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कुंडली के योग

astroadmin | March 19, 2018 | 1 | ज्योतिष सीखें

किसी भी ग्रह की सफलता तथा विफलता यश, धन व भाग्य की प्रबलता भाग्य स्थान में जो राशि हो उसपर निर्भर करती है। स्त्री के पुरुष नक्षत्र में ग्रह हो व पुरुष के स्त्री नक्षत्र में ग्रह हो तो  अधिक उत्तम फलदायक भाग्य का निर्माण होता है।
पुरुष नक्षत्र(14):- अश्विनी, भरणी, कृतिका, रोहिणी, मृगशिरा, मूल, पूषा, उषा,श्रवण,धनिष्ठा, शतभिषा, पूभा,
उभा व रेवती।
स्त्री नक्षत्र:- (10):- आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, आश्लेषा, मघा,
पूफ़ा, उफा,हस्त, चित्रा, स्वाति।
नपुंसक नक्षत्र(3):- विशाखा, अनुराधा व ज्येष्ठा।
हेमामालिनी के भाग्य स्थान में मीन राशि का स्वामी गुरु
व वहीदा रहमान के भाग्य स्थान में कन्या राशि का  स्वामी बुध दोनों ही पुरुष नक्षत्र में स्थित है।
मीन राशि पैरों की व कन्या राशि कटि का प्रतिनिधित्व काल पुरुष की कुंडली करती है।दोनों ही अभिनेत्री नृत्य कला व अच्छी अदाकारा के रूप में सफलता अर्जित की।
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कुंडली मे भूमि भवन सुख
मनुष्य जीवन की प्रमुख आवश्यकता में से एक अच्छा घर बनाने इच्छा हर किसी मे होती है। व्यक्ति किसी ना किसी तरह से जोड़-तोड़ कर के घर बनाने के लिए प्रयास करता ही है। कुछ ऎसे व्यक्ति भी होते हैं जो जीवन भर प्रयास करते हैं लेकिन किन्हीं कारणो से अपना घर फिर भी नहीं बना पाते हैं। कुछ ऎसे भी होते हैं जिन्हें संपत्ति विरासत में मिलती है और वह स्वयं कुछ भी नहीं करते हैं। बहुत से अपनी मेहनत से एक से अधिक संपत्ति बनाने में कामयाब हो जाते हैं। जन्म कुंडली के ऎसे कौन से योग हैं जो मकान अथवा भूमि अर्जित करने में सहायक होते हैं, उनके बारे में आज इस लेख के माध्यम से जानने का प्रयास करेगें।
स्वयं की भूमि अथवा मकान बनाने के लिए चतुर्थ भाव का बली होना आवश्यक होता है, तभी व्यक्ति घर बना पाता है।
मंगल को भूमि का और चतुर्थ भाव का कारक माना जाता है, इसलिए अपना मकान बनाने के लिए मंगल की स्थिति कुंडली में शुभ तथा बली होनी चाहिए।
मंगल का संबंध जब जन्म कुंडली में चतुर्थ भाव से बनता है तब व्यक्ति अपने जीवन में कभी ना कभी खुद की प्रॉपर्टी अवश्य बनाता है।
मंगल यदि अकेला चतुर्थ भाव में स्थित हो तब अपनी प्रॉपर्टी होते हुए भी व्यक्ति को उससे कलह ही प्राप्त होते हैं अथवा प्रॉपर्टी को लेकर कोई ना कोई विवाद बना रहता है।
मंगल को भूमि तो शनि को निर्माण माना गया है. इसलिए जब भी दशा/अन्तर्दशा में मंगल व शनि का संबंध चतुर्थ/चतुर्थेश से बनता है और कुंडली में मकान बनने के योग मौजूद होते हैं तब व्यक्ति अपना घर बनाता है।
चतुर्थ भाव/चतुर्थेश पर शुभ ग्रहों का प्रभाव घर का सुख देता है।
चतुर्थ भाव/चतुर्थेश पर पाप व अशुभ ग्रहो का प्रभाव घर के सुख में कमी देता है और व्यक्ति अपना घर नही बना पाता है।
चतुर्थ भाव का संबंध एकादश से बनने पर व्यक्ति के एक से अधिक मकान हो सकते हैं. एकादशेश यदि चतुर्थ में स्थित हो तो इस भाव की वृद्धि करता है और एक से अधिक मकान होते हैं।
यदि चतुर्थेश, एकादश भाव में स्थित हो तब व्यक्ति की आजीविका का संबंध भूमि से बनता है।
कुंडली में यदि चतुर्थ का संबंध अष्टम से बन रहा हो तब संपत्ति मिलने में अड़चने हो सकती हैं।
जन्म कुंडली में यदि बृहस्पति का संबंध अष्टम भाव से बन रहा हो तब पैतृक संपत्ति मिलने के योग बनते हैं।
चतुर्थ, अष्टम व एकादश का संबंध बनने पर व्यक्ति जीवन में अपनी संपत्ति अवश्य बनाता है और हो सकता है कि वह अपने मित्रों के सहयोग से मकान बनाएं।
चतुर्थ का संबंध बारहवें से बन रहा हो तब व्यक्ति घर से दूर जाकर अपना मकान बना सकता है या विदेश में अपना घर बना सकता है।
जो योग जन्म कुंडली में दिखते हैं वही योग बली अवस्था में नवांश में भी मौजूद होने चाहिए।
भूमि से संबंधित सभी योग चतुर्थांश कुंडली में भी मिलने आवश्यक हैं।
चतुर्थांश कुंडली का लग्न/लग्नेश, चतुर्थ भाव/चतुर्थेश व मंगल की स्थिति का आंकलन करना चाहिए. यदि यह सब बली हैं तब व्यक्ति मकान बनाने में सफल रहता है।
मकान अथवा भूमि से संबंधित सभी योगो का आंकलन जन्म कुंडली, नवांश कुंडली व चतुर्थांश कुंडली में भी देखा जाता है. यदि तीनों में ही बली योग हैं तब बिना किसी के रुकावटों के घर बन जाता है. जितने बली योग होगें उतना अच्छा घर और योग जितने कमजोर होते जाएंगे, घर बनाने में उतनी ही अधिक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।
जन्म कुंडली में यदि चतुर्थ भाव पर अशुभ शनि का प्रभाव आ रहा हो तब व्यक्ति घर के सुख से वंचित रह सकता है. उसका अपना घर होते भी उसमें नही रह पाएगा अथवा जीवन में एक स्थान पर टिक कर नही रह पाएगा. बहुत ज्यादा घर बदल सकता है।
चतुर्थ भाव का संबंध छठे भाव से बन रहा हो तब व्यक्ति को जमीन से संबंधित कोर्ट-केस आदि का सामना भी करना पड़ सकता है।
वर्तमान समय में चतुर्थ भाव का संबंध छठे भाव से बनने पर व्यक्ति बैंक से लोन लेकर या किसी अन्य स्थान से लोन लेकर घर बनाता है।
चतुर्थ भाव का संबंध यदि दूसरे भाव से बन रहा हो तब व्यक्ति को अपनी माता की ओर से भूमि लाभ होता है।
चतुर्थ का संबंध नवम से बन रहा हो तब व्यक्ति को अपने पिता से भूमि लाभ हो सकता है।
विशेष कुंडली के ग्रह योगों के अतिरिक्त दशा अंतर्दशाओं का प्रभाव भी भूमि भवन सुख पर पड़ता है कुंडली अध्ययन के समय इस पर विचार कर ही भूमि भवन सुख के सही समय का आंकलन करना उचित है।
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दारिद्रय योग

वैदिक ज्योतिष में प्रचलित परिभाषा के अनुसार यदि किसी कुंडली में 11वें घर का स्वामी ग्रह कुंडली के 6, 8 अथवा 12वें घर में स्थित हो जाए तो ऐसी कुंडली में दरिद्र योग बन जाता है जो जातक के व्यवसाय तथा आर्थिक स्थिति पर बहुत अशुभ प्रभाव डाल सकता है। कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि दरिद्र योग के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातकों की आर्थिक स्थिति जीवन भर खराब ही रहती है तथा ऐसे जातकों को अपने जीवन में अनेक बार आर्थिक संकट का सामाना करना पड़ता है। वहीं पर कुछ अन्य वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि दरिद्र योग के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक अनैतिक तथा अवैध कार्यों के माध्यम से धन कमाते हैं जिसके कारण इन जातकों का समाज में कोई सम्मान नहीं होता तथा ऐसे जातक अपने लाभ के लिए दूसरों को चोट पहुंचाने में बिल्कुल भी नहीं हिचकिचाते।
दरिद्र योग की प्रचलित परिभाषा के अनुसार यह योग प्रत्येक चौथी कुंडली में बनता है क्योंकि कुंडली के 11वें घर के स्वामी ग्रह की किसी कुंडली के बारह में से किन्हीं तीन विशेष घरों में स्थित होने की संभावना प्रत्येक चौथी कुंडली में रहती है। इस प्रकार संसार के प्रत्येक चौथे व्यक्ति की कुंडली में दरिद्र योग बनता है तथा संसार का हर चौथा व्यक्ति दरिद्र योग के अशुभ प्रभाव के कारण अति निर्धन अथवा अपराधी होता है। यह तथ्य वास्तविकता से पर है तथा इसीलिए दरिद्र योग की प्रचलित परिभाषा के अनुसार इस योग का निर्माण नहीं होना चाहिए। मैने अपने अनुभव में यह पाया है कि यदि किसी कुंडली में 11वें घर का स्वामी ग्रह अशुभ होकर कुंडली के 6, 8 अथवा 12वें घर में बैठ जाए तो ऐसी कुंडली में दरिद्र योग का निर्माण हो सकता है तथा 11वें घर के स्वामी ग्रह के कुंडली में शुभ होकर 6, 8 अथवा 12वें घर में से किसी घर में बैठ जाने पर कुंडली में दरिद्र योग का निर्माण नहीं होता बल्कि ऐसा शुभ ग्रह कुंडली के इन घरों में स्थित होकर कोई शुभ योग भी बना सकता है। कुंडली में 11वें घर के स्वामी ग्रह पर अन्य अशुभ ग्रहों का प्रभाव होने पर कुंडली में बनने वाला दरिद्र योग और भी अधिक अशुभ फलदायी हो जाता है।
उदाहरण के लिए अशुभ बृहस्पति यदि किसी कुंडली में 11वें घर के स्वामी होकर 8वें घर में स्थित हो जाते हैं तो ऐसी स्थिति में कुंडली में दरिद्र योग का निर्माण हो सकता है जिसके चलते इस योग के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक निर्धन, अति निर्धन, चोर, ठग, जेबकतरे तथा धन कमाने के लिए किसी न किसी प्रकार का धोखा करने वाले हो सकते हैं। किन्तु उपरोक्त उदाहरण में कुंडली के इसी 8वें घर में बैठा बृहस्पति यदि शुभ हो तो कुंडली में दरिद्र योग नहीं बनेगा तथा ऐसा जातक ज्योतिषी, आध्यात्मिक गुरु, आध्यात्मिक प्रवक्ता, योगाचार्य, हस्त रेखा विशषज्ञ, जादूगर, बैंक अधिकारी अथवा वित्तिय सलाहकार आदि बन सकता है। कुंडली के आठवें घर में स्थित इस प्रकार का शुभ बृहस्पति जातक को लाटरी, उत्तराधिकार, वसीयत अथवा अन्य कई प्रकार के अचानक हो जाने वाले धन लाभ भी प्रदान कर सकता है। इसलिए किसी कुंडली में दरिद्र योग के बनने या न बनने का निर्णय लेने के लिए कुंडली के 11वें घर के स्वामी ग्रह का स्वभाव तथा कुंडली के अन्य महत्वपूर्ण तथ्यों के बारे में जान लेना अति आवश्यक है।

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