ज्योतिष वास्तु और किसी भी प्रकार के रत्न के लिये फोन करे – 7309053333

अश्वमेध

astroadmin | October 24, 2018 | 0 | अध्यात्म और धर्म

तीन प्रकार के अश्वमेध-
ब्राह्मण ग्रन्थों में सांकेतिक रूप में यज्ञ का वर्णन है। उसका वास्तविक रूप समझने के लिए पुराण-इतिहास  पढ़ना पड़ेगा-
इतिहास पुराणाभ्यां वेदं समुपवृंहयेत्।
बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति।। (महाभारत। 1/1 अध्याय)
इतिहास पुराण से अनभिज्ञ मूर्खों से वेद भी डरता है कि यह मुझे नष्ट कर देगा।
अश्वमेध यज्ञ के 3 रूप पुराणों में वर्णित हैं।
आध्यात्मिक रूप शरीर के भीतर है जिसे कायाकल्प कहा जाता है। रामायण के बालकाण्ढ में पुत्र कामेष्टि यज्ञ को भी अश्वमेध कहा गया है। इसका एक वर्णन छान्दोग्य उपनिषद् में भी है। दशरथ तथा उनकी पत्नियां  ( कैकेयी को छोड़कर) पुत्र जन्म देने की आयु पार कर चुके थे। 21 यूप गाड़े गये या 21 दिन तक कायाकल्प हुआ। उसके बाद वे सन्तान को जन्म देने में समर्थ हो सके। रघुवंश द्वितीय सर्ग मे भी 21 दिन तक दिलीप की गो सेवा रूप तपस्या का वर्णन है-
सप्त व्यतीयुस्त्रिगुणानि तस्य, दिनानि दीनोद्धरणोचितस्य।
सामान्यतः सृष्टि यज्ञ भी 3×7 व्यवस्था से होता है, जो पुरुष सूक्त में कहा है-
सप्तास्यासन् परिधयः त्रिस्सप्तः समिधः कृताः।
अथर्ववेद का प्रथम श्लोक भी इसका निर्देश करता है-
ये त्रिषप्ताः परियन्ति विश्वाः।
आधिभौतिक यज्ञ में कहा जाता है कि घोड़ा पूरे भारत में निर्बाध घूमना चाहिए। वेद सनातन है, अतः आधिभौतिक अश्वमेध हर राजा का कर्तव्य है। पूरे देश में एक कानून, कर व्यवस्था हो। संचार तथा यात्रा में बाधा नहीं हो। रेल चले तो बिना रैली में फंसे गन्तव्य तक पहुंच जाये। आज भी इन बाधाओं को दूर करने के लिए लगता है कि उसके सेना भेजनी होगी।
श्व का अर्थ है कल। कल स्थिति बदले, इसके लिये गति चाहिए। गति का कारक अश्व है। गाड़ी को चलाने के लिए जिस पशु का व्यवहार होता था उसे भी अश्व कहते हैं। आज भी किसी इंजन की शक्ति को अश्व शक्ति में मापते हैं। सम्भवतः पुराने युग में भी ऐसा था।
रथ में 10,000 घोड़े लगाने का वर्णन है। भौतिक रूप से 10,000 घोड़े नहीं लग सकते हैं। लगाने पर वे कम से कम 500× 500 मीटर चौड़ा मार्ग घेरेंगे तथा उनका नियंत्रण नहीं हो पायेगा।  इसका अर्थ है कि इंजन 10,000 अश्वशक्ति का था। इस अश्वशक्ति की माप आज ही जैसी पर थोड़ा अलग होगी। आकाश में सूर्य ही अश्व है। सूर्य तथा उसके जैसे अन्य तारों से सृष्टि चल रही है। सूर्य से प्रकाशित भाग श्वेत अश्व है। उससे बड़ी रचनायें ब्रह्माण्ड तथा पूरा विश्व है। पूरा विश्व ब्रह्म है तथा आकाशगंगा उसका एक अण्ड। श्वेत अश्व से बड़ी इन रचनाओं का वर्णन होने के कारण एक उपनिषद् का नाम श्वेताश्वतर उपनिषद् है। पर वामपन्थी मूर्खों को इससे कोई मतलब नहीं था। उनके जीवन का उद्देश्य था कि हर जगह वेदों में मांसाहार तथा हत्या दिखायें। अतः राहुल सांकृत्यायन ने श्वेत अश्व का अर्थ घोड़ा का श्वेत भाग हड्डी किया तथा तर का अर्थ सूप किया तथा निष्कर्ष निकाला कि ऋषि रोज घोड़े की हड्डी का सूप पीते थे। इस उपनिषद् में घोड़ा की चर्चा कहीं नहीं है। पर जीवन का उद्देश्य पूरा होने के कारण वामपन्थियों ने उनको महापण्डित घोषित कर दिया।
आकाश के अश्व सूर्यों द्वारा 3×7 क्रम में सृष्टि हो रही है- 3 धाम और 7 लोक। सूर्य किरण से प्रत्यक्ष गति हवा में दीखती है। उससे वर्षा होती है। उससे शक्ति लेकर समुद्र में जो जहाज चलते हैं उनको याचक (Yatch) कहते हैं जो महाराष्ट्र तथा ओडिशा में नाविकों की उपाधि है। भारत के पूर्व में जापान  (भागवत का पञ्चजन = 5 द्वीपों का समूह) के निकट हवा रूपी अश्व की शक्ति मन्द पड़ जाती थी अतः उसे भद्राश्व वर्ष कहा गया है। आज भी उसे Horse Latitude कहते हैं।

वेद व वेदांगों की पारस्परिक स्थिति

वेद में २ मूलभूत विषय हैं– ज्योतिष व कल्प।

ज्योतिष में ४ बाते हैं–
भूगोल, खगोल, उनका पारस्परिक सम्बन्ध तथा प्राणियों पर उनका प्रभाव। गणित ज्योतिष का अंग है।

कल्प में वस्तुओं की उत्पत्ति, उनका स्वभाव तथा उनसे लाभान्वित होने की विधियाँ हैं। ज्योतिषीय ज्ञान के बिना इन विधियों का अनुप्रयोग नहीं हो पाता। आधुनिक physics, chemistry, biology व psychology कल्प का ही विस्तार हैं।

कल्प व ज्योतिष को समझने के लिए यह समझना अनिवार्य है कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड एक इकाई है।

शरीर में अवयव होते हैं न कि अवयवों के योग से शरीर बनता है। शरीर अवयवों के योग से कुछ अधिक होता है तथैव वेदांगों का ज्ञान अनिवार्य है किन्तु वेद उनसे कुछ अधिक ही है।

वेद के क्रमश: ६ अंग कहे गए हैं–
शिक्षा, छन्द, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष व कल्प। प्रथम ४ का सम्बन्ध वेद की भाषा से है तथा शेष २ वेद के विषय हैं।

क्या वेद में चूक हो सकती है ?!

नहीं !

कदापि नहीं !!

पितृदेवमनुष्याणां वेदश्चक्षु: सनातनम् ।
अशक्यं चाप्रमेयं च वेदशास्त्रमिति स्थिति: ॥
या वेदबाह्या स्मृतयो याश्च काश्च कुदृष्टय: ।
सर्वास्ता निष्फला प्रेत्य तमोनिष्ठा हि ता: स्मृता: ॥
उत्पद्यन्ते च्यवन्ते च यान्यतोऽन्यानि कानिचित् ।
तान्यर्वाक्कालिकतया निष्फलान्यनृतानि च ॥
चातुर्वर्ण्यं त्रयो लोकाश्चत्वारश्चाश्रमा: पृथक् ।
भूतं भव्यं भविष्यं च सर्वं वेदात्प्रसिध्यति ॥
(मनुस्मृति १२-९४ से ९७)

अर्थात् वेद “पितरों, देवों व मनुष्यों” का सनातन चक्षु (ज्ञान का साधन) है। वेदशास्त्र अशक्य है (अर्थात् एक मनुष्य वेद नहीं बना सकता) तथा अप्रमेय है ( अर्थात् एक मनुष्य वेद को नहीं समझ सकता), यह सिद्धान्त है (अर्थात् परीक्षणों से सिद्ध है)।

जो वेदविरोधी स्मृतियाँ हैं और कुत्सित दृष्टि से लिखी गई जो पुस्तकें हैं ; वे सभी स्मृतियाँ व पुस्तकें निष्फल हैं और अगली पीढ़ियों को अज्ञान में ले जाने वाली हैं।

इनसे (वेदों से) अन्य स्रोत से जो पुस्तकें उत्पन्न होती हैं ; वे नवीनकालिक होने से (अर्थात् शाश्वत तत्त्वों से रहित होने से) निष्फल व झूठी हैं और शीघ्र ही नष्ट हो जाती हैं ।

पृथक्-पृथक् चारों वर्ण, तीनों लोक, चारों आश्रम ; जो हो चुका है, जो हो रहा है और जो होना है ; सब-कुछ वेद से प्रसिद्ध होता है (अर्थात् सबका बीज वेद में है)।

वेद अर्थात् आरम्भ !

यदि आरम्भ नहीं तो अस्तित्व कैसे !

वेदविरोध उसी प्रकार की बात है
जैसे कोई मनुष्य कहे कि
मेरे माता-पिता नहीं थे फिर भी मैं हूँ !!!

Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

दैनिक पन्चांग

फेसबुक

सबसे ज्यादा देखे जाने वाले

दिन के अनुसार देखे

April 2019
S M T W T F S
« Mar    
 123456
78910111213
14151617181920
21222324252627
282930  

अब तक देखा गया

  • 69,616

नये पोस्ट को पाने के लिये अपना ईमेल लिख कर सब्सक्राइब करे


ज्योतिष वास्तु और किसी भी प्रकार के रत्न के लिये फोन करे – 7309053333
%d bloggers like this: