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कबूतर-कबूतरी द्वारा शिक्षा

astroadmin | March 18, 2018 | 0 | अध्यात्म और धर्म

*नातिस्नेहः प्रसङ्गो वा कर्तव्यः क्वापि केनचित्*
*कुर्वन्विन्देत      सन्तापं कपोत इव दीनधीः*
श्रीमद्भागवत, ११/७/५२

“कहीं किसी के साथ अत्यंत स्नेह अथवा आसक्ति नहीं करनी चाहिए, अन्यथा उसकी बुद्धि अपना स्वातन्त्र्य खो दीन हो जाती है और उसे कबूतर की तरह अत्यंत क्लेश उठाना पड़ेगा ।”

एक जंगल में  कबूतर का जोड़ा एक घोसले में रहता था । दोनों में एक दूसरे के स्नेह और गृहत्थधर्म में बडे आसक्त थे । एक साथ वही की वृक्ष पर सोते, बैठते, घूमते, फिरते, ठहरते, बातचीत करते, खेलते, खाते थे । कबूतरी पर कबूतर का इतना प्रेम था कि वह जो कुछ चाहती कबूतर उसे बड़े से बड़ा कष्ट उठाकर उसकी कामना को पूर्ण करता था।

समय आने पर कबूतरी ने अंडे दिए उसमें से छोटे-छोटे बच्चे निकले जिसका दोनो बड़े ही स्नेह से लालन पोषण करने में इतना लीन हो गए कि लोक-परलोक की याद ही नहीं रही । एक दिन एक बहेलिया घूमता हुआ आता है और जाल बनाकर उन बच्चों को पकड़ लेता है ।

अपने बच्चों को जाल में फंसा देख कबूतरी बच्चों के स्नेहवश जाल में फंस गई । जब कबूतर ने देखा कि मेरे प्राणों से भी प्यारे बच्चे जाल में फंस गए हैं और मेरी प्राण प्रिय पत्नी भी उसी दशा में पहुंच गई है तो वह अत्यंत दुखी होकर विलाप करने लगता है । मोहवश उसकी दशा अत्यंत दयनीय हो जाती है, वह अत्यंत दुखी होता है । बच्चों को जाल में फंस मौत के मुँह में जाता देखने के बाद भी मूर्ख कबूतर यह सब देखते हुवे भी जानबूझकर जाल में कूद पड़ा और बहेलिया उन सबको ले जाता है।

यह मनुष्य शरीर मुक्ति का खुला द्वार है, इसे पाकर भी जो मोह में फँसे कबूतर की तरह केवल अपने गृह गृहस्थी में ही फंसा हुआ है, वह बहुत ऊंचे  चढ़कर गिर रहा है ।

कबूतर कबूतरी।

यह प्रसंग श्रीमद्भागवत के द्वादश स्कंध में अवधूतोपाख्यान के नाम से वर्णित है। इसमें भगवान् दत्तात्रेय अपने  विभिन्न गुरुओं का वर्णन करते हुए उन सबसे ग्रहण की हुई शिक्षाओं का वर्णन करते हैं। प्रसंगवश उन सबका भी विवरण प्रस्तुत किया जा रहे। यह इतिहास अवधूत ब्राह्मण दत्तात्रेयजी तथा राजा यदु के संवाद के रूप में है। एक बार, राजा यदु ने अवधूत दत्तात्रेय जी को निर्भय होकर आनन्द से विचरते देखा। उनके निकट जाकर राजा यदु ने उनसे कहा- आप कुछ करते तो हैं नहीं। यों ही यत्र-तत्र, जहाँ-तहाँ विचरण करते हैं।                            कुतो बुद्धिरियं ब्रह्मन्नकर्तुः सुविशारदा। यामासाद्य भवाँल्लोकं विद्वांश्चरति बालवत्।।

तब दत्तात्रेय जी अपने द्वारा विभिन्न स्रोतों से प्राप्त गुणों अथवा शिक्षाओं का वर्णन करते हैं। अवधूत दत्तात्रेयजी कहते हैं, “उन गुरुओं के नाम तथा उनसे मैंने जो सीखा वह सुनो। मेरे गुरु हैं पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, अग्नि, चन्द्रमा, सूर्य, कबूतर, अजगर, समुद्र, पतंग, भौंरा या मधुमक्खी, हाथी, शहद निकालने वाला, हिरन, मीन, पिंगला वेश्या, कुरर पक्षी, बालक, कुमारी कन्या, बाण बनाने वाला, सर्प, मकड़ी तथा भृग्ङी कीट। इन सब से मैंने अपने लिए जो शिक्षा ग्रहण की है अब वह सुनो।”                        1.जल : जल का स्वभाव स्वच्छ, मधुर, व पवित्र करने वाला है। गंगाजल की महिमा से तो सभी परिचित हैं। जल के गुणों से साधक को अपना व्यक्तित्व शुद्ध, क ोमल, मधुरभाषी, व लोक-पावन बनाने की शिक्षा मिलती है। ऐसा कि उसका दर्शन, स्पर्श, अथवा नामोच्चार करने वाला भी पवित्र हो जाय।

२.पृथ्वी: पृथ्वी पर निवास करने वाले मनुष्य व अन्य जीव नाना प्रकार के उत्पात करते हैं; किन्तु वह सबकुछ धैर्य पूर्वक सहन करती है, कोई प्रतिशोध नहीं लेती। अतः पृथ्वी से धैर्यवान और क्षमाशील होने की शिक्षा मिलती है।

३.आकाश: इस दुनिया में आग लगने, पानी बरसने, अन्नादि उत्पन्न होने या नष्ट होने व प्राकृतिक आपदा इत्यादि से आकाश पूर्णतया अछूता और अखण्डित रहता है। इसी प्रकार मनुष्य की आत्मा इस भौतिक जीवन से पृथक, असंपृक्त व अखण्डित रहती है।

४.अग्नि: अग्नि सभी प्रकार के पदार्थों को भस्म कर देती है; अर्थात् उनका भक्षण कर लेती है, किन्तु किसी पदार्थ के गुण-दोष से प्रभावित नहीं होती। इसी प्रकार एक सच्चे साधक को समस्त विषयों का उपभोग करते हुए भी अपने मन व इन्द्रियों को वश में रखते हुए उन विषयों के दोष ग्रहण नहीं करने चाहिए।

५.प्राणवायु: मात्र आहार की प्राप्ति से ही प्राणवायु संतुष्ट होकर अपना कार्य करती रहती है। इसी प्रकार एक सच्चे साधक को भी केवल उतने ही विषयों का भोग करना चाहिए जिससे मन संयमित रहे, बुद्धि में विकार न आये और मन चंचल न हो।

६.समुद्र: अपने भीतर अनेक रत्नों को छिपाये हुए अतल गहराइयों वाला समुद्र सदैव धीर-गम्भीर व शान्त रहता है। इसी प्रकार साधक को भी सदा प्रसन्न तथा गम्भीर (उश्रृंखल नहीं) रहना चाहिए। ज्वार-भाटे तथा उठती तरंगों से समुद्र की गम्भीरता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

७.चन्द्रमा: चन्द्रमा की कलाएं समय के क्रम से घटती बढ़ती रहती हैं; किन्तु चन्द्रमा का वास्तविक स्वरूप स्थिर रहता है। इसी प्रकार मनुष्य के जन्म से मृत्यु तक उसके शरीर की अवस्थाएं परिवर्तित होती रहती हैं; किन्तु आत्मा का स्वरूप अपरिवर्तित रहता है। मृत्यु होने पर सिर्फ़ शरीर का नाश होता है। आत्मा सदैव स्थिर रहती है।

८.सूर्य: सूर्य अपनी किरणों की ऊष्मा से समुद्र का जल अवशोषित करता है। ; किन्तु पुनः उसे पृथ्वी पर बरसा देता है। इसी प्रकार एक साधक को विषयों का भोग करने के बाद एक समय उनका त्याग कर देना चाहिए।

*
९.कपोत “                  अगला गुरु कबूतर है। बहेलिए द्वारा अपने दल या परिवार के पकड़े जाने पर कबूतर उन्हें बन्धन से छुड़ाने के चक्कर में स्वयं जाल में फँस जाते हैं। इनसे मैंने सीखा कि भले ही सकारात्मक प्रतिक्रिया क्यों न हो, मोह और भावावेश में पड़कर अपना सर्वनाश नहीं करना चाहिए। ऐसे पुरुष को ज्ञानीलोग आरूढच्युत (मूर्ख) कहते हैं। मानव शरीर मुक्ति का खुला हुआ द्वार है। वह अपने परास्वरूप को प्राप्त कर सकता है। केवल गृहस्थी ही उसकी सीमा नहीं है।”अपने परिवार के बाकी सदस्यों को शिकारी के जाल में फँसा देखकर कबूतर स्वयं उस जाल में कूद जाता है, और अपना जीवन संकट में डाल देता है। इस कहानी से यह शिक्षा लेनी चाहिए कि जो व्यक्ति परिवार और विषयों में आसक्त हो जाता है, उसे अन्ततः अनेक कष्ट उठाने पड़ते हैं।*

१०.पतंगा (कीट): आग की लौ से आकर्षित होकर पतंगा उसी में कूद पड़ता है और उसकी जान चली जाती है। इससे यह सीख मिलती है कि जो मनुष्य अपनी इन्द्रियों पर नियन्त्रण खोकर मायामोह में लिप्त हो जाते हैं, उनका असमय अन्त हो जाता है।

११.मधुमक्खी: मधुमक्खी अत्यन्त परीश्रम से शहद का संचय करती है किन्तु उसका उपभोग प्रायः स्वयं नहीं कर पाती। बल्कि यह उसके लिए संकट भी आमन्त्रित करता है। इसीलिए सायंकाल या दूसरे दिन के लिए भिक्षा का संग्रह नहीं करना चाहिए।

१२.मृग: एक शिकारी द्वारा बजाये गये मधुर संगीत से मोहित होकर जिस प्रकार मृग उसके जाल में फँस जाता है, उसी प्रकार साधक भी विषयी संगीत से आकृष्ट होने पर माया-मोह में बँध जाता है।

१३.बालक: जिस प्रकार एक बालक का मन निष्कलुष व सच्चा होता है, स्वयं के मान-अपमान की चिन्ता से ग्रसित नहीं होता है; उसी प्रकार साधक को लोकजीवन से निर्लिप्त होकर अपनी आत्मा में ध्यानमग्न रहना चाहिए।

१४.मीन: काँटे में लगे हुए चारे (मांस के टुकड़े) के लोभ में पड़कर मछली अपने प्राण गँवा बैठती है। इसी प्रकार स्वाद एवं इन्द्रिय सुख का लोभी मनुष्य भी अनेक दुःख भोगता है। अतः साधक को अपनी इन्द्रियाँ वश में रखना चाहिए।

१५.पिंगला वेश्या: मिथिला की यह वेश्या किसी धनवान ग्राहक की आशा लेकर अपने घर के द्वार पर देर रात तक बैठी अत्यन्त दुःखी होती है; किन्तु जब इस आशा का त्याग कर वह भीतर चली जाती है तो चिन्तामुक्त होकर आराम से सो जाती है। इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि आशा करना ही सबसे बड़े दुःख का कारण है और इसका त्याग ही सुख का स्रोत है।

१६.कुररी पक्षी: यह पक्षी जबतक मांस के टुकड़े को पकड़े रहता है, तबतक दूसरे पक्षी इसके ऊपर आक्रमण करते और चोंच मारते हैं। उस टुकड़े को नीचे गिरा देने के बाद ही इसे राहत मिलती है और संकट समाप्त होता है। इससे शिक्षा मिलती है कि अनावश्यक संचय/संग्रह करने से संकट का सामना करना पड़ता है।

१७.कुँवारी कन्या: घर में अकेली रह गयी कुँवारी कन्या जब अचानक आये अतिथियों के भोजन के लिए छिपाकर (ओखली में) धान कूट रही थी तो हाथ की चूड़ियाँ बजने लगीं। अतिथियों से इस कार्य को छिपाने के लिए उसे अपनी चूड़ियाँ तोड़नी पड़ीं, और हाथों में अन्ततः केवल एक-एक चूड़ियाँ रह गयीं।
यह कहानी बताती है कि साधक को सदैव अकेले ही रहना चाहिए, क्योंकि दो मनुष्यों के एक साथ रहने पर उनमें कलह होना अवश्यम्भावी है।

१८.मकड़ी: मकड़ी अपनी इच्छानुसार जाला बुनकर उसमें अपनी सुविधा से सहज विचरण करती रहती है, किन्तु उसमें उलझती नहीं है। इससे हमें यह सीख मिलती है कि हमें माया रूपी संसार में रहकर भी स्वतंत्र विचरण करते रहना चाहिए किन्तु इसमें उलझना नहीं चाहिए।

यद्यपि ये शिक्षाप्रद दृष्टांत भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अवधूतोपाख्यान में एक साधक के अनुपालनार्थ बताये गये थे, जो हजारो वर्ष पहले रचित पुराण में पाये जाते हैं; तथापि इनकी प्रासंगिकता आज भी कम नहीं हुई है। बढ़ती हुई उपभोक्तावादी संस्कृति में भौतिक सुख के साधनों के पीछे भागते मनुष्य के लिए ये कथित सुख किसी मृगतृष्णा से कम नहीं हैं। इसका अन्त भी घोर निराशा, तनाव, मानसिक अवसाद, और यहाँ तक कि विक्षिप्तावस्था तक में हो रहा है। इसलिए सांसारिक विषयों से निर्लिप्तता, एवं त्याग व सन्तोष की सीख देते ये ‘गुरुजन’ हमें स्थाई सुख और शान्ति की राह दिखलाते हैं।

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