है वह अपने बोलने के समय मे जो हाव भाव प्रस्तुत करते है वह बुध का ही एक रूप समझ मे आता है यानी बोलने के समय मे एक्टिंग करना,बुध के साथ सूर्य के मिलने से व्यक्ति की सोच राजदरबार मे राजदूत जैसी होती है वह कमजोर होने पर चपरासी जैसे काम करता है और वह अगर केतु के साथ सम्बन्ध रखता है तो रिसेपसन पर काम कर सकता है टेलीफ़ोन की आपरेटरी कर सकता है या ब्रोकर के पास बैठ कर केवल कहे हुये काम को कर सकता है इसकी युति के कारक ही काल सेंटर आदि माने जाते है,बुध के साथ चन्द्रमा के होने से लोगो का बागवानी की तरफ़ अधिक मन लगता है कलात्मक कारणो मे अपनी प्रकृति को मिक्स करने का काम होता है मंगल के साथ मिलकर जब भी कोई काम होता है तो तकनीकी रूप से होता है प्लास्टिक के अन्दर बिजली का काम बुध के अन्दर मंगल की उपस्थिति से ही है डाक्टरी औजारो मे जहां भी प्लास्टिक रबड का प्रयोग होता है वह बुध और मंगल की युति से माना जाता है बुध के साथ गुरु का योग होने से लोग पाठ पूजा व्याख्यान भाषण आदि देने की कला मे प्रवीण हो जाते है लोगो को बोलने और मीडिया आदि की बाते करना अच्छा लगता है,बुध के साथ शुक्र के मिलने से यह अपने को कलात्मक रूप मे आने के साथ साथ सजावटी रूप मे भी सामने करता है बाग बगीचे की सजावट मे और फ़ूलो आदि के गहने आदि बनाने प्लास्टिक के सजीले आइटम बनाने के लिये भी इसी प्रकार की युति काम करती है बुध के साथ शनि के मिलने से भी जातक के काम जमीनी होते है या तो वह जमीन को नापने जोखने का काम करने लगता है या भूमि आदि को नाप कर प्लाट आदि बनाकर बेचने का काम करता है इसके साथ ही बोलने चालने मे एक प्रकार की संजीदगी को देखा जा सक्ता है,इस प्रकार के जातक की दोस्ती पुराने और बुजुर्ग लोगो से अधिक होती है,एक प्रकार संतान के मामले मे यह लोग असमर्थ ही होते है। बुध के साथ राहु की युति होने से भी जातक के अन्दर अनाप सनाप बोलने के लिये झूठ का अधिक सहारा लेने के लिये जो जानकारी है उससे भी अधिक बखान करने के लिये देखा जाता है,बुध के साथ केतु की युति होने से जातक के लिये कोई न कोई कारण या तो दत्तक पुत्र जैसा बनता है या किसी प्रकार से दत्तक सन्तान जैसा व्यवहार जातक के साथ होता है

गुरु के साथ अन्य ग्रहों का सम्बन्ध

Jupiter यानी गुरु का रूप जीव के रूप मे जाना जाता है गुरु केवल वायु रूप है और वह सांस के अन्दर अपना निवास करता है,जल थल या नभ सभी स्थानो के जीवो मे गुरु अपनी ही मान्यता रखता है जब तक गुरु की सीमा है जीव का आस्तित्व है जैसे ही गुरु की सीमा समाप्त हो जाती है जीव का आस्तित्व समाप्त हो जाता है। गुरु के साथ सूर्य के मिलने से जीव और आत्मा का संगम हो जाता है गुरु जीव है सूर्य आत्मा है जिस जातक की कुंडली मे जिस भाव मे यह दोनो स्थापित होते है वह भाव जीवात्मा के रूप मे माना जाता है। गुरु का साथ चन्द्रमा के साथ होने से जातक मे माता के भाव जाग्रत रहते है,जातक के माता पिता का साथ रहता है जातक अपने ग्यान को जनता मे बांटना चाहता है। गुरु के साथ मंगल के मिलने कानून मे पुलिस का साथ हो जाता है धर्म मे पूजा पाठ और इसी प्रकार की क्रियाये शामिल हो जाती है,विदेश वास मे भोजन और इसी प्रकार के कारण जुड जाते है,गुरु के साथ बुध होने से जातक के अन्दर वाचालता आजाती है वह धर्म और न्याय के पद पर आसीन हो जाता है उसके अन्दर भावानुसार कानूनी ग्यान भी हो जाता है। शुक्र के साथ मिलकर गुरु की औकात आध्यात्मिकता से भौतिकता की ओर होना माना जाता है वह कानून तो जानता है लेकिन कानून को भौतिकता मे देखना चाहता है वह धर्म को तो मानता है लेकिन भौतिक रूप मे सजावट आदि के द्वारा अपने इष्ट को देखना चाहता है गुरु के साथ शनि के मिलने से जातक के अन्दर एक प्रकार से ठंडी वायु का संचरण शुरु हो जाता है जातक धर्मी हो जाता है कार्य करता है लेकिन कार्य फ़ल के लिये अपनी तरफ़ से जिज्ञासा को जाहिर नही कर पाता है जिसे जो भी कुछ दे देता है वापस नही ले पाता है कारण उसे दुख और दर्द की अधिक मीमांसा करने की आदत होती है। गुरु राहु का साथ होने से जातक धर्म और इसी प्रकार के कारणो मे न्याय आदि के लिये अपनी शेखी बघारने के अलावा और उसे कुछ नही आता है कानून तो जानता है लेकिन कानून के अन्दर झूठ और फ़रेब का सहारा लेने की उसकी आदत होती है वह धर्म को मानता है लेकिन अन्दर से पाखंड बिखेरने का काम भी उसका होता है। केतु के साथ मिलकर वह धर्माधिकारी के रूप मे काम करता है कानून को जानने के बाद वह कानूनी अधिकारी बन जाता है अन्य ग्रह की युति मे जैसे मंगल अगर युति दे रहा है तो जातक कानून के साथ मे दंड देने का अधिकारी भी बन जाता है 

शुक्र के साथ अन्य ग्रहों का सम्बन्ध

शुक्र भौतिकता का रूप है धन सम्पत्ति और भवन मकान की भव्यता को प्रदर्शित करता है सजावट करना इसका काम है और जिसे भी यह अपने बल को देता है उस पर आजीवन लक्ष्मी बरसती है साथ ही पुरुष है तो भली स्त्री उसे मिल जाती है और स्त्री है तो उसे सजावटी सामान का मिलना पाया जाता है सूर्य के साथ मिलकर भौतिक सुखो का राज्य सेवा मे या पिता की तरफ़ से या पुत्र की तरफ़ से देने वाला होता है चन्द्रमा के साथ मिलकर भावना से भरा हुआ एक प्रकार का बहकता हुआ जीव बन जाता है जिसे भावना को व्यकत करने के लिये एक अनौखी अदा का मिलना माना जाता है मंगल के साथ मिलकर एक झगडालू औरत के रूप मे सामने आता है बुध के साथ मिलकर अपनी ही कानूनी कार्यवाही करने का मालिक बन जाता है गुरु के साथ मिलकर एक आध्यात्मिक व्यक्ति को भौतिकता की ओर ले जाने वाला बनता है शनि के साथ मिलने पर यह दुनिया की सभी वस्तुओ को देता है लेकिन मन के अन्दर शान्ति नही देता है,राहु के साथ मिलकर प्रेम का पुजारी बन जाता है केतु के साथ मिलकर भौतिक सुखो से दूरिया देता है।

शनि के साथ ग्रहों का आपसी सम्बन्ध

शनि कर्म का कारक ग्रह है शनि जितनी कठिनाई देता है व्यक्ति के अन्दर उतनी ही ताकत बढती है अगर व्यक्ति शनि के कारण पैदा दुखो को झेलने मे असमर्थ रहता है तो शनि की छाया कभी भी जातक के लिये दुख दायी हो जाती है। शनि सूर्य की युति मे जातक का पिता और पुत्र से आपसी विचार नही मिल पाते है शनि अपने क्षेत्र का राजा है और सूर्य अपने क्षेत्र का राजा है लेकिन सूर्य और शनि के आपसी मिलन का एक ही समय होता है वह सुबह का होता है या शाम का इसलिये अक्सर सूर्य शनि की युति वाले जातक के पास काम केवल सुबह शाम के ही होते है,वह पूरे दिन या पूरी रात कान नही कर सकता है इसलिये इस प्रकार के व्यक्ति के पास साधनो की कमी धन की कमी आदि मुख्य रूप से मानी जाती है,शनि चन्द्र की युति मे मन का भटकाव रुक जाता है मन रूपी चन्द्रमा जो पानी जैसा है शनि की ठंडक और अन्धेरी शक्ति से फ़्रीज होकर रह जाता है शनि चन्द्र की युति वाला जातक कभी भी अपने अनुसार काम नही कर पाता है उसे हमेशा दूसरो का ही सहारा लेना पडता है। शनि मंगल की युति मे काम या तो खूनी हो जाते है या मिट्टी को पकाने जैसे माने जाते है शनि अगर लोहा है तो मंगल उसे गर्म करने वाले काम माने जाते है। इसी प्रकार से शनि के साथ बुध के मिलने से जमीन की नाप तौल या जमीन के अन्दर पैदा होने वाली फ़सले या वनस्पतियों के कार्य का रूप मान लिया जाता है,शनु गुरु की युति मे एक नीच जाति का व्यक्ति भी अपनी ध्यान समाधि की अवस्था योगी का रूप धारण कर लेता है शनि शुक्र की युति मे काला आदमी भी एक खूबसूरत औरत का पति बन जाता है एक मजदूर भी एक शहंशाही औकात का आदमी बन जाता है,शनि राहु की युति मे जो भी काम होते है वह दो नम्बर के कामो के रूप मे जाने जाते है अगर शनि राहु की युति त्रिक भाव मे है तो जातक को जेल जाने से कारण जरूर पैदा होते है। शनि केतु की युति मे जातक व्यापार और दुकान आदि के फ़ैलाने के काम करता है वह एक वकील की हैसियत से अपने कामो करता है और फ़ाइल दर फ़ाइल बनाकर केश लिस्ट को तैयार कर लेता है अगर जातक के पास जमीनी काम है तो जातक के लडकियों के रिस्तेदार आकर उस काम को सम्भालने का काम करते है।

राहु के अन्य ग्रहो के साथ सम्बन्ध

Astrology ज्योतिष मे राहु को छाया ग्रह का रूप माना गया है यह बिजली की शक्ति है तो पेट्रोल की ताकत है मन की कलपना का साकार रूप है तो छाते की छाया है किसी भी मकान की छत राहु के रूप मे है यात्रा का रूप भी राहु और गणित की मशीन कम्पयूटर भी राहु के रूप मे है राहु की दूरी नही नापी जा सकती है वह अनन्त है आसमान की ऊंचाई को नही नापा जा सकता है समुद्र की गहरायी को भी नही नापा जा सकता है मन की शक्ति को भी नही नापा जा सकता है और मन की चाल की गणना करना भी दुष्कर काम है। राहु का कोई समय नही है वैसे शास्त्रो मे कहा जाता है कि राहु का समय शाम को है लेकिन मेरे ख्याल से आसमान मे बादल छा जाने के बाद जो शीतलता मिलती है वह राहु की छाया से ही मिलती है,राहु को पहिचानने वाले दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करते चले जाते है यह जिस पर भी मेहरबान हो जाये वह रोड से उठ कर महल मे निवास करने लगता है। राहु के साथ सूर्य आने पर वह आंखो की रोशनी मे मन्दता देता है पिता और पुत्र के बारे मे कोई राय नही दी जा सकती है कि इनका विस्तार कितना होगा कितना नही,सरकार के क्षेत्र मे राहु का होना एक प्रकार से अपने काम को ही मानयता देना होता है राहु हमेशा केतु को छुपाकर रखना चाहता है यह बात साकार रूप से देखी जा सकती है मुस्लिम जाति को राहु से जोड कर देखा जाता है और केतु को क्रिश्चियन की श्रेणी मे लाया जाता है मुस्लिम कभी भी ईशाई समुदाय को खुला नही देख सकता है और न ही किसी प्रकार की ईसाई सभ्यता को अपने समाज मे लाने की अनुमति देता है। राहु दाढी है और राहु ही लम्बे बाल का कारक है राहु के द्वारा ही किसी भी देवता की साकार रूप मे पूजा नही की जाती है आसमान की तरफ़ अपने देवता को पुकारने की कला को राहु ही देता है। यह जिस ग्रह के साथ होता है उसके अन्दर विस्तार करना इसका काम होता है

केतु के साथ अन्य ग्रहो के सम्बन्ध

वास्तविक रूप से देखा जाये तो राहु देता है तब केतु लेता है,बिना राहु के केतु की कोई बिसात नही है,लेकिन जब राहु मारने का काम करता है तो केतु बचाने का काम करता है और जब राहु बचाने का काम करता है तो केतु मारने का काम करता है। केतु का रूप काली के रूप मे भी माना जाता है जो डाक्टर बनकर बचाने का काम करती है वह सडे अंग को काटती तो है लेकिन फ़ायदा के लिये वह किसी को मौत देती है तो फ़ायदा के लिये किसी को जीवन देती है तो किसी न किसी प्रकार से समाज जनता के हित के लिये। सूर्य केतु राजनेता होता है चन्द्र केतु जनता का आदमी होता है मंगल केतु इंजीनियर होता है तो बुध केतु कमन्यूकेशन का काम करने वाला होता है लेकिन खून से सम्बन्ध नही रखता है,इसी लिये कभी कभी दत्तक पुत्र की हैसियत से भी देखा जाता है गुरु केतु को सिद्ध महात्मा भी कहते है और डंडी धारी साधु की उपाधि भी दी जाती है शुक्र केतु को वाहन चालक जैसी उपाधि दी जाती है या वाहन के अन्दर पैसा लेने वाले कंडक्टर की होती है वह कमाना तो खूब जानता है लेकिन उसे गिना चुना ही मिलता है शनि केतु को धागे का काम करने वाले दर्जी की उपाधि दी जाती है या एक कम्पनी की कई शाखायें खोलने वाले चेयरमेन की उपाधि भी दी जाती है अक्सर यह मामला ठेकेदारी मे भी देखा जाता है।

सुदर्शन चक्र और भावो का मिश्रण

कुंडली की तीन लगनो को अधिक महत्व दिया जाता है लगन चन्द्र लगन सूर्य लगन इन तीनो लगनो का मिश्रण ही सुदर्शन चक्र मे वर्णित होता है। अगर लगन मेष राशि की है चन्द्रमा कर्क राशि का है सूर्य मकर राशि का है तो लगन के स्थान पर मेष कर्क और मकर का मिश्रण मिलता है जिसमे जातक के शरीर और पहिचान के लिये मेष जातक के मानसिक कार्य और सोच के लिये कर्क राशि तथा जातक के द्वारा जगत मे जो कर के दिखाया जायेगा वह मकर राशि से वर्णित होगा.इसके अलावा जातक के लिये त्रिकोण जो धन के लिये केन्द्र जो जातक के लिये जीवन में स्थापित होने के लिये देखा जायेगा वह भी सुदर्शन चक्र से देखा जायेगा कि कौन सी स्थिति जातक के लिये ठीक होगी,यानी जातक खुद के बल से या जनता के बल से या पराक्रम के बल से किस बल से अधिक आगे बढ पायेगा आदि बाते सुदर्शन चक्र से मिलती है.

चन्द्र लगन और अन्य लगनो के साथ मिश्रित फ़लादेश करने का तरीका

राशि और ग्रह का मिश्रण भाव और राशि का मिश्रण भाव से भाव का मिश्रण तथा राशि से राशियो से मिश्रण करना उसी प्रकार से है जैसे कई प्रकार के रसायनो को मिलाकर एक नया रसायन प्राप्त करना। मैने पहले ही कहा है कि शरीर मन और द्रश्य क्षेत्र इन तीनो का रूप ही लगन चन्द्र लगन और सूर्य लगन है,शरीर मे रहने वाली सोच और उस सोच को कैसे द्रश्य किया है इस तरह से भी कह सकते है। सुदर्शन चक्र की रूप रेखा के अनुसार उदाहरण इस प्रकार से मिलता है:-
लगन मेष है चन्द्र राशि कर्क है और सूर्य राशि मकर है,इन तीनो राशियों का मिश्रण करने पर इस प्रकार से मिश्रित फ़ल की प्राप्ति होती है.
मेष शरीर मे सिर की कारक है कर्क ह्रदय की कारक है और मकर पीठ की कारक है.
सिर से बनावट का ह्रदय से सोच का और पीठ से किये जाने कर्म यानी जिन्दगी के बोझ को शरीर पर लाद करने चलने जैसा है.
लगन खुद के लिये कर्क माता के लिये और मकर पिता के लिये मानी जाती है.
लगन शरीर बल से कर्क ह्रदय की सोच से और मकर जीवन मे किये जाने वाले कर्म से जुडी हुयी है.
लगन शरीर का पैदा होना कर्क उम्र की पच्चीसवी साल तक की सोच और मकर उम्र की तीसरी सीढी का कारक माना जाता है.
लगन का मालिक मंगल होता है कर्क का मालिक खुद चन्द्रमा है मकर का मालिक शनि है.
मंगल चन्द्र और शनि के मिश्रण फ़लो का रूप भी इन तीनो लगनो के लिये देखा जा सकता है.

जब अधर्म का बोलबाला हो जाता है धर्म का नाश होने लगता है सज्जन पीडा से तडप उठते है दुर्जन अतिचारी हो जाते है तो प्रकृति अपना सन्तुलन बनाने के लिये महापुरुष को पैदा करती है। वह राम के रूप मे हों कृष्ण के रूप में हो या अन्य किसी अवतार के रूप में हों। चार युग कही युग पर्यन्त नही है,चारो युग इसी शरीर मे इसी जीवन मे इसी संसार मे है। पिता खुद और आगे आने वाली पीढी धर्म रूपी सतयुग है,कुटुम्ब ननिहाल और पिता का राज्य द्वापर है,पत्नी परिवार छोटे बडे भाई बहिन आदि सभी त्रेता के युग के रूप मे है,माता और पिता का खानदान अधर्म मृत्यु तथा मोक्ष को प्राप्त करने का युग ही कलयुग है। कुंडली को देखने के बाद पता लगता है कि लगन पंचम और नवम भाव सतयुग की मीमांशा करते है,दूसरा छठा और दसवा भाव द्वापर युग की मीमांसा करते है तीसरा सातवा और ग्यारहवा भाव त्रेता युग की मीमांसा करते है,चौथा आठवा और बारहवा भाव कलयुग की मीमांसा करते है। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म द्वापर युग मे हुया था इसलिये जो भी कार्य व्यवहार समय आदि रहा वह सभी दूसरे भाव छठे भाव और दसवे भाव से सम्बन्धित रहा। शनिदेव का केतु के साथ इन्ही भावो मे होना श्रीकृष्ण भक्ति की तरफ़ जाने का इशारा करता है। देवकी माता के रूप मे और महाराज उग्रसेन पिता के रूप में,दूसरे भाव का शनि केतु माता के बडे भाई के रूप मे और दूसरे भाव का शनि केतु दत्त्क पुत्र की तरह से दूसरी जाति के अन्दर जाकर पालना होना। अष्टम राहु बारहवा राहु चौथा राहु तभी अपना काम राक्षस की तरह से करेगा जब शनि केतु दूसरे छठे या दसवे भाव मे अपना बल दे रहे होंगे। माता यशोदा की गोद चौथे भाव के लिये शनि केतु की मीमांसा करती है,शनि केतु का दूसरा प्रभाव यमुना जी के रूप मे भी मिलता है,शनि जो यम है और केतु जो यम की सहयोगी सूर्य पुत्री के रूप मे जानी जाती है। शनि काम करने वाले लोगो से और केतु को हल के रूप मे भी देखा जाता है शनि का रंग काला है और केतु का रूप बांसुरी से लेते है तो भी भगवान श्रीकृष्ण की छवि उजागर होती है। यही नही शनि मंत्र के उच्चारण के लिये जब शनि बीज मंत्र का रूप देखा जाता है तो “शँ” बीज भगवान श्रीकृष्ण की एक पैर मोड कर बांसुरी को बजाने के रूप मे दिखाई देता है। अगर इस बीज अक्षर को सजा दिया जाये भगवान श्रीकृष्ण का रूप ही प्रदर्शित होगा। आदिकाल से मूर्ति की पूजा नही की जाती थी यह तो ऋग्वेद से भी देखा जा सकता है बीज मंत्रो का बोलबाला था अग्नि वायु जल भूमि और इनके संयुक्त तत्वो को माना जाता था लेकिन इन्ही बीजो को सजाने के बाद जो रूप बना वह मूर्ति के रूप मे स्थापित किया जाने लगा और पत्थर धातु अथवा किसी भी अचल तत्व पर मूर्ति के रूप मे इन्ही बीजो को सजाया जाने लगा भावना से भगवान की उत्पत्ति हुयी और मूर्ति भी बीज अक्षर के रूप मे अपना असर दिखाने लगी।

मथुरा नगर को भगवान श्रीकृष्ण की जन्म स्थली माना जाता है। मथुरा के राजा उग्रसेन को जो श्रीकृष्ण के नाना थे उनके पुत्र कंस ने कैद मे डालकर अपने को बरजोरी राजा बना लिया था और अपने को लगातार बल से पूर्ण करने के लिये जो भी अनैतिक काम होते थे सभी को करने लगा था। प्रजा के ऊपर इतने कर लगा दिये थे कि प्रजा मे त्राहि त्राहि मची हुयी थी। जब कंस अपने बहनोई वासुदेव को और बहिन देवकी को लेकर रथ से जा रहा था तो आकाशवाणी हुयी कि जिस बहिन को तू इतने प्रेम से लेकर जा रहा है उसी के गर्भ से आठवी संतान उसकी मौत के रूप मे पैदा होगी। कंस ने रथ को वापस किया और वसुदेव और देवकी को कारागार मे डाल दिया,तथा उनकी सात सन्तानो को मार दिया था,आठवी संतान के रूप में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ जिस समय जन्म हुआ उस समय जो भी कारागार के दरवाजे प्रहरी आदि कंस ने देवकी और वसुदेव की सुरक्षा के लिये स्थापित किये थे सभी साधन निष्क्रिय हो अये और वसुदेव अपने हाल के जन्मे पुत्र को लेकर उनके मित्र नंद के घर छोड आये और उनकी पुत्री को वापस लाकर देवकी की गोद मे सुला दिया,कंस को जब पता लगा तो उसने उस कन्या को मारने के लिये जैसे ही पत्थर पर पटकना चाहा वह कन्या कंस के हाथ से छूट कर आसमान मे चली गयी और आर्या नाम की शक्ति के रूप में अद्रश्य बादलो की बिजली की तरह से अपना रूप लेकर बोली कि जो तेरी मौत का कारण है वह तो पैदा हो चुका है और बडे आराम से पाला भी जा रहा है,कंस ने इतना सुनकर आसपास के गांवो मे अपने दूत भेज दिये,जब पता लगा कि श्रीकृष्ण नन्द के घर मे यशोदा मैया की गोद मे पल रहे है तो कंस ने अपनी आसुरी शक्तियों को यशोदा के घर पूतना के रूप में बकासुर के रूप में और कितनी ही आसुरी शक्तियों को भेजा लेकिन श्रीकृष्ण भगवान का बाल भी बांका नही हुया। अपनी लीलाओ को दिखाते हुये उन्होने मथुरा की ब्रज भूमि को तपस्थली भूमि को बना दिया और अपनी शक्ति से अपने मामा कंस को मारकर अपने नाना को राजगद्दी पर बैठाकर अपने स्थान द्वारका की तरफ़ प्रस्थान कर गये।

मथुरा मे शनि केतु माता का घर था और कारागार कारागार का रूप भी राहु के रूप मे था,चौथे बारहवे और आठवे भाव का सीधा मिश्रण होने के कारण दूसरे भाव का असर भी शामिल था। वही शनि केतु नन्दगांव में यशोदा के द्वारा पाले जाने वाले भगवान श्रीकृष्ण का रूप था,चौथा भाव माता के साथ दूध और दूध के साधनो से भी जोड कर देखा जाता है। मथुरा नगर के उत्तर पूर्व मे यमुना नदी बहती है इस नदी का रूप भी श्यामल है,साथ ही यही शनि केतु राहु का रूप रखने के बाद यमुना मे कालिया नाग के रूप मे प्रकट हुआ जो भगवान श्रीकृष्ण के द्वारा वश मे करने के बाद उसे क्षीर सागर मे भेज दिया। पूतना जो राक्षसी रूप मे थी वही अपने वक्ष पृष्ठ पर जहर लगाकर भगवान श्रीकृष्ण को दूध पिलाने आयी थी उसका दूध पीने के साथ साथ भगवान श्रीकृष्ण ने पूतना के प्राणो को भी पी लिया था। दूध और जहर दोनो राहु और चन्द्रमा की निशानी है। राहु चन्द्रमा के साथ मिलकर जहरीले दूध के लिये अपने रूप को प्रस्तुत करता है। उसी स्थान पर बकासुर जो बुध राहु के रूप मे अपना रूप लेकर भगवान श्रीकृष्ण की मौत लेकर आया था उसे भी भगवान श्रीकृष्ण ने शनि केतु की सहायता से मार गिराया था। राहु शुक्र का मिला हुआ रूप ही रासलीला के रूप मे जाना जाता है राहु जब सूर्य को आने कब्जे मे करता है कीर्ति का फ़ैलना होता है।

मथुरा नगर की सिंह राशि है यह राशि राज्य से सम्बन्ध रखती है। नन्दगांव की वृश्चिक राशि का है इसलिये जान जोखिम और खतरे वाले काम करने के लिये तथा मौत जैसे कारण पैदा करने के लिये माना जाता है। वृंदावन वृष और तुला के मिश्रण का रूप है इसलिये धन सम्पत्ति और प्रेम सम्बन्ध शुक्र से मिलते है। बरसाना भी श्री राधा के लिये तथा सत्यभामा कुम्भ राशि के लिये जो मित्र के रूप मे ही अपने कारणो को आजीवन प्रस्तुत करती रही। रुकमिणी जो तुला राशि की होकर और राधा भी तुला राशि की होकर अपने को मित्र तथा प्रेम के रूप मे प्रस्तुत करने के बाद श्रीकृष्ण की शक्ति के रूप मे साथ रही। अक्षर कृ में मिथुन और तुला है और अक्षर कं में मिथुन और वृश्चिक का रूप शामिल है,मिथुन तुला की धर्म और भाग्य के साथ साथ पूज्य बनाने के लिये मानी जाती है जबकि मिथुन और वृश्चिक षडाष्टक योग का निर्माण करने के लिये तथा शत्रुता मौत वाले कारण पैदा करने के लिये जासूसी अवैध्य रूप से धन प्राप्त करने के लिये केवल भौतिक सुखो को भोगने के लिये अहम मे आकर अपने को ही भगवान समझने के लिये मानना भी एक प्रकार से माना जा सकता है। यही बात यमुना जी के लिये भी जानी जा सकती है वृश्चिक सिंह और वृश्चिक राशि का मिश्रण भी यमुना जी के लिये अपनी गति को प्रदान करता है चौथे भाव में शनि केतु का रूप पानी के स्थान पर एक काली लकीर या जो पूर दिशा मे जाकर राहु यानी समुद्र से मिले। आदि बातो से भी माना जा सकता है।

हरिवंश पुराण मे भगवान श्रीकृष्ण सहित गुरु का कारण प्रस्तुत किया गया है और सम्पूर्ण ज्योतिष की जानकारी जीव के रूप मे उपस्थित करने के लिये बतायी गयी है। इसी प्रकार से महाभारत पुराण के तेरह पर्व एक लगन और बाकी के बारह भाव प्रस्तुत किये गये है जो ज्योतिष से सटीक रूप से मिलते है। पांच पांडव और छठे नारायाण यानी श्रीकृष्ण भगवान पांच तत्व और एक आत्मा के रूप मे आधयत्मिक रूप मे तथा पांच तत्व और एक आत्मा के रूप मे द्रोपदी के रूप मे जो पांच तत्व का भार ग्रहण करती है के प्रति भी आस्था रखना ज्योतिष के रूप मे माना जाता है। सौ कौरव दूसरे शुक्र और बारहवे सूर्य की कल्पना को प्रस्तुत करते है। वही शनि केतु कौरवो के लिये कीडे मकौडे के रूप मे प्रस्तुत करता है तो कुन्ती के विवाह से पहले के पुत्र कर्ण को छठे भाव के शनि केतु के रूप मे प्रस्तुत करता है,जो पांचो तत्वो के मिश्रण का संयुक्त रूप था और बारहवे सूर्य की निशानी था,कहा जाता है कि कुंती ने सन्तान प्राप्ति के मंत्र को क्वारे मे सूर्य की साधना करने से अंजवाया था भगवान सूर्य उपस्थित हुये और कुंती को पुत्र प्राप्ति के लिये वर दे गये तथा कानो के कुंडल और कवच कुंती को दे गये। विवाह नही होने के कारण और क्वारे में सन्तान को प्राप्त करने के कारण कर्ण को यमुना मे मय कुंडल और कवच के बहा दिया गया जो किसी मल्लाह ने प्राप्त करने के बाद उन्हे पाला और सूत पुत्र के नाम से कर्ण को जाना जाने लगा। यही चौथे भाव का शनि केतु यानी केतु पतवार और शनि पानी का वाहन यानी नाव के रूप मे भी समझा जा सकता है।

इस प्रकार से समझा जा सकता है कि ज्योतिष और भगवान श्रीकृष्ण की कथा मे केवल उनकी कथा को प्रस्तुत करने के बाद जो भी कारण पांच तत्व और एक आत्मा के साथ पैदा होते है उन्हे वृहद रूप मे वर्णित किया गया है। यह कथाये इसलिये बनायी गयी थी कि पुराने जमाने मे लिखकर सुरक्षित रखने का कोई साधन नही था और कथा के रूप मे गाथा हमेशा चलती रहती थी कोई इस गाथा को भूल नही जाये इसलिये ही भागवत पुराण की रचना की गयी थी और नवग्रह तथा जीवन के सभी ग्रहों की शांति के लिये लोग समय समय पर भागवत कथा का आयोजन करवाते थे।

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